केशव भारद्वाज
बेतिया (बिहार) : पटना से देर शाम फोन आया था। आवाज़ में चिंता, दुःख और सदमा साफ़ झलक रहा था। अमरनाथजी को ब्रेन हैमरेज हो गया है। अस्पताल में भर्ती हैं। जांच रिपोर्ट दिल्ली के एक बड़े डॉक्टर को दिखाने और उनकी राय लेने की अपील थी।
सुनते ही मैं कुछ पल स्तब्ध रह गया। फोन पर ज्यादा कुछ पूछ नहीं सका। रिपोर्ट की स्कैन कॉपी मेरे व्हाट्सएप पर आ चुकी थी। रिपोर्ट खोलते ही सबसे पहले उम्र पर नज़र पड़ी — 63 वर्ष।
रिपोर्ट डॉक्टर साहब को फॉरवर्ड कर दी। सोचा, पहले वे देख लें, फिर मरीज के बारे में बताएँगे। कुछ ही मिनटों में उनका फोन आ गया।
“कौन हैं?”
“नजदीकी रिश्तेदार। बेतिया के हैं।”
“होश में हैं?”
“अभी इस बारे में नहीं पूछा। पूछकर बताता हूँ।”
“उम्र कम है, 63 साल। बचने की पूरी उम्मीद है। नस ऐसी जगह फटी है जहाँ ऑपरेशन लगभग नामुमकिन है। ब्लड प्रेशर बहुत हाई था। शायद दवा समय पर नहीं ले रहे थे। अगर ठीक भी हो गए तो आगे बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी। दवा नियमित लेनी होगी। दुबारा हुआ तो घातक हो सकता है।”
फोन रखते ही पटना को फिर फोन लगाया। पता चला, अमरनाथजी अभी तक होश में नहीं आए थे। वहाँ के डॉक्टरों ने भी ऑपरेशन न करने की सलाह दी थी। सबकी उम्मीद उनके होश में आने पर टिकी हुई थी।
लेकिन उम्मीद पूरी नहीं हुई।
अमरनाथजी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।
सब स्तब्ध थे।
स्मृतियाँ टुकड़ों-टुकड़ों में आने लगीं। बार-बार एक ही बात दिमाग में कौंध रही थी — यह भी कोई उम्र थी जाने की?
मेरे गाँव से कुछ ही दूर उनका गाँव बड़हरवा था। दोनों गाँवों के बीच पुराने रिश्ते थे। उनके परिवार और हमारे परिवार का अनुबंध जमींदारी काल से चला आ रहा था। उनके पिताजी नर्मदेश्वर जी बेहरी गाँव (नेपाल सीमा के पास) में कचहरी चलाते थे। गुलाब दत्त झा, जो मेरे पिता के अभिन्न मित्र और बेहरी के मुखिया थे, उन्हीं के माध्यम से यह संबंध और गहरा हुआ। नर्मदेश्वर जी ने हमारे परिवार से कुछ जमीन भी खरीदी थी। इसी कारण आने-जाने का सिलसिला चलता रहा।
बेतिया शहर के कालीबाग मंदिर के पास उनका पुश्तैनी मकान था। नर्मदेश्वर जी शहर के जाने-माने वकील थे, जनसंघ के प्रति समर्पित। युवावस्था में उन्होंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा था। बड़े रसूख वाले व्यक्ति थे।
उनके बड़े बेटे अमरनाथजी के बारे में किशोरावस्था में सुना था कि वे असम में पत्रकार हैं और पूर्वोत्तर में कुछ अनोखा काम कर रहे हैं। मुलाकात का संयोग तब नहीं बना।

बाद में उनके छोटे भाई की शादी मेरे परिवार में हुई। उसी मौके पर अमरनाथजी से अच्छी बातचीत हुई। उनकी सादगी उसी दिन साफ़ दिख गई थी। शादी में जीप का बोलबाला था। विदाई के समय अमरनाथजी के लिए जीप की आगे वाली सीट पहले से आरक्षित थी, लेकिन वे बिना कुछ कहे पीछे वाली सीट पर जा बैठे। उस ज़माने में सामाजिक हैसियत रखने वाले लोग आगे बैठना पसंद करते थे, लेकिन अमरनाथजी ने उस रिवाज को धता बताते हुए पीछे बैठना चुना। उनका मिजाज ही कुछ अलग था। मुझे भी अपना मिजाज उनके करीब लगता था। उसी दिन से हमारी बातचीत शुरू हुई।
जब मैं अफ्रीका में रहने लगा, तब फोन पर बातचीत और बढ़ी। 2017 में बेतिया जाते हुए पटना में मैं सपरिवार उनके यहाँ खाने पर गया। अब विचारधारा के स्तर पर भी हमारी चर्चाएँ गहरी होने लगी थीं।
उत्तर भारत की सामाजिक व्यवस्था, खासकर चंपारण की थारू जनजाति पर उनकी गहरी पकड़ थी। थारू समुदाय के कई लोग उनके करीबी मित्र थे। नदियाँ, पर्यावरण, मछली, मल्लाह – इन विषयों पर वे घंटों बात कर सकते थे। मुझे नहीं पता कि उनके इस ज्ञान का कोई दस्तावेजीकरण हुआ या नहीं।
मुझे वे विचारधारा से गांधीवादी लगते थे। सादगी उनकी पहचान थी। जैसे परतंत्र भारत में बंगाल के कई जमींदार के बच्चे ब्रिटेन पढ़ने जाते और साम्यवादी बनकर लौटते थे, वैसे ही अमरनाथजी उत्तर-पूर्व से एक अलग, स्वतंत्र सोच लेकर लौटे थे।
1990 के आर्थिक उदारीकरण और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद वे और उनके जैसे बुद्धिजीवी खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे। प्रिंट मीडिया का धीरे-धीरे कमजोर होना ही शायद अमरनाथजी जैसे पत्रकारों के असमय चले जाने का एक बड़ा कारण है।
दिल्ली में उनके स्मृति में श्रद्धांजलि सभा हुई। वक्ताओं ने जिस प्यार और सम्मान से उन्हें याद किया, बहुत अच्छा लगा।
हम सबकी जीवन-यात्रा आखिरकार किसी न किसी नदी के किनारे समाप्त होती है। गंगा किनारे अमरनाथजी की यात्रा भी पूरी हुई।
अब ज़रूरत है उनके बिखरे पड़े कामों को समेटकर एक रूप देने की। मुझे पूरा विश्वास है कि यह दिन भी आएगा।



