पटना। लालू प्रसाद यादव को बिहार सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा दे दी। अब चोरों की सुरक्षा पुलिस की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। चोर पकड़ने वाले जवान चोर की चौकीदारी पर तैनात। क्या मज़ाक है! आत्मसम्मान की चिंता? अरे, आत्मसम्मान तो चारा घोटाले में ही बिक गया था। अब बचा-खुचा सम्मान सरकारी खर्चे पर बुलेटप्रूफ गाड़ियों में सुरक्षित।
कल्पना कीजिए एक सिपाही की। सुबह उठकर वह चोर-डकैत पकड़ने का सपना देखता है, लेकिन आज्ञा मिलती है— “जाओ, लालू जी की गाड़ी के आगे-पीछे दौड़ो। कोई उन पर उंगली उठाए तो एक्शन लो।” सिपाही सोचता होगा, “मैंने पुलिस जॉइन की चोर पकड़ने के लिए या चोर की रक्षा करने के लिए?” उसका आत्मसम्मान कुचला जा रहा है। वह देख रहा है कि चोरी अगर पकड़ी भी गई तो जेड सुरक्षा, परिवार सुखी और बिहार के टैक्सपेयर का पैसा सुरक्षा पर। ईमानदारी का मजाक बन गया है।
यह व्यंग्य नहीं, बिहार की सच्चाई है। अदालत ने लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में दोषी ठहराया। सजा हुई। फिर भी पुलिस उनकी सुरक्षा में लगी हुई है। पुलिस का काम अपराध रोकना है, अपराधी की सेवा करना नहीं। अगर सजा पाए नेता को VIP सुरक्षा मिलती है तो फिर ईमानदार नागरिक और जवान का मूल्य क्या? यह दोहरा मापदंड बिहार राजनीति का सबसे काला चेहरा है।
लालू प्रसाद अपने समाज के लिए यादव गौरव नहीं हो सकते। यदि समाज को गर्व करना होगा तो यादव समाज से नित्यानंद राय हैं। दक्षिण दिल्ली से विधायक गजेन्द्र यादव हैं। भूपेन्द्र यादव हैं। राकेश यादव हैं। उनके बीच ऐसे अनेक नाम हैं, जिन पर पूरा देश गर्व कर सकता है। शिक्षा और विचार क्षेत्र में श्यामलाल यादव जैसे प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। इतिहासकार डॉ. के.सी. यादव ने ज्ञान की रोशनी फैलाई। कृषि क्षेत्र में हंशदास यादव जैसे सफल किसान ने दिखाया कि मेहनत से खेती को नई ऊंचाई दी जा सकती है। खेल में अजय यादव जैसे पावरलिफ्टर ने गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। राजपाल यादव, रघुबीर यादव जैसे कलाकारों ने मनोरंजन जगत में अपनी पहचान बनाई। ये नाम मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष से यादव समाज को सिर ऊंचा करके जीने की प्रेरणा देते हैं।
लालू प्रसाद की चोरी से यादव समाज का कोई भला नहीं हुआ। सारी कमाई उनके बेटे-बेटियों की जिंदगी को आसान बनाने में लगी। जिन्होंने कभी खेत में हल नहीं चलाया, कभी मजदूरी नहीं की, कभी पसीना नहीं बहाया। विलासिता, विदेश यात्राएं, महंगी गाड़ियां-सब चोरी की कमाई से। यदि किसी साहसी ने उनके वृहत परिवार की दिनचर्या सार्वजनिक कर दी-सुबह ब्रेकफास्ट से लेकर शाम की पार्टी तक का खर्च, संपत्ति का स्रोत-तो पूरा यादव समाज उनकी वास्तविकता देख लेगा। मेहनत की कमाई और लूट की कमाई में फर्क स्पष्ट हो जाएगा।
चोरी के अलावा कौन सा धंधा इतनी भारी-भरकम संपत्ति जमा करा सकता है? कोई जादू? कोई चमत्कार? नहीं। सिर्फ सरकारी खजाने की लूट। और लूट पकड़ी जाने के बाद भी परिवार सत्ता और सुविधाओं का भोग कर रहा है। बेटे मंत्री, बेटियां सांसद। यह लोकतंत्र नहीं, वंशवाद का चोरी वाला रूप है। यादव समाज के युवा देख रहे हैं-क्या यही आदर्श है? चोरी करो, पकड़े जाओ, फिर भी सुरक्षा और सत्ता मिलेगी? निश्चित तौर पर उत्तराधिकारी तो अपने खानदान का ही होगा। फिर यादव समाज के नेता किस बात के, जब चिंता सिर्फ अपने खानदान की ही करनी है।
यदि ऐसे चोर यादव समाज के आइकन बनेंगे तो उन असली आदर्शों का क्या होगा? जिन्होंने मेहनत, शिक्षा और ईमानदारी से यादव समाज को आगे बढ़ाया। नेताओं ने, विचारकों ने, सफल किसानों और खिलाड़ियों ने जो रास्ता दिखाया, उसे चोरों के कदम कुचल नहीं सकते। कम से कम एक चोर यादव समाज के लिए वह काम कभी नहीं कर सकता जो मेहनती यादव कर रहे हैं-समाज को सच्ची ऊंचाई देने का।
बिहार की जनता देख रही है। टैक्स का पैसा चोर की सुरक्षा पर, जबकि स्कूलों में टीचर नहीं, अस्पतालों में दवा नहीं। प्राथमिकता गलत है। सरकार को पहले उन गरीब यादव किसानों की सुरक्षा करनी चाहिए जो खेतों में मेहनत करते हैं।
यादव समाज अपने सच्चे हीरोज-मेहनती किसान, शिक्षाविद्, खिलाड़ी और ईमानदार नेता-पर गर्व करे। चोर आइकन नहीं बन सकते। सच्ची प्रगति मेहनत से आती है, लूट से नहीं।



