प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड की ‘तमिलनाडु’ पर बेशर्म चुप्पी

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चेन्नई। तमिलनाडु में मीडिया स्वतंत्रता पर एक नया हमला हुआ है। तीन प्रमुख तमिल न्यूज चैनल—पॉलिमर न्यूज, न्यूज तमिल 24/7 और जनम तमिल टीवी—को राज्य के सरकारी केबल नेटवर्क अरासु केबल टीवी के सभी सेट-टॉप बॉक्स से हटा दिया गया है। इसका मतलब है कि लाखों घरों में इन चैनलों का प्रसारण पूरी तरह बंद कर दिया गया। ये चैनल तमिलनाडु की जोसेफ विजय (टीवीके) सरकार की प्रशासनिक अक्षमताओं, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों, भयंकर बिजली कटौती और कानून-व्यवस्था की बदहाली पर लगातार सवाल उठा रहे थे। सरकार ने इन्हें ब्लैक आउट कर दिया।
विपक्षी दलों ने इसे प्रेस फ्रीडम पर हमला बताया है। एआईएडीएमके के ईपीएस, भाजपा के के. अन्नामलाई समेत कई नेताओं ने आरोप लगाया कि ये चैनल सरकार की नाकामियों को उजागर कर रहे थे, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया। सरकार का दावा है कि यह ‘तकनीकी गड़बड़ी’ है, लेकिन विपक्ष कहता है कि प्रो-सरकार चैनल तो ठीक से चल रहे हैं। यह घटना संयोग नहीं लगती।
तमिलनाडु में मीडिया पर दबाव की यह पहली घटना नहीं है। पहले भी कुछ चैनलों के साथ इसी तरह की परेशानियां हुई हैं। लेकिन इस बार सवाल यह है कि देश के तथाकथित मीडिया वॉचडॉग कहां हैं? प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया—ये दोनों संस्थाएं जो हर छोटी-मोटी घटना पर बयान जारी करती हैं, खासकर जब केंद्र सरकार या गैर-कांग्रेस शासित राज्य शामिल हों, इस बार तमिलनाडु पर पूरी तरह चुप हैं।
यह चुप्पी नई नहीं है। यह बेशर्म चुप्पी है। जब दक्षिण भारत में कोई गैर-भाजपा सरकार मीडिया पर अंकुश लगाती है तो ये ‘लिबरल’ संस्थाएं अचानक आंखें बंद कर लेती हैं। इन्हें तानाशाही तभी दिखती है जब सत्ता में उनके पसंदीदा लोग न हों। बार-बार एक्सपोज होने के बावजूद ये गिरोह शर्मिंदा नहीं होता। एक तरफ ये “प्रेस फ्रीडम” का राग अलापते हैं, दूसरी तरफ जहां उनके राजनीतिक सहयोगी सत्ता में हैं, वहां चुप्पी साध लेते हैं।
तमिलनाडु में बिजली कटौती की शिकायतें आम हैं, महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं, नशीले पदार्थों की समस्या बढ़ रही है। इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले चैनलों को बंद करना लोकतंत्र के लिए खतरा है। अगर सरकार पारदर्शी है तो आलोचना से क्यों डरती है? आखिरकार, मीडिया सरकार का चौथा स्तंभ माना जाता है, न कि सत्ता के प्रचार तंत्र का हिस्सा।
प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड को तुरंत इस मुद्दे पर बयान जारी करना चाहिए। अगर वे चुप रहे तो यह साबित होगा कि उनकी चिंता सिद्धांतों की नहीं, बल्कि सत्ता के रंग की है। तमिलनाडु के पत्रकारों और नागरिकों को इस हमले के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। मीडिया स्वतंत्रता किसी एक दल या विचारधारा की नहीं होती-यह पूरे लोकतंत्र की रक्षा है।
जब तक ये ‘लिबरल गैंग’ अपनी चुप्पी नहीं तोड़ेगा, उनकी साख पर सवाल उठते रहेंगे। बेशर्मी की भी हद होती है। तमिलनाडु की यह घटना उस हद को फिर से उजागर कर रही है।

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