बंटवारा की समीक्षा, जहाँ शनि होकर भी नहीं हैं और आमिर ना होकर भी हैं 

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सर्वेश
गोपालगंज, बिहार। फिल्म अपलोड कर दी है। सन्नी फिल्म में हो कर भी नहीं हैं, आमिर फिल्म में नहीं हो कर भी हैं। सो यह फिल्म आमिर खान की ही कही जाय तो ठीक होगा…
एक दृश्य है, पाकिस्तान में एक मौलाना साहब के सामने वहां का गुंडा कहता है, ” एना काफ़िरा ने हम पे बड़ा जुल्म कित्ता है जी, मैंने अपने मुसलमान भाइयों दा कत्लेआम देखा है…” इसपर मौलाना साहब का पवित्र उत्तर सुनिए, “तो तू भी वही करना चाहता है पुत्तर?” यह बातचीत पाकिस्तान के लाहौर में हो रही है। मतलब जो लाहौर एक झटके में हिंदुओं से खाली करा लिया गया, जहां के हजारों लोग काट डाले गए, स्त्रियों को नोच डाला गया, सारी संपत्ति हड़प ली गई, वहां का व्यक्ति काफिरों द्वारा जुल्म किए जाने की बात करता है और बुजुर्ग कहते हैं कि तुम भी उनके जैसा बनना चाहते हो? वाह… क्या बात है… यह है असगर वाहियात का एजेंडा…
पूरी फिल्म यह दिखाना चाहती है कि बंटवारे के समय जो हुआ वह क्षणिक आक्रोश था, वरना पाकिस्तानी लोग बिल्कुल ही सज्जन हैं। वे अमन चैन के साथ जीने वाले लोग हैं, उन्हें दूसरे धर्म के लोगों से घृणा नहीं है, वे अब से मिल जुल कर रहने वाले लोग हैं? क्या संसार का कोई मूर्ख व्यक्ति भी यह बात मानेगा?
कहानी भारत से भाग कर पाकिस्तान गए सिकंदर मिर्जा की है जिन्हें वहां रहने को एक बड़ी हवेली अलॉट की जाती है, जो रतनलाल जौहरी की हवेली है। रतनलाल दंगों में मारे जा चुके हैं, लेकिन उनकी मां हवेली में ही रह कर उनका इंतजार कर रही है। शुरुआती आपत्ति के बाद सिकंदर मिर्जा उस बुढ़िया से स्नेह करने लगते हैं, उसे अपनी मां मान लेते हैं, उसके लिए लाहौर भर से लड़ने लगते हैं, और उसकी मृत्यु पर स्वयं उसे मुखाग्नि देते हैं। और लाहौर के लोग उनके साथ इस तरह खड़े हैं कि बुढ़िया की शव यात्रा में हजारों लोग जाते हैं। वाह… तालियां…
फिल्म कहती है कि सिकंदर मिर्जा बुढ़िया को घर में रहने देते हैं, यह बड़ी और प्यारी बात है। मैं देखता हूं, सिकंदर मिर्जा रतननाथ की शानदार हवेली को कब्जा कर के उसकी सारी संपत्ति के मालिक बनते हैं, यह कितनी अमानवीय बात है…
फिल्म कहती है, सिकंदर मिर्जा रतन की मां को कंधा देते हैं, उसे मुखाग्नि देते हैं, यह कितनी बड़ी और सुंदर बात है। मैं देखता हूं, उस एक बेटे की मां को किसी दूसरे के हाथ से मुखाग्नि मिलती है, यह कितनी बड़ी त्रासदी है… उसके बेटे बहू और मासूम पोती को जिन्दा जला कर मारने वाले यदि उसकी शवयात्रा के पीछे चार कदम चल पड़ें तो क्या वे अच्छे हो जाते हैं? दुर्गा देवी का रतनलाल, सावित्री और शांति को सिकन्दर, हमीदा और तन्नो में ढूंढना और पाना सौभाग्य नहीं, त्रासदी है।
संसार का कोई लेखक, कोई फिल्मकार, कोई अभिनेता लाहौर के उन राक्षसों के पाप को झुठला नहीं सकता जिन्होंने एक झटके में ही लाखों लोगों को मार काट कर खत्म कर दिया… असगर वाहियात अपनी झूठी किताब में एक एजेंडा परोसते हैं और आमिर उस एजेंडे को अपनी फिल्म में ढोते हैं, पर इससे सत्य नहीं बदलेगा। समय के न्यायालय में पाकिस्तान और वहां के लोग हमेशा अपराधी की तरह ही खड़े मिलेंगे…
रतनलाल की हवेली आंखों पर नाच रही है। अपनी बुद्धि केवल हवेली बनाने में ही लगाने वाले रतनलालों की आगे भी यही गति होनी है…

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