सादर वंदे।
जयपुर : आज दैनिक भास्कर में प्रकाशित मेघना पंत जी का लेख पढ़ा। विगत कुछ समय से उनके लेखों का एक क्रम निरंतर दिखाई देता है, जिसमें भारतीय परिवार व्यवस्था, विवाह संस्था, सामाजिक संबंधों एवं भारतीय जीवन-दर्शन को प्रश्नांकित करते हुए तथाकथित आधुनिकता के नाम पर ऐसे विमर्शों को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिन्हें स्वयं पश्चिमी समाज आज अपनी सबसे बड़ी सामाजिक भूल मानकर पुनर्विचार कर रहा है।
विचारों का आदान-प्रदान लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु जब किसी सभ्यता की हजारों वर्षों की तपःपूत जीवन-पद्धति को लगातार पिछड़ा, दकियानूसी अथवा अप्रासंगिक सिद्ध करने का प्रयास हो तथा उसके स्थान पर विदेशों में असफल सिद्ध हो चुके सामाजिक प्रयोगों को “प्रगतिशीलता” के आकर्षक आवरण में प्रस्तुत किया जाए, तब उस पर गंभीर आपत्ति और वैचारिक प्रतिवाद आवश्यक हो जाता है।
इसी भावना से यह पत्र लिख रहा हूँ।
आधुनिकता नहीं, आयातित मानसिकता का महिमामंडन बंद कीजिए
इकबाल ने लिखा था—
“यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहाँ से,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।”
प्रश्न यही है कि वह “कुछ बात” क्या है?
वह भारत की हजारों वर्षों की तपःपूत संस्कृति है।
वह परिवार है, कुटुंब है, संयम है, विवाह संस्था है, मातृत्व है, पितृत्व है, गुरु-शिष्य परंपरा है, धर्म है, कर्तव्य है और आत्मसंयम पर आधारित जीवन-दर्शन है।
दुनिया ने मनुष्य को जीवन जीने के संसाधन दिए होंगे, लेकिन जीवन जीने की कला भारत ने दी है। योग, आयुर्वेद, गीता, उपनिषद, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः—ये केवल श्लोक नहीं, मानव सभ्यता के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
दैनिक भास्कर में लगातार प्रकाशित हो रहे आपके लेखों में एक समान प्रवृत्ति दिखाई देती है—भारत की स्थापित सामाजिक मान्यताओं को “दकियानूसी” घोषित करना और पश्चिम के संकटग्रस्त सामाजिक प्रयोगों को “आधुनिकता” का नाम देकर प्रस्तुत करना।
यह विमर्श निष्पक्ष नहीं, बल्कि आयातित बौद्धिक उपनिवेशवाद का उदाहरण है।
आज जिस यूरोप और अमेरिका की सामाजिक संरचनाओं का महिमामंडन किया जा रहा है, वहीं परिवार संस्था के विघटन पर सबसे अधिक चिंता व्यक्त की जा रही है।
एलन मस्क बार-बार जनसंख्या संकट, परिवार और जन्मदर पर चिंता व्यक्त करते हैं। अमेरिका में परिवार विघटन, अकेलापन, मानसिक अवसाद और घटती जन्मदर राष्ट्रीय बहस का विषय हैं। “Featherless America” जैसे अनेक अध्ययन अमेरिकी समाज के सांस्कृतिक विघटन की चर्चा करते हैं। वहां स्कूलों में गोलीबारी सामान्य समाचार बन चुकी है। किशोर अपराध, ड्रग्स, अश्लीलता, मानसिक अवसाद, आत्महत्याएं और पारिवारिक विघटन भयावह स्तर पर हैं।
क्या यही आधुनिकता है?
आज वहां भोजन, पहनावा, मनोरंजन, यौन स्वच्छंदता, पर्यावरण, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली के बीच संबंधों पर गंभीर शोध हो रहे हैं। जिन बातों को भारत हजारों वर्षों से “आहार-विहार-विचार” के रूप में कहता आया है, विज्ञान आज उनकी पुष्टि कर रहा है।
दुर्भाग्य यह है कि भारत में कुछ बुद्धिजीवी उन्हीं असफल सामाजिक प्रयोगों को “प्रगतिशीलता” बताकर भारतीय समाज पर थोपना चाहते हैं।
आमिर खान जैसे फिल्मी व्यक्तित्व भारत के सांस्कृतिक आदर्श नहीं हो सकते। धन, प्रसिद्धि और व्यक्तिगत जीवन की स्वतंत्रता किसी को समाज का नैतिक मार्गदर्शक नहीं बना देती।
यदि किसी फिल्म या कथा में “फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स” जैसी अवधारणाओं को सामान्य बनाया जाता है, जहां 15 वर्ष की छात्रा गर्भवती होकर यह कहे कि “पता नहीं पिता कौन है”, तो यह प्रेम नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व के विघटन का चित्र है। कामुकता को प्रेम का पर्याय बना देने का परिणाम वही है जो पश्चिम भुगत रहा है—टूटते परिवार, असुरक्षित बचपन, अवसाद, हिंसा और आत्महत्याएं।
भारत का प्रेम शरीर से पहले मन और आत्मा का संबंध है। यहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का अनुबंध नहीं, दो परिवारों का संस्कार है। इसलिए भारतीय समाज में संबंधों के साथ कर्तव्य और मर्यादा भी जुड़ी है।
आज आवश्यकता प्रेम और कामुकता के अंतर पर गंभीर चर्चा की है, न कि हर सामाजिक बंधन को “रूढ़िवाद” कहकर तोड़ने की।
समाज का भविष्य सोशल मीडिया ट्रेंड से नहीं, सभ्यता के दीर्घकालीन अनुभव से तय होता है। दैनिक भास्कर जैसे प्रभावशाली समाचार पत्र से अपेक्षा है कि वह भारतीय समाज के विमर्श को पश्चिमी संकटों की नकल न बनाए। भारत को पश्चिम की असफल सामाजिक प्रयोगशाला में बदलने का प्रयास न किया जाए।
हम अस्पतालों और मानसिक चिकित्सालयों में बढ़ती भीड़, टूटते परिवार, अकेलेपन और अवसाद की वैश्विक त्रासदी देख चुके हैं।
अब हमें हमारे मोटे अनाज, योग, आयुर्वेद, संयुक्त परिवार, संस्कार, संयम और हजारों वर्षों से परीक्षित भारतीय जीवन-पद्धति के साथ जीने दीजिए।
भारत को उपभोक्ता समाज नहीं, संस्कार समाज बने रहने दीजिए।
क्योंकि भारत की शक्ति उसकी नकल करने में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को पहचानने में है।
इसी “कुछ बात” ने भारत को मृत्युंजय बनाया है, और वही भविष्य में भी विश्व को दिशा देगी।



