ट्रंप को जनता का झटका! अमेरिका में सत्ता का संतुलन बदला, दुनिया में हलचल

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बेंगलूरु: क्या डोनाल्ड ट्रंप को आखिरकार जनता ने आईना दिखा दिया? क्या दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति को भी वोटरों के गुस्से के आगे झुकना पड़ सकता है? और जब जीत का दावा करने वाला नेता चुनावी मैदान में चारों खाने चित हो जाए, तो इतिहास उसे किस नजर से देखेगा?
2026 के मध्यावधि चुनावों ने अमेरिकी राजनीति में भूचाल ला दिया है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर कब्जा जमा लिया है। रिपब्लिकन पार्टी को करारी शिकस्त मिली है। कई अहम सीटें हाथ से निकल गई हैं। संदेश साफ है। अमेरिकी मतदाता अब ट्रंप की नीतियों से खुश नहीं हैं।
खुद ट्रंप ने भी माना है कि ईरान युद्ध ने उनकी पार्टी को नुकसान पहुंचाया। महंगा पेट्रोल, बढ़ती महंगाई, आर्थिक बेचैनी और उनकी मनमानी कार्यशैली से नाराजगी ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया।
जो राष्ट्रपति हर वक्त अपनी ताकत का ढोल पीटते थे, उन्हें अब जनता की आवाज सुननी पड़ेगी।

इतिहास डोनाल्ड ट्रंप को कैसे याद करेगा? इस सवाल पर आने वाले वर्षों में खूब बहस होगी।
उनके समर्थक कहेंगे कि ट्रंप ने पुरानी विदेश नीति को चुनौती दी। सीमा सुरक्षा मजबूत की और अमेरिकी हितों को प्राथमिकता दी। उन्होंने उस राजनीतिक प्रतिष्ठान को हिलाया, जो बरसों से सत्ता के गलियारों में जमा बैठा था।
आलोचक दूसरी तस्वीर पेश करेंगे। उनके मुताबिक, ट्रंप की टैरिफ नीति ने व्यापार को नुकसान पहुंचाया। ईरान युद्ध ने अमेरिका को महंगा पड़ाव दिखाया। लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा और अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता पैदा हुई।
शायद इतिहास का फैसला मिला-जुला होगा। ट्रंप एक ऐसे नेता साबित होंगे, जिन्होंने व्यवस्था को हिलाया जरूर, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम नहीं लगा पाए।
उनके दूसरे कार्यकाल का शिखर शायद जल्दी आ गया। मध्यावधि चुनावों ने उनके पर कतर दिए हैं।

दुनिया की निगाहें वाशिंगटन पर टिकी थीं। चुनावी नतीजों ने अलग-अलग राजधानियों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं।
ईरान ने इसे युद्ध के खिलाफ अमेरिकी जनता का फैसला बताया। उसके शीर्ष वार्ताकार ने इसे साफ शब्दों में ‘युद्ध को ना’ का संदेश कहा। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने भी इस जनादेश का स्वागत किया।
लेकिन तेहरान को जल्दबाजी नहीं है। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने साफ किया है कि अमेरिका की ईरान विरोधी नीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।
संसद में डेमोक्रेट बहुमत का मतलब यह नहीं कि व्हाइट हाउस की विदेश नीति रातोंरात बदल जाएगी।
चीन ने संभलकर प्रतिक्रिया दी। उसने चुनाव को अमेरिका का आंतरिक मामला बताया। साथ ही दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई।
लेकिन चीनी सोशल मीडिया पर ट्रंप की हार का जश्न भी मनाया गया। बीजिंग समझता है कि कमजोर ट्रंप के लिए व्यापार युद्ध चलाना आसान नहीं होगा।
फिर भी चीन और अमेरिका के बीच मुकाबला खत्म नहीं होगा। तकनीक, व्यापार, ताइवान और वैश्विक प्रभाव को लेकर खींचतान जारी रहेगी।

भारत के लिए यह नतीजा अवसर भी है और चुनौती भी।
भारत-अमेरिका संबंधों को दोनों पार्टियों का समर्थन हासिल है। यह रिश्ता किसी एक राष्ट्रपति की मर्जी पर निर्भर नहीं है।
लेकिन ट्रंप ने दोस्ती के साथ कारोबार का दबाव भी खूब मिलाया है। टैरिफ, रूसी तेल की खरीद और वीजा संबंधी पाबंदियों ने भारत को असहज किया है।
डेमोक्रेटिक नियंत्रण से ट्रंप की व्यापारिक मनमानी पर कुछ लगाम लग सकती है। भारत को राहत मिल सकती है।
फिर भी नई दिल्ली को खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए। अमेरिकी विदेश नीति की कमान अब भी राष्ट्रपति के हाथ में है। भारत को आगे भी दोस्ती, दबाव और अचानक बदलते मिजाज के बीच रास्ता निकालना होगा।
कूटनीति में दोस्ती और व्यापार अक्सर अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं!

लैटिन अमेरिकी देशों की प्रतिक्रिया फिलहाल बहुत मुखर नहीं है। वामपंथी सरकारें ट्रंप की एकतरफा नीतियों पर लगाम लगने से राहत महसूस कर सकती हैं।
दूसरी ओर, उनके दक्षिणपंथी समर्थकों को अमेरिकी सत्ता के नए समीकरण से परेशानी हो सकती है।
लेकिन लैटिन अमेरिका की अपनी राजनीतिक और आर्थिक समस्याएं हैं। अमेरिकी चुनाव से वहां रातोंरात कोई क्रांति होने वाली नहीं है।
क्या दुनिया नई करवट ले रही है?
यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या ये सारी घटनाएं अलग-अलग तूफान हैं या किसी बड़े बदलाव के संकेत?
यूरोप युद्ध, ऊर्जा संकट और राजनीतिक खींचतान से परेशान है। पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर बैठा है। चीन और अमेरिका के रिश्ते कभी गर्म, कभी नरम रहते हैं। भारत को भी वाशिंगटन के बदलते मिजाज से जूझना पड़ता है।

अमेरिका के नेतृत्व वाली पुरानी वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। बहुध्रुवीय दुनिया का नया नक्शा उभर रहा है। चीन, भारत और क्षेत्रीय ताकतें अब अपने हितों के लिए ज्यादा स्वतंत्रता चाहती हैं।
यूरोप अपनी अलग रणनीतिक पहचान तलाश रहा है। पश्चिम एशिया के देश अपने समीकरण बना रहे हैं। भारत अपनी पुरानी रणनीतिक स्वायत्तता पर कायम है।
अब कोई भी अपनी सारी उम्मीदें अमेरिका की एक टोकरी में नहीं रखना चाहता।
इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिकी ताकत खत्म हो गई है। लेकिन दुनिया अब आंख मूंदकर अमेरिकी नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
क्या कमजोरों की आवाज बुलंद हुई?
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू आम अमेरिकियों की नाराजगी है।
महंगाई से परेशान कामकाजी परिवार, भविष्य को लेकर चिंतित युवा, बेहतर प्रतिनिधित्व मांगते अल्पसंख्यक और युद्ध से ऊबे नागरिकों ने अपनी ताकत दिखाई है।
अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर का चुनाव भी एक प्रतीकात्मक उपलब्धि है।
लेकिन क्या यह स्थायी राजनीतिक बदलाव की शुरुआत है? अभी कहना मुश्किल है।
मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ दल को अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। डेमोक्रेटिक जीत भी काफी हद तक ट्रंप विरोधी मतों का गठबंधन है। इसका मतलब यह नहीं कि सभी मतदाता उनकी नीतियों पर एकमत हैं।
कमजोरों को माइक तो मिल गया है, लेकिन संगीत कौन बदलेगा, यह देखना बाकी है।
आखिर दुनिया को क्या संदेश मिला?
ट्रंप की हार का मतलब अमेरिका का अंत नहीं है। न ही दुनिया ने अचानक वाशिंगटन से मुंह मोड़ लिया है।
लेकिन एक बात साफ हो गई है। ताकत, शोर और व्यक्तिगत प्रचार के सहारे हमेशा सत्ता नहीं चलाई जा सकती। जनता को अच्छे शासन, सस्ती जिंदगी और शांति भी चाहिए।
नई कांग्रेस अब ट्रंप की टैरिफ नीति पर सवाल उठा सकती है। युद्ध के फैसलों को चुनौती दे सकती है और जवाबदेही की मांग कर सकती है। फिर भी राष्ट्रपति के पास विदेश नीति के व्यापक अधिकार बने रहेंगे।
आने वाले महीने ट्रंप की राजनीतिक सूझबूझ और कूटनीतिक समझ की परीक्षा लेंगे।
इतिहास शायद ट्रंप को ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद करे, जो अमेरिका और दुनिया का नक्शा बदलना चाहते थे, लेकिन अपने ही देश के मतदाताओं का मिजाज नहीं समझ पाए।

और शायद यही 2026 के मध्यावधि चुनावों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है!

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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