दिल्ली । योग का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। इसका उल्लेख रामायण और महाभारत के कालखंड से लेकर भगवान शिवजी, भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों में मिलता है। ऋग्वेद में ऋषियों द्वारा ध्यान, तप और आत्मा की खोज का उल्लेख मिलता है, जो योग की प्रारंभिक चेतना को दर्शाता है। उपनिषदों में यह चेतना और विकसित होकर ‘प्रणव साधना’, ‘ध्यान योग’ और ‘ब्रह्मविद्या’ के रूप में दर्शन की परिपक्व अवस्था में पहुँचती है।
योग को विधिपूर्वक और व्यवस्थित रूप में महर्षि पतंजलि ने प्रस्तुत किया। उनके द्वारा रचित ‘योगसूत्र’ में योग को केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन के समग्र दर्शन के रूप में प्रतिपादित किया गया। योग का व्यावहारिक पक्ष हठयोग के माध्यम से अधिक विस्तारित हुआ, जिसका वर्णन घेरण्ड संहिता, हठयोग प्रदीपिका और शिव संहिता जैसे ग्रंथों में मिलता है। मध्यकाल में योग का प्रसार संत परंपरा के माध्यम से हुआ – जैसे गुरु गोरखनाथ, गोस्वामी तु
आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, श्री अरविंद, महर्षि महेश योगी आदि योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने वाले प्रमुख साधक और विचारक बने। आज योग भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है। वह केवल स्वास्थ्य या व्यायाम की पद्धति नहीं, बल्कि आत्मविकास, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक मार्ग है।
योग – भारतीय वेदों और दर्शनों और सम्प्रदायों में
‘भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व वेदात् प्रसिध्यति’ (मनु १२।९७) के अनुसार योग का मूल वेदों में निहित है।
ऋग्वेद में योग का उल्लेख अत्यं
यजुर्वेद के मंत्रों में हमें क
यजुर्वेद की एक ऋचा इन प्राणों को ऋषि कह कर संबोधित करती है। शरीर में विद्यमान प्राण रूप यह ऋषि ही मन-मस्तिष्क को ऋषि रूप में विकसित और प्रतिष्ठापित करते हैं। ऋषि अर्थात् अंतर्निहित तथ्यों और रहस्यों को यथावत जानने समझने की दृष्टि विशेष। तार्किक और बौद्धिक उत्कर्ष की चरमावस्था है यह ऋषित्व। ऋषित्व के अभाव में शास्त्रोक्त तथ्यों और विष्ट गानों का सम्यक परिज्ञान असंभव प्रायः ही है। योगचर्या के अभाव में ऋषित्व की प्राप्ति असंभाव्य है। अतः स्पष्ट ही है कि योगजन्य प्रज्ञाविवेक से ही वेद मंत्रं में अंतर्भूत तत्वों को जाना जा सकता है।
अथर्ववेद (19.8.2) में हम बीजरू
अथर्ववेद के 11वें कांड का चौथा सूक्त प्राणविद्या का अनुपम विवरण प्रस्तुत करता है। इस सूक्त में व्यष्टि से समष्टि तक प्राण के विभिन्न आधारों एवं क्रियाकलापों को स्मरण कर नमन किया गया है। सूक्त का प्रथम मंत्र ही प्राण की व्यापकता को रेखांकित करते हुए कहता है कि उस प्राण के प्रति सबका नमन, जिसके वश में यह सब कुछ है। जो समस्त प्राणियों का ईश्वर है, और जिसमें यह सब प्रतिष्ठित है।
कठोपनिषद् में कहा गया है : ‘यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह, बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्। तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्। अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥‘ (कठोपनिषद् २।३।१०-११)। इससे स्पष्ट है कि योग केवल आसन न होकर आंतरिक स्थिरता और आत्मसाक्षात्कार की चरम अवस्था है।
वैदिक संहिताओं में प्राण, अपान
वैशेषिक-दर्शन में आत्मस्वरूप में स्थित निष्क्रिय और नि्दुःख-मनःस्थिति योग है। प्रकारान्तर से चित्तनिरोध योग है।
न्यायशास्त्र में योगदर्शन के अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशरूप पञ्चविध श्लोकों का राग, द्वेष और मोह के रूप में वर्णन किया गया है। आत्मसाक्षात्कार से इनकी निवृत्ति होती है। इस प्रकार न्यायशास्त्र में योग का अत्यन्त महत्त्व है।
नाथ संप्रदाय की योग साधना को शि
नाथ पंथ में परम उपास्य अद्वैत
नाथ परंपरा के दो भेद हठयोग में
योग का ऐतिहासिक महत्व
भगवान शिव : प्राचीन काल से ही भगवान शिव को ‘योगेश्वर’ माना गया है। अनेक योग परंपराएँ जैसे नाथयोग, हठयोग, मंत्रयोग, लययोग
शिवगीता में भगवान शिवजी ने भगवान राम को योग का दिव्य उपदेश दिया, जब वे सीता-वियोग से व्याकुल थे। उन्होंने आत्मज्ञान, चित्त की एकाग्रता, और भौतिक आसक्ति से विरक्ति का विस्तार से निरूपण किया।
भगवान शिव को ध्यानमग्न योगी के रूप में भी दर्शाया गया है, जिनका ध्यान जीवन के परम लक्ष्य ‘मोक्ष की ओर उन्मुख करता है। वेदों में वर्णित शिवसंकल्पसूक्त योग के लिए वैदिक प्रेरणा का आधार है, जो भगवान शिव की चेतना और व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
भगवान श्रीराम : रामायण के सन्दर्भ में महर्षि वसिष्ठ ने भगवान श्रीराम को गहन अद्वैत वेदान्त के सिद्धांतों के माध्यम से योग का मार्ग बताया है। इसमें योग को चित्त की वृत्तियों के निरोध और आत्मज्ञान प्राप्ति की युक्ति कहा गया है। राम को उपदेश करते हुए महर्षि वसिष्ठ कहते हैं : ‘द्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव। योगो वृत्तिनिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम्॥‘ (योगवासिष्ठ)
महर्षि वसिष्ठ : महर्षि वसिष्ठ योग के अत्यंत प्राचीन और समग्र दृष्टा माने जाते हैं। वे सप्तर्षि-मंडल में स्थित रहकर आज भी विश्वकल्याण में लगे हुए हैं। उनके द्वारा भगवान श्रीराम को उपदिष्ट ‘योगवासिष्ठ’ एक अनुपम योग-वेदान्त ग्रंथ है, जिसमें वैराग्य, मुमुक्षु-व्यवहार, उत्
महाभारत : इस महाकाव्य में योग को आत्मसाधना और अंतःकरण की शुद्धि का मार्ग माना गया है। महर्षि व्यासजी ने ध्यानयोग के लिए द्वादश साधनों (देश, कर्म, आहार, दृष्टि, मन आदि) के संयम को अनिवार्य बताया है : ‘छिन्नदोषो मुनियोगान् युक्तो युञ्जीत द्वादश। देशकर्मानुरागार्थानुपायापायनि
महाभारत के शान्ति पर्व में ऋषियों को योग की 12 विधियों से ध्यानयोग का अभ्यास करते बताया गया है।
भगवान श्रीकृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण को भी ‘योगेश्वर’ कहा गया है क्योंकि वे न केवल योग के आचार्य हैं बल्कि स्वयं योग के मूर्तिमान स्वरूप भी हैं। कल्याण-योगतत्त्वांक (1991) में श्रीकृष्ण की योग-सिद्धि, उनके उपदेशों और गीता की व्याख्या के माध्यम से योग के विविध आयामों का सटीक विश्लेषण किया गया है। भगवद्गीता को स्वयं भगवान की साक्षात योगयुक्त वाणी कहा गया है, जो आज भी अज्ञान और मोह का नाश कर आत्मबोध करा सकती है।
योग साधना के माध्यम से जो साधक मन, इंद्रियों और प्राणों को नियंत्रित कर परब्रह्म में स्थित हो जाता है, वह श्रीकृष्ण के अनुग्रह से ‘भवतापेन तप्तानां योगो हि परमौषधम्’ के रूप में परम शांति को प्राप्त करता है। अतः योग की चरम सिद्धि श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके साथ आत्मा की एकात्मकता में ही निहित है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विभिन्न योगों का उपदेश दिया – कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग, और ध्यानयोग। ‘समत्वं योग उच्यते’ और ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ जैसे श्लोक योग को जीवन की कुशलता और समत्व की दशा से जोड़ते हैं।
‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’ – भगवान श्रीकृष्ण का यह श्लोक इंगित करता है कि योग का थोड़ा सा भी अभ्यास मनुष्य को महाभय (संसार-चक्र) से बचा सकता है।
महर्षि पतंजलि : महर्षि पतंजलि को भारतीय दर्शन में योगशास्त्र के प्रवर्तक और अष्टांग योग पद्धति के सिद्धांतकार के रूप में सम्मान प्राप्त है। महर्षि पतंजलि ने योग को चित्तवृत्तियों के निरोध द्वारा आत्मा की शुद्ध स्थिति में प्रतिष्ठित करने का साधन बताया—योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
उन्होंने समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य—इन चार पादों के माध्यम से योगदर्शन की व्याख्या की। योगदर्शन को उपनिषदों मेंवर्णि
स्वामी भारतीकृष्णतीर्थजी लिखते हैं कि पतंजलि का योगदर्शन कोई सीमित सांप्रदायिक पद्धति नहीं, बल्कि सार्वभौमिक जीवनशैली है, जिसमें अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, स्वा
एक ऐसा पथ जिस पर निर्भय हो कर
महर्षि चरक : चरक संहिता में अनेक स्थलों प
महर्षि चरक ने मानसिक वेगों को
आदिगुरु शंकराचार्य : उन्होंने योग को अद्वैत ब्रह्म से आत्मा की एकता के रूप में देखा। उन्होंने ध्यान, आत्मविचार और संन्यास को ब्रह्मानुभूति के प्रमुख साधन बताया।
संत तिरुमूलर : महायोगी संत तिरुमूलर दक्षिण भारत की शैव-सिद्ध परंपरा के अग्रदूत माने जाते हैं। उनका कालखंड ईसा की छठी शताब्दी में था और भगवान नन्दी के शिष्यों की परंपरा में स्वयं को स्थापित मानते थे। उनकी योग-साधना का प्रमुखउदाहरण तिरुमन्तिरम् ना
अन्य ऋषिगण : हिरण्यगर्भ को योग का आदिप्रवर्तक माना गया है। महर्षि घेरण्ड ने सप्त साधनों की व्याख्या की। महायोगी महर्षिमार्कण्डेय
गोस्वामी तुलसीदास : तुलसीदासजी ने अपने सम्पूर्ण साहित्य मेंभग
समर्थ गुरु रामदास स्वामी : समर्थ गुरु रामदास जोकी छत्रपतिशिवाजी महा
विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के विचार
बौद्ध : बौद्ध दर्शन में योग का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘सम्यक् समाधि’ अष्टांगिक मार्ग का एक प्रमुख अंग है। पतंजलि के अनुसार योग चित्तवृत्ति का निरोध है, वहीं बौद्ध धर्म आत्मा के विसर्जन और बोधिसत्त्व की प्राप्ति की ओर उन्मुख है।
बौद्ध दर्शन में सम्यक-दृष्टि,
जैन : जैन दर्शन में योग का प्रयोग मन, वचन और काय की त्रिविध साधना के रूप में होता है। आत्मा की शुद्धि और कर्मों के क्षय के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना ही योग का उद्देश्य है।
जैनाचार्यों जैसे हेमचन्द्र सूरी ने भी महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों से प्रेरणा लेकर अपने ग्रंथों में यम-नियमादि को गृहस्थ और साधु धर्म के रूप में स्वीकार किया।
इस्लाम : इस्लाम धर्म की शाखा – सूफी में योग को आत्मा की शुद्धि, प्रेममय ध्यान और ‘फना’ (स्वत्व का लोप) की दिशा में अग्रसर माना गया है। इसमें हठयोग के तत्त्व भी पाए जाते हैं,विशेषकर इड़ा-पिंगला और प्राणायाम जैसे रूपों में।
कल्याण योगतत्त्वांक (1991) में सूफ़ी सम्प्रदाय में हठयोग की उपस्थिति को स्पष्ट किया गया है। हठयोग का अर्थ ‘ह’ (सूर्य) और ‘ठ’ (चंद्र) के संतुलन से है, जो प्राण और अपान की नियंत्रित साधना है। सूफ़ियों में हठयोग की प्रक्रिया को आत्मा की शुद्धि और ‘फना’ (स्वत्व का लोप) के माध्यम से ईश्वर की निकटता प्राप्त करने की साधना माना गया है।
ईसाई : ईसाई धर्म में योग की स्पष्ट प्रणाली नहीं है, किंतु ध्यान और प्रार्थना अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। प्रभु यीशु के ध्यानमग्न जीवन को आध्यात्मिक योग के रूप में देखा जाता है।
पारसी : पारसी धर्म जिसे जरथोस्ती धर्म भी कहा
आधुनिक युग में योग के प्रमुख प्रवर्तक
स्वामी विवेकानंद : उन्होंने 1893 के शिकागो धर्म महासभा में योग और वेदांत का परिचय पश्चिमी जगत को कराया। उनकी रचनाओं और भाषणों में ध्यान, राजयोग और आत्म-विकास पर विशेष बल दिया गया। उनकी पुस्तक ‘राजयोग’ ने पश्चिम में योग के प्रति रुचि को जाग्रत किया।
परमहंस योगानंद : उन्होंने ‘क्रियायोग’
स्वामी शिवानंद : उन्होंने ‘डिवाइन लाइफ सोसाइटी’ की स्थापना की और ‘Serve, Love, Meditate, Realize’ का संदेश दिया। उनकी पुस्तकें जैसे ‘Yoga for Beginners’,‘Concentration and Meditation’ आदि ने विश्वभर में योग शिक्षा का प्रसार किया।
महर्षि महेश योगी : उन्होंने ‘Transcendenta
बी.के.एस. अयंगर : उन्होंने ‘अयंगर योग’ का प्रचार किया जिसमें आसनों की शुद्धता और शरीर की रचना पर विशेष बल दिया गया। उनकी पुस्तक ‘Light on Yoga’ एक वैश्विक योग मैनुअल बन चुकी है।
स्वामी सत्यानंद सरस्वती : उन्होंने ‘बिहार स्कूल ऑफ योग’ की स्थापना की और ‘योगनिद्रा’, ‘कुण्डलिनी योग’ आदि विधाओं का विस्तार किया। उनकी पुस्तकें ‘Asana Pranayama Mudra Bandha’, ‘Tattwa Shuddhi’ विश्
महात्मा गाँधी : गांधीजी ने योग को केवल शरीर
श्री अरविन्द : “अगर हम जीवन और योग दोनों को यथार्थ दृष्टिकोण से देखे तो सम्पूर्ण जीवन ही चेतन या अवचेतन रूप में योग है।“
स्वामी रामदेव : स्वामी रामदेव ने भारत में योग को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उन्होंने ‘प्राणायाम’ को मुख्य योगिक साधन बनाकर उसे आमजन के स्वास्थ्य से जोड़ा। पतंजलि योगपीठ की स्थापना कर उन्होंने अनेक अनुसंधान, शिक्षण एवं औषधीय प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं। उनके दूरदर्शन कार्यक्रमों एवं योग शिविरों के माध्यम से करोड़ों लोगों ने योग अपनाया।
श्री श्री रविशंकर : ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ संस्था के माध्यम से श्री श्री रविशंकर ने ध्यान और प्राणायाम के वैश्विक प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘सुदर्शन क्रिया’ नामक तकनीक को विश्वभर में अपनाया गया।
योग और भारतीय संस्कृति – मानवता के सन्दर्भ में
‘योग’ शब्द ‘युज’ घातु से बना है
‘योग’ मनुष्य के अंदर सुप्त प्रायः पड़ी अंतर्दृष्टि को प्रबोधित और आंदोलित करता है। अंतर्दृष्टि से रहित व्यक्ति विकास से विश्राम (विश्रांति) तक का प्रकाशमान राजपथ पंकड़ने की अपेक्षा विलास से विनाश तक जाने वाला लोभनीय लेकिन कंटकाकीर्ण मार्ग पकड़ लेता है। वह न इहलौकिक को साध पाता है न पारलौकिक को। ‘योग’ दुराग्रह, सनक, मिथ्याचार और अहंभाव से ग्रसित बुद्धि, जो न केवल अपने लिए अपितु संपूर्ण मानव समाज के लिए पड़े-पड़े संकट खड़े करती है, को समाहित कर दिव्यता से संपूरित कर देता है। ‘योग’ का संस्पर्श बुद्धि को पर्वत से भी दृढ़ और समुद्र से भी गंभीर बना देता है। अवसाद के क्षणों में ‘योग’ का साहचर्य सघन विश्रांति देने वाला हैं। यह शंकालु चित्त को निःशंक कर दिव्य प्राप्तियों के आश्वासन से पूरित कर देने वाला है। संसार का इतिहास योगानुष्ठान द्वारा आत्मदर्शी बने उन महामनाओं की यशोगाथाओं से भरा पड़ा है। जिन्होंने मानव समाज में विद्यमान ईर्ष्या-द्वेष आदि प्रवृत्तियों और सुख-दुख आदि द्वंद्दों को दूर कर पृथ्वी पर शांति का साम्राज्य स्थापित स्थापित किया है।
कल्याण योगतत्त्वांक (1991) के
जीवन के हर पहलू का सूक्ष्मता से अध्ययन करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन में योग स्थिरता का अभाव ही मनुष्य की असफलता का मूल कारण है। मावव के मन में, विचारों में एवं जीवन में एकाग्रता, स्थिरता एवं तन्मयता नहीं होने के कारण मनुष्य को अपने आप पर, अपनी शक्तियों पर पूरा भरोसा नही होता, पूरा विश्वास नहीं होता। उसके मन से, उसकी बुद्धि में सदा-सर्वदा- सन्देह बना रहता है। वह निश्चित विश्वास और एक निष्ठा के साथ अपने पथ पर बढ़ नही पाता। यही कारण है कि वह इतस्तत भटक जाता है, ठोकरें खाता फिरता है और पतन के महागर्त में भी जा गिरता है। उसकी शक्तियों का प्रकाश भी धूमिल पड जाता है। अतः अनन्त शक्तियों को अनावृत्त करने,आत्म-ज्योति को ज्योतित करने तथा अपने लक्ष्य एवं साध्य तक पहुँचने के लिए मन, वचन और कर्म में एकरूपता, एकाग्रता, तन्मयता एवं स्थिरता लाना आ्रवश्यक है। आ्रत्म-चिन्तन में एकाग्रता एवं स्थिरता लाने का नाम ही ‘योग’ है।
भारतीय संस्कृति का विशेष प्रती
आत्म-विकास के लिए योग एक प्रमु
योग न केवल मानसिक और आत्मिक ला
योग दिवस और विश्व में योग
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी
11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस संकल्प का मसौदा प्रस्तुत किया गया और मसौदे को व्यापक समर्थन मिला, जिसके अंतर्गत 175देश इस मसौदे के प्रस्तावक बने, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतिहास में अभी तक हुए किसी भी संकल्प में सर्वाधिक प्रस्तावकों की संख्या है। यूएन के अनुसार, “Yoga is an ancient physical, mental and spiritual practice that originated in India. The word ‘yoga’ derives from Sanskrit and means to join or to unite, symbolizing the union of body and consciousness…….Recognizin
The draft resolution establishing the International Day of Yoga was proposed by India and endorsed by a record 175 member states. The proposal was first introduced by Prime Minister Narendra Modi in his address during the opening of the 69th session of the General Assembly, in which he said: “Yoga is an invaluable gift from our ancient tradition. Yoga embodies unity of mind and body, thought and action … a holistic approach [that] is valuable to our health and our well-being. Yoga is not just about exercise; it is a way to discover the sense of oneness with yourself, the world and the nature.”
The resolution notes “the importance of individuals and populations making healthier choices and following lifestyle patterns that foster good health.” In this regard, the World Health Organization has also urged its member states to help their citizens reduce physical inactivity, which is among the top ten leading causes of death worldwide, and a key risk factor for non-communicable diseases, such as cardiovascular diseases, cancer and diabetes. But yoga is more than a physical activity. In the words of one of its most famous practitioners, the late B. K. S. Iyengar, “Yoga cultivates the ways of maintaining a balanced attitude in day-to-day life and endows skill in the performance of one’s actions.”
फलतः 21 जून 2015 के दिन प्रथम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) सहि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और योग – एक समर्पित दृष्टिकोण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)
योग और संघ का संबंध केवल शारी
श्रीगुरुजी गोलवलकर ने भी योग को आंतरिक तप और अनुशासन के अंग के रूप में देखा। उनका कहना था, “यदि स्वास्थ्य-रक्षा तथारो
योग केवल आत्मोन्नति का साधन नहीं बल्कि समाजोद्धार और राष्ट्रनिर्माण का भी पथ है। यही दृष्टिकोण संघ द्वारा अपनाया गया। संघ के प्रमुख शिक्षा वर्गों में योगासन और ध्यान की विधिवत शिक्षा दी जाती है। योग के माध्यम से स्वयंसेवकों में संयम, साहस और शारीरिक स्फूर्ति का विकास किया जाता है, ताकि वे सेवा कार्यों में तत्पर रह सकें।
आज भी संघ की हजारों शाखाओं में
संघ द्वारा योग दिवस पर पारित प्रस्ताव : संयुक्त राष्ट्र की
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा इस बा
अ. भा. प्रतिनिधि सभा भारतीय रा
अ.भा. प्रतिनिधि सभा केंद्र व रा
संदर्भ सूची



