वस्तुत: अमेरिका के इस बदले हुए रुख को पाकिस्तान पर भारत की स्थायी कूटनीतिक विजय या वॉशिंगटन के हमेशा के लिए नई दिल्ली के पक्ष में खड़े हो जाने के रूप में देखना रणनीतिक भूल होगी। अमेरिका का भारत को लेकर पूर्व का रुख स्वयं इस बात का गवाह है कि वह परिस्थितियों के बदलते ही अपने मित्र, साझेदार और प्राथमिकताएं बदलता रहा है, इसलिए आज पाकिस्तान को लेकर अमेरिका की भाषा भारत के लिए सुखद भले हो, लेकिन इसे अंतिम सत्य मान लेना दूरदर्शिता नहीं होगी।
हां, सर्जियो गोर की इस यात्रा को भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत जरूर माना जाना चाहिए। पाकिस्तान के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि कश्मीर को लेकर वॉशिंगटन की सार्वजनिक भाषा पहले जैसी नहीं रही। पर ध्यान देने योग्य यहां यह भी है कि सकारात्मक संकेत और स्थायी नीति में अंतर होता है। भारत को इस अंतर को समझना होगा, जो लोग सर्जियो गोर के दिए बयान पर ज्यादा खुश हो रहे हैं, और इसे बड़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहे हैं, वे ज्यादा खुश न हों। ये अमेरिका है!
वस्तुत: आज जो लोग अमेरिका के इस रुख से उत्साहित होकर मान रहे हैं कि वॉशिंगटन ने पाकिस्तान को पूरी तरह छोड़ दिया है, उन्हें अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास एक बार फिर पढ़ना चाहिए। शीतयुद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिका ने पाकिस्तान को सोवियत प्रभाव के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बनाया था। पाकिस्तान को सैन्य गठबंधनों से जोड़ना और उसे बड़े पैमाने पर सैन्य सहायता देना उस समय अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था।
1950 और 1960 के दशक में पाकिस्तान को मिले अमेरिकी हथियारों ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया। पाकिस्तान को मिले पैटन टैंक और एफ-86 जैसे हथियार बाद में भारत-पाकिस्तान युद्धों में भारत के सामने इस्तेमाल हुए। उस समय अमेरिका का प्राथमिक लक्ष्य भारत की सुरक्षा चिंताओं से अधिक अपने वैश्विक सामरिक हितों की रक्षा करना था। जिसे आज भी नहीं भूलना चाहिए। ये वही अमेरिका है जोकि किसी देश से स्थायी मित्रता नहीं करता, बल्कि अपने हितों के अनुरूप साझेदारी करता है।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों का सबसे चर्चित और भारत के लिए सबसे असहज अध्याय 1971 के युद्ध के दौरान सामने आया। तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के साथ खड़े थे। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने इस्लामाबाद को पूरी तरह अलग-थलग नहीं किया, बल्कि जहां जरूरत पड़ी वह पाकिस्तान के साथ खड़ा था।
युद्ध के निर्णायक दौर में अमेरिकी सातवें बेड़े की गतिविधियों को भारत पर दबाव के संकेत के रूप में देखा गया। भारत ने उस समय अपनी सैन्य और कूटनीतिक शक्ति के बल पर परिस्थिति को अपने पक्ष में बदला और अंततः बांग्लादेश का जन्म हुआ, अन्यथा तो इस अमेरिका ने भारत को कमजोर करने एवं पाकिस्तान से हार जाने के लिए हर परिस्थिति पैदा करने का प्रयास किया ही था।
1979 के बाद अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप ने पाकिस्तान को फिर अमेरिकी योजना-कुटनीति के केंद्र में ला दिया। रोनाल्ड रीगन प्रशासन के दौर में पाकिस्तान अमेरिका का “फ्रंटलाइन स्टेट” बना। उसे आर्थिक और सैन्य सहायता मिली। F-16 लड़ाकू विमानों सहित हथियारों की आपूर्ति हुई और पाकिस्तान की खुफिया संरचना को अफगान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका मिली। इसके दूरगामी प्रभाव सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहे। पाकिस्तान में विकसित हुआ आतंकवादी ढांचा बाद के वर्षों में भारत के लिए भी गंभीर चुनौती बना।
कश्मीर में आतंकवाद और सीमा पार से होने वाली हिंसा के दौर ने भारत की सुरक्षा को लंबे समय तक प्रभावित किया, इसलिए भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका जिस पाकिस्तान को एक समय आतंकवाद के खिलाफ सहयोगी मानता था, वही पाकिस्तान बाद में अमेरिकी नीति के लिए भी समस्या बन गया।
1990 के दशक में कश्मीर पर अमेरिकी प्रशासन के भीतर ऐसे बयान भी सामने आए जिनसे भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई, लेकिन 1999 का कारगिल युद्ध अमेरिकी नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर सैन्य वापसी के लिए दबाव बनाया। इस परिवर्तन को लेकर हम सभी को यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि उक्त घटनाक्रम भारत के प्रति अमेरिकी प्रेम का परिणाम नहीं था। बदलती वैश्विक परिस्थितियां, पाकिस्तान की भूमिका और दक्षिण एशिया में अमेरिकी हित इसके पीछे महत्वपूर्ण कारक थे। अत: यही बात वर्तमान परिस्थिति पर भी लागू होती है।
आज अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना करने के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है। भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था, सैन्य क्षमता, तकनीकी क्षमता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भूमिका ने उसकी उपयोगिता अमेरिका के लिए बहुत बढ़ा दी है, इसलिए अमेरिका का भारत की ओर झुकाव वास्तविक है, किंतु इसका आधार अमेरिकी हित हैं न कि मानवीयता, मित्रता, भूगोल या अन्य कुछ।
सच यही है कि अमेरिका यदि भविष्य में किसी ऐसे क्षेत्रीय समीकरण की आवश्यकता महसूस करता है जिसमें पाकिस्तान उपयोगी हो, तो वॉशिंगटन उसके साथ फिर से निकटता बढ़ा सकता है। यही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वभाव है। अमेरिका ने कई बार यही किया है। जिस पाकिस्तान को कभी सोवियत संघ के खिलाफ सबसे उपयोगी सहयोगी माना गया, उसी पाकिस्तान से बाद के वर्षों में आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिकी असंतोष खुलकर सामने आया। जिस भारत पर कभी कश्मीर को लेकर दबाव डाला गया, वही भारत आज अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत रणनीति का प्रमुख साझेदार है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत को अमेरिका के बदले रुख से प्रसन्न होने के बजाय यह समझना चाहिए कि अमेरिका का रुख क्यों बदला है। भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य और वैश्विक प्रभाव ने उसे ऐसी स्थिति में पहुंचाया है जहां दुनिया की बड़ी शक्तियां उसकी अनदेखी नहीं कर सकतीं। वस्तुत: यही भारत की वास्तविक उपलब्धि है।
सर्जियो गोर का श्रीनगर पहुंचकर जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा कहना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। सुरक्षा व्यवस्था की सराहना और यात्रा सलाह की समीक्षा की संभावना भी सकारात्मक संकेत हैं। पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे पुराना सत्य आज भी वही है, स्थायी मित्रता नहीं होती, स्थायी हित होते हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि वह अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करे, परन्तु अपनी शक्ति, अपनी कूटनीति और अपनी स्वायत्तता को किसी भी बाहरी शक्ति से ऊपर रखे और हम सब भी सर्जियो गोर के श्रीनगर में मुस्कुराते चेहरे को देखकर ज्यादा खुश न हों।



