अमेरिका मे विराट हिंदू दर्शन

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 प्रशांत पोळ

नागपुर : कल 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन में जो हुआ वह विराट था, भव्य था, दिव्य था, अद्भुत था, अवर्णनीय था..!

प्रस॔ग था, ‘एक विश्व – एक मानवता उत्सव’ (Universal Oneness Celebration)। मेडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर की अधिकतम आसन क्षमता 5,570 हैं। यह विशाल सभागार खचाखच भरा था। अनेक आगंतुक / आमंत्रित बाहर खड़े थे। कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के प्रमुख तो सारे थे ही, किंतु 30 देशों के, 16 विभिन्न धर्मो के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए थे। 180 से अधिक आध्यात्मिक / धार्मिक गुरु, आचार्य थे। विश्व के सैकड़ो चैनलों से, हजारों सोशल मीडिया अकाउंट्स से यह कार्यक्रम लाइव प्रसारित हो रहा था।

*इस विशाल वैश्विक मंच से भारत बोल रहा था, और सारा विश्व आतुरता के साथ सुन रहा था। 11 सितंबर 1893 के स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो भाषण का स्मरण हो रहा था।*

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की श्रृंखला में यह *एक विश्व – एक मानवता* का उत्सव था। इसमें प्रमुख वक्ता थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत। डॉक्टर भागवत जी ने कहा कि _”इस विश्व में प्रत्येक देश का एक संदेश हैं। एक उद्देश्य हैं। एक भागधेय (नियति) हैं। (Every nation has a message, a mission and a destiny) भारत को यहां जिम्मेदारी मिली हैं, यह दायित्व मिला हैं की विविधता का आदर और विविधता में एकता का संदेश सारे विश्व तक लेकर जाए।”_

उन्होंने आगे कहा, _”विश्व में दो प्रकार के लोग हैं। एक कहते हैं, ‘जियो और जीने दो’ (Live and let live)। दूसरे प्रकार के लोग हैं जो कहते हैं, ‘मात्र उन्हीं को जीने का अधिकार हैं, जो हमारी बात मानते हैं। हम उन्ही की रक्षा करेंगे, जो हमारे मत को मानेगा’ (If you obey us, then only we will protect you)। यह दूसरे प्रकार के लोग असुर (राक्षस) श्रेणी में आते हैं, और पहले प्रकार के लोग देव कहलाते हैं।”_

‘भौतिक सुख यह स्थाई सुख या समाधान नहीं हैं’, इसको विस्तार से बताते हुए आपने रामकृष्ण मिशन के बोधवाक्य ‘आत्मनोः मोक्षार्थ’ का विश्लेषण किया। _”स्वयं की, अपनी आत्मा का मोक्ष कब होगा? ‘जगत् हितायच’ में। अर्थात विश्व कल्याण में। ‘मैं आप में हूं, और आप मेरे में’। यही oneness हैं। हमारा दायित्व है कि इस ज्ञान को हम विश्व में फैलाएं।”_

अमेरिका में रह रहे भारतीयों को उन्होंने कहा कि _”जो लोग भारत से बाहर दूसरे देशों में आकर बसे हैं, उनके लिए वह देश उनकी कर्मभूमि हैं। हमारा कर्तव्य क्या हैं? अगर हम अमेरिका में हैं, यही कमाते हैं, तो हम अमेरिका का ही हिस्सा हुए। ऐसे में हमें यहां सही व्यवहार करना चाहिए और अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी तरह प्रामाणिक रहना चाहिए।”_

सरसंघचालक जी के उद्बोधन को जबरदस्त और जोशपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिल रही थी। सबसे ज्यादा तालियां तब बजी, जब उन्होने कहा – *_”भारत यह आपकी, आपके पुरखों की जन्मभूमि हैं। इसलिए भारत के लिए कुछ करना संभव हैं तो अवश्य करें, किंतु आपकी जन्मभूमि आपसे अपेक्षा करती है कि जिन मूल्यों को लेकर आपका, आपके पुरखों का जीवन बना हैं, उन मूल्यों के साथ आप अपनी कर्मभूमि में कार्य करें।”_*

_”व्यक्ति, समाज और पर्यावरण, इन तीनों को एक साथ आगे बढ़ना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि व्यक्ति को दबाकर समाज का विकास हो, या समाज को दबाकर व्यक्ति का। मनुष्य को जीवन के द्वंद्वों को संतुलित करना सीखना होगा।”_

*अनेक अर्थों में यह उद्बोधन ऐतिहासिक हैं। आज की अस्थिर और विषम वैश्विक परिस्थिति में, इस अशांत वातावरण में, विश्व को आत्मविश्वास के साथ ‘विविधता में एकता’ का संदेश देना, ‘एक विश्व – एक मानवता’ को विश्व की नियति बताना, यह अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।*

इस विराट उत्सव के भारत के लिए दूरगामी सकारात्मक परिणाम होंगे यह सुनिश्चित हैं।

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