रणबीर कपूर की ‘रामायण’: मर्यादा का गुनगान या बहु-संस्करणों और सूफी-एजेंडे की फिल्म?

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दिल्ली। कल पाँच नवंबर 2026 को नितेश तिवारी निर्देशित, नमित मल्होत्रा निर्मित ‘रामायण पार्ट 1’ दुनियाभर में रिलीज हो रही है। रणबीर कपूर राम, यश रावण, साई पल्लवी सीता और ए.आर. रहमान संगीत के साथ यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी प्रोडक्शन्स में से एक बताई जा रही है। निर्देशक स्वयं कहते हैं कि आधार वाल्मीकि रामायण है, लेकिन कॉमरेड डॉ बोधिसत्व का नाम जुड़ने के बाद रामयण को लेकर फिल्म निर्माता के नियत पर संदेह होना स्वाभाविक है। “300 से अधिक रामायणों” और मौखिक परंपराओं के तत्व शामिल किए गए हैं। बोधि जैसे लेखक वाल्मिकी में नहीं एके रामानुजन की विवादित पुस्तक थ्री हंड्रेड रामायणाज में विश्वास रखते हैं। यही बात आस्थावान रामभक्तों के लिए मूल चिंता का कारण बन गई है।
वाल्मीकि से आगे: 300 रामायणों का खुला समर्थन

नितेश तिवारी ने बार-बार कहा है कि अधिकतम समय “वाल्मीकि के बेस टेक्स्ट के साथ अन्य संस्करणों की खूबसूरत कहानियों को शामिल करने में लगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में 300 से अधिक रामायणें हैं और हर संस्करण को अपनाया जाता है।

यह भाषा एके रामानुजन की किताब ‘थ्री हंड्रेड रामायणाज’ से सीधे मेल खाती है, जो वाल्मीकि को एकमात्र या प्राथमिक नहीं मानता। रामानुजन के निबंध को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटाने का विवाद याद हो तो समझ आता है कि ‘बहु-संस्करण’ वाला दृष्टिकोण कितना संवेदनशील रहा है। जब रिसर्च और स्क्रीनप्ले टीम में ऐसे लोगों का प्रभाव माना जाता है जो इस दृष्टिकोण के समर्थक रहे हों, तो आस्थावान दर्शक स्वाभाविक रूप से पूछते हैं कि फिल्म ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की कथा कहेगी या ‘एक से बढ़कर एक’ वैकल्पिक कहानियों का मिश्रण प्रस्तुत करेगी।

देश में जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी (चित्रकूट), कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) में संस्कृत के प्रोफेसर प्रो. रॉबर्ट पी. गोल्डमैन, डॉ. राम अवतार शर्मा (श्री राम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास), श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा’ के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज जैसे विद्वान उपलब्ध हैं, जिन्होंने वाल्मीकि परंपरा में गहरी आस्था के साथ काम किया है। उनकी जगह जब ‘सेकुलर’ सलाह और बहु-संस्करण वाला नजरिया हावी दिखे, तो फिल्म ‘सेकुलर रामायण’ कहलाने का आरोप लगना स्वाभाविक है।

संगीत में सूफी रंग: राम का गीत या कुन फया कुन की प्रतिध्वनि?

सबसे स्पष्ट ‘एजेंडा’ की झलक गीतों में मिली। ए.आर. रहमान का ‘मंगल रंग’ रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर आलोचना हुई। कई श्रोताओं ने इसे ‘कव्वाली-कोडेड’ या ‘सूफी-स्टाइल’ बताया और ‘कुन फया कुन’ (रॉकस्टार, 2011) से तुलना की।

‘कुन फया कुन’ खुद सूफी परंपरा और निजामुद्दीन औलिया से जुड़ा है। राम-सीता के मिलन या अयोध्या आगमन पर ऐसा संगीत सुनकर कई भक्तों ने कहा कि पवित्र इतिहास को नियमित बॉलीवुड टेम्पलेट में ढाल दिया गया।
रणबीर-रहमान की जोड़ी वही रही, लेकिन संदर्भ बदल गया। जब कहीं पर कुछ नहीं था वाली पंक्तियाँ अब राम के गीत में गूंजने लगीं, तो सवाल उठा कि यह मर्यादा का गान है या वैश्विक-सूफी मिश्रण।

सीता का नो-मेकअप लुक और प्रोडक्शन की प्राथमिकताएँ

साई पल्लवी का नो-मेकअप या मिनिमल मेकअप लुक उनकी पहचान है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वे फिल्मों में आमतौर पर सिर्फ काजल या बाइंड का इस्तेमाल करती हैं और प्राकृतिक रूप पसंद करती हैं।

कुछ आलोचक इसे ‘वास्तविक सीता’ कहते हैं, लेकिन आस्थावान दर्शक पूछते हैं कि माता सीता के दिव्य स्वरूप और पारंपरिक चित्रण को पूरी तरह किनारे करके ‘रियलिस्टिक’ प्राथमिकता देना क्या आस्था का सम्मान है। बिना आस्था के रिसर्च और सलाह के साथ बनाई गई फिल्म में ऐसे निर्णय ‘सेकुलर कंटेंट’ की ओर इशारा करते हैं।

रिसर्च टीम और गिलहरी वाला तर्क

जब रिसर्च टीम में ऐसे नाम जुड़ते हैं जिनके राम ‘कभी हुए ही नहीं’ या जो बौद्ध-जातक या वैकल्पिक कथाओं को प्राथमिक मानते हैं, तो सेतु निर्माण में गिलहरी का योगदान बताना ‘पचास लीटर दूध में चुटकी भर नमक’ जैसा लगता है। मुख्य धारा वाल्मीकि परंपरा से हटकर छोटी-छोटी मौखिक या क्षेत्रीय कहानियों को केंद्र में लाना फिल्म को ‘एजेंडा फिल्म’ बना देता है। कॉमरेड बोधिसत्व जैसे नामों का उल्लेख होते ही कई रामभक्तों के मुंह से निकलता है – क्या यही दिन देखना बाकी था?

निर्देशक नीतेश तिवारी, लेखक श्रीधर राघवन और निर्माता नमित मल्होत्रा की टीम ने भव्यता और VFX पर जोर दिया है, लेकिन आस्था और मर्यादा के मूल पर सवाल उठ रहे हैं। गीतों ने झलक दे दी, बहु-संस्करणों का खुला समर्थन दे दिया, और रिसर्च सलाह की वामपंथी दिशा ने बाकी सहानुभूति भी समाप्त कर दी।

डॉ. बोधिसत्व का नाम पढ़ने के बाद मैंने तय किया है कि इस फिल्म को ना देखने जाऊँगा और ना किसी को यह फिल्म देखने की सलाह दूँगा। रामायण के इस देश में एक से बढ़कर एक विद्वान हैं; उनसे निवेदन करने के बजाय जब ‘जब कहीं पर कुछ नहीं था’ वाला मिश्रण चुना गया, तो आस्थावान दर्शक के लिए यह फिल्म ‘राम के युग का आरंभ’ नहीं, बल्कि अपनी ही परंपरा से समझौते का आरंभ लगती है।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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