रायपुर । जुलाई का महीना है और विद्यालय, महाविद्यालयों में सत्रानुसार शिक्षा प्रारंभ हो गई है, एक प्रश्न मन में उठता है कि शिक्षा कैसी होनी चाहिए? यह प्रश्न आज की बेरोजगारी, कौशल संकट और डिग्री केंद्रित शिक्षा व्यवस्था के बीच जितना प्रासंगिक है, उतना ही प्राचीन भारतीय चिंतन में भी था। भारतीय मनीषा ने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान या आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्य के व्यावहारिक जीवन और स्वावलंबन से भी जोड़ा। महाभारत के उद्योगपर्व में विदुरनीति का एक सूत्र इसी दृष्टि को सामने रखता है:
अर्थागमो नित्यमरोगिता च, प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या, षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥
अर्थात नियमित अर्थागमन, निरोगता, प्रिय और मधुरभाषिणी पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र तथा अर्थकरी विद्या, ये मनुष्य जीवन के छह सुख हैं। इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण पद है, “अर्थकरी च विद्या”, अर्थात ऐसी विद्या जो मनुष्य को जीवन के लिए सक्षम और स्वावलंबी बनाए।
“अर्थकरी विद्या” को केवल धन कमाने वाली शिक्षा मानना इसके व्यापक अर्थ को संकुचित करना होगा। भारतीय चिंतन में “अर्थ” का अर्थ केवल मुद्रा नहीं है। उसमें प्रयोजन, उपयोगिता, साधन और जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी सम्मिलित है। इसलिए अर्थकरी विद्या वह है जो ज्ञान को जीवनोपयोगी सामर्थ्य में बदल दे।
किसान का कृषि ज्ञान, कुम्हार की मृदा पहचानने की कला, लोहार का धातु ज्ञान, बढ़ई का काष्ठ कौशल, बुनकर की वस्त्र निर्माण कला, वैद्य का औषधीय ज्ञान और स्थापत्यकार की निर्माण विद्या, ये सभी अर्थकरी विद्या के रूप हैं। आधुनिक संदर्भ में चिकित्सा, अभियांत्रिकी, कृषि विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, भाषा, पत्रकारिता, डिजाइन, पर्यटन और खाद्य प्रसंस्करण का ज्ञान भी तभी अर्थकरी है, जब वह व्यक्ति को किसी उपयोगी कार्य, सेवा अथवा सृजन के योग्य बनाता है।
अर्थकरी विद्या का सार है, ज्ञान को क्षमता में बदलना। यही वह कसौटी है जिस पर आज की शिक्षा व्यवस्था को परखा जाना चाहिए। विद्यार्थी ने कितनी पुस्तकें पढ़ीं और कितनी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपनी शिक्षा के आधार पर वह क्या कर सकता है।
विदुरनीति को केवल अर्थ और सत्ता की नीति के रूप में नहीं देखा जा सकता। महाभारत के उद्योगपर्व में विदुर धृतराष्ट्र को धर्म, विवेक, संयम, नेतृत्व, न्याय और व्यवहार की शिक्षा देते हैं। इसलिए “अर्थकरी च विद्या” को भी इसी व्यापक दृष्टि में समझना चाहिए। विदुर की दृष्टि में अर्थ और नीति विरोधी नहीं हैं। मनुष्य को समृद्धि चाहिए, लेकिन अन्यायपूर्ण समृद्धि नहीं। उसे विद्या चाहिए, लेकिन ऐसी विद्या नहीं जो अहंकार उत्पन्न करे और उसे जीवन के वास्तविक दायित्वों से विमुख कर दे।
भारतीय परंपरा का प्रसिद्ध सूत्र है, “सा विद्या या विमुक्तये”, अर्थात विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे। प्रथम दृष्टि में यह सूत्र “अर्थकरी च विद्या” से भिन्न दिखाई देता है, लेकिन दोनों में वास्तविक विरोध नहीं है। भारतीय जीवन दृष्टि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मनुष्य के चार पुरुषार्थों के रूप में स्वीकार करती है। अर्थ जीवन की आवश्यकता है और मोक्ष उसका उच्चतम लक्ष्य। वास्तव में अर्थकरी विद्या भी मनुष्य को आर्थिक पराधीनता, बेरोजगारी और असहायता से मुक्ति देती है। इसलिए आदर्श शिक्षा वह है जो मनुष्य को जीविका के योग्य भी बनाए और विवेकवान भी।
भारत की परंपरागत ज्ञान व्यवस्था में शिक्षा के अनेक प्रवाह थे। शास्त्रीय परंपरा में दर्शन, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा और साहित्य का अध्ययन होता था, वहीं परिवारों और व्यावसायिक समुदायों में कृषि, शिल्प, धातुकर्म, वस्त्र निर्माण, स्थापत्य और व्यापार का व्यावहारिक ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता था।
कृषक केवल हल चलाना नहीं जानता था। उसे मिट्टी, वर्षा, बीज, पशुधन और ऋतुचक्र का ज्ञान था। वनवासी समुदाय वनस्पतियों, औषधियों, जलस्रोतों और मौसम के संकेतों को समझते थे। शिल्पकारों के पास सामग्री, अनुपात और निर्माण तकनीक का गहरा अनुभवजन्य ज्ञान था।
आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में धीरे धीरे पुस्तकीय ज्ञान और व्यावहारिक कौशल के बीच दूरी बढ़ी। हाथ से किए जाने वाले कार्यों को निम्न समझने की सामाजिक मानसिकता ने इस दूरी को और गहरा किया। परिणाम यह हुआ कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवा भी कई बार किसी वास्तविक कार्य को करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।
“अर्थकरी च विद्या” इस मानसिकता को चुनौती देती है। वह पूछती है कि शिक्षा ने व्यक्ति में कौन सी क्षमता विकसित की? क्या वह किसी समस्या को समझ सकता है? क्या समाधान खोज सकता है? क्या कोई उपयोगी वस्तु या सेवा उत्पन्न कर सकता है? क्या वह अपने ज्ञान को समाज की आवश्यकता से जोड़ सकता है? भारत जैसे विविध देश में अर्थकरी शिक्षा को स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ना आवश्यक है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक परंपरा और आर्थिक संभावनाएं हैं।
उदाहरण के लिए भारत में वन संपदा, कृषि, लघु वनोपज, जैव विविधता, औषधीय वनस्पतियां, हस्तशिल्प, धातु शिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, पुरातत्त्व और पर्यटन में व्यापक संभावनाएं हैं। यदि स्थानीय शिक्षा इन क्षेत्रों को ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता से जोड़े, तो रोजगार की प्रतीक्षा करने वाले युवाओं के साथ अवसर उत्पन्न करने वाले युवा भी तैयार हो सकते हैं।
शिक्षा विद्यार्थी को संसार की जानकारी दे, लेकिन अपने गांव, नगर, नदी, वन, मिट्टी और समाज से अपरिचित न बनाए। वैश्विक ज्ञान और स्थानीय आवश्यकताओं का समन्वय ही अर्थकरी शिक्षा की मजबूत आधारभूमि हो सकता है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य की समृद्धि को कृषि, पशुपालन, व्यापार, खनन, वन संपदा, उद्योग और कुशल प्रशासन से जोड़ा गया है। इसका सीधा संदेश है कि किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति के पीछे ज्ञान और कौशल की बड़ी भूमिका होती है।
हर विद्यार्थी प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता है, चिकित्सक, अभियंता, अधिवक्ता इत्यादि बनना चाहता है, लेकिन शिल्पकार नहीं। जो शिल्पकार्य ही नगद अर्थ अर्जन करता है, उसे लोग छोड़ते जा रहे हैं, परम्परागत शिल्प व्यवसाय को छोड़कर भले ही जोमेटो, स्वीगी ब्लिंकिट इत्यादि के डिलवरी बॉय बनकर घूमते रहें। अर्थकरी शिक्षा बेरोजगारी दूर करने के लिए उत्तम है, महंगी डिग्री अर्थकरी होने की गारंटी नहीं है। यदि बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी विद्यार्थी ज्ञान, कौशल और आजीविका के स्तर पर असहाय है, तो शिक्षा की कीमत और उसकी उपयोगिता के बीच अंतर स्पष्ट है।
शिक्षा केवल धन कमाना भी नहीं सिखा सकती। उसे अर्थकरी के साथ संस्कारकरी और विवेककरी होना चाहिए। वह कौशल दे, लेकिन चरित्र भी बनाए। प्रतिस्पर्धा की क्षमता दे, लेकिन सहयोग की भावना समाप्त न करे। तकनीक दे, लेकिन उसके नैतिक उपयोग का विवेक भी दे। आत्मनिर्भर बनाए, लेकिन समाज के प्रति उत्तरदायित्व से विमुख न करे। ऐसे समय में भारत की प्राचीन गुरुकुल पद्धति का स्मरण होता है, जो विद्यार्थी का सर्वांगिण विकास कर उसे भविष्य के लिए तैयार करती थी।
आज विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों, सभी को यह प्रश्न स्वयं से पूछना होगा कि शिक्षा का अंतिम परिणाम क्या है? केवल अंकसूची और उपाधि या ज्ञान के साथ वास्तविक क्षमता? भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जो नौकरी के लिए आवेदन करना ही न सिखाए, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अवसर का निर्माण करना भी सिखाए। जो युवा को केवल किसी पद का आकांक्षी न बनाए, बल्कि सृजनकर्ता, उत्पादक, शोधकर्ता, उद्यमी और उत्तरदायी नागरिक बनाए।
महाभारत की विदुरनीति का प्राचीन सूत्र आज भी शिक्षा जगत के सामने एक सीधा प्रश्न रखता है: क्या हमारी विद्या वास्तव में अर्थकरी है? यही “अर्थकरी च विद्या” की आधुनिक प्रासंगिकता है और संभवतः भारतीय शिक्षा चिंतन का वह भूला हुआ सूत्र भी, जिसकी ओर लौटना आज समय की आवश्यकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं)



