बांग्लादेश में मंदिर निर्माण पर रोक और चयनात्मक वैश्विक विमर्श

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अखिलेश चौधरी

सिलचर (असम) : दक्षिण एशिया में राजनीतिक परिवर्तन और बढ़ती कट्टरता के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिन्दू समाज की स्थिति एक बार फिर गम्भीर चिन्ता का विषय बन गई है। हाल ही में बांग्लादेश के गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी क्षेत्र में निर्माणाधीन श्री श्री राधा गोविन्द एवं काली मन्दिर परिसर में भगवान राम की विशाल प्रतिमा और एक सांस्कृतिक परिसर के निर्माण कार्य को रोक दिया गया। इस घटनाक्रम ने धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासन की भूमिका और वैश्विक मानवाधिकार विमर्श की निष्पक्षता पर अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

️ *क्या है पूरा विवाद?*

गाइबांधा के पलाशबाड़ी उपजिला में स्थित श्री श्री राधा गोविन्द एवं काली मन्दिर परिसर में एक विशाल धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र का निर्माण किया जा रहा था। इस परियोजना का उद्देश्य सनातन संस्कृति की झलक प्रस्तुत करना था। परिसर में भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान शिव सहित लगभग 144 देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना की योजना थी।

सामाजिक माध्यमों पर निर्माणाधीन विशाल राम प्रतिमा के चित्र सामने आने के बाद कुछ कट्टरपन्थी संगठनों ने इसका विरोध प्रारम्भ कर दिया और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की चेतावनियाँ दीं। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, विरोध कर रहे तत्वों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने के बजाय स्थानीय प्रशासन ने मन्दिर परिसर में चल रहे मूर्तिनिर्माण कार्य को ही रोकने का निर्देश दे दिया। प्रशासन के इस आदेश के बाद मन्दिर समिति को निर्माण कार्य स्थगित करना पड़ा। मन्दिर के सलाहकार श्यामल कुमार महन्त ने पुष्टि की कि प्रशासनिक निर्देशों और सुरक्षा सम्बंधी परिस्थितियों के कारण कार्य रोक दिया गया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। ऐसे में यदि विरोध और धमकियों के दबाव के बीच प्रशासन विरोध करने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित पक्ष की वैध गतिविधियों पर ही रोक लगा दे, तो यह स्वाभाविक रूप से राज्य की निष्पक्षता और उसकी क्षमता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

*संवैधानिक आदर्श और व्यवहारिक वास्तविकता*

बांग्लादेश का संविधान धर्मनिरपेक्षता और सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने तथा धार्मिक संस्थानों की स्थापना करने का अधिकार प्राप्त है।

ऐसी स्थिति में यदि हिन्दू समाज को अपनी निजी भूमि पर धार्मिक प्रतीकों और पूजा स्थलों के निर्माण के लिए भी बहुसंख्यक स्वीकृति या सामाजिक दबाव से जूझना पड़े, तो यह केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा का विषय बन जाता है। प्रश्न यह भी है कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य की है या फिर धार्मिक स्वतंत्रता का निर्धारण भीड़ और धमकियों के आधार पर होगा?

*सिकुड़ती अल्पसंख्यक आबादी*

बांग्लादेश में हिन्दू समाज की जनसंख्या में पिछले सात दशकों में निरन्तर गिरावट दर्ज की गई है। 1951 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी लगभग 22 प्रतिशत थी। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय यह घटकर लगभग 13.5 प्रतिशत रह गई और वर्तमान जनगणना के अनुसार देश में हिन्दुओं की आबादी लगभग 7.95 प्रतिशत रह गई है।

जनसंख्या में यह गिरावट लम्बे समय से शोधकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों के लिए चिन्ता का विषय रही है। भूमि सम्बंधी विवाद, साम्प्रदायिक हिंसा, असुरक्षा की भावना और पलायन को इसके प्रमुख कारणों में गिना जाता है।

 *बढ़ती सांप्रदायिक घटनाएँ*

यह विवाद कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में मन्दिरों, मूर्तियों और हिन्दू समाज पर हमलों की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मन्दिरों में तोड़फोड़, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विखण्डन और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।

अल्पसंख्यक अधिकार संगठनों के अनुसार, हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। ठाकुरगांव में कई मन्दिरों पर हमले, फरीदपुर में मूर्तियों का विखण्डन और अब गाइबांधा में वैधानिक रूप से निर्मित हो रहे मंदिर परिसर के कार्य पर रोक जैसी घटनाओं ने चिन्ता को और बढ़ाया है।

*तस्लीमा नसरीन की प्रतिक्रिया*

निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब देश में हजारों मस्जिदें हैं और नए धार्मिक स्थलों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं होती, तो एक हिन्दू मन्दिर और भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण का विरोध क्यों किया जा रहा है?

उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता यदि वास्तव में सभी के लिए है, तो उसका लाभ अल्पसंख्यकों को भी समान रूप से मिलना चाहिए। किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के कारण दूसरे समुदाय की आस्था और पूजा स्थलों को बाधित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

 *वैश्विक विमर्श और दोहरे मानदंड*

मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ सामान्यतः सक्रिय दिखाई देती हैं। किन्तु यथार्थ यह है कि विभिन्न देशों और समुदायों के सन्दर्भ में प्रतिक्रियाओं का स्तर समान नहीं होता। यही कारण है कि बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों से जुड़ी घटनाओं पर अपेक्षाकृत सीमित अन्तरराष्ट्रीय चर्चा को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

यद्यपि यह कहना उचित नहीं होगा कि अन्तरराष्ट्रीय मंच पूरी तरह मौन हैं, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि जिस प्रकार की व्यापक प्रतिक्रिया अन्य मामलों में देखने को मिलती है, वैसी तीव्रता यहाँ दिखाई नहीं देती। यही स्थिति चयनात्मक मानवाधिकार विमर्श की बहस को जन्म देती है।

*भारत के बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया पर प्रश्न*

भारत में भी इस विषय पर अपेक्षित स्तर की व्यापक सार्वजनिक बहस देखने को नहीं मिली। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के प्रश्नों पर अपेक्षित स्तर की सार्वजनिक बहस अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।

हालाँकि किसी भी विचारधारा या वर्ग के सभी लोगों को एक समान मान लेना उचित नहीं होगा, फिर भी यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं, तो उनकी रक्षा और समर्थन के मानदण्ड भी सार्वभौमिक होने चाहिए। धार्मिक या वैचारिक पहचान के आधार पर अलग-अलग मापदण्ड अपनाना अन्ततः मानवाधिकारों की विश्वसनीयता को ही कमजोर करता है।

*क्षेत्रीय प्रभाव*

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बढ़ती असुरक्षा केवल एक देश का आन्तरिक विषय नहीं है। इसका प्रभाव भारत-बांग्लादेश सम्बंधों, सीमा क्षेत्रों की स्थिरता और दक्षिण एशिया की सामाजिक-सामरिक परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।

यदि अल्पसंख्यकों में असुरक्षा और पलायन की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो उसके दूरगामी परिणाम पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यह विषय केवल मानवाधिकारों का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सामाजिक समरसता का भी प्रश्न है।

*आगे का रास्ता*

आवश्यक है कि बांग्लादेश सरकार धार्मिक स्थलों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। साम्प्रदायिक हिंसा और धमकियों के मामलों में कठोर कार्रवाई हो तथा संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा की जाए।

साथ ही, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को भी सभी मामलों में समान मानदण्ड अपनाने चाहिए। मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर चयनात्मक दृष्टिकोण अन्ततः इन मूल्यों की सार्वभौमिकता को कमजोर करता है।

पलाशबाड़ी में मन्दिर निर्माण पर लगी रोक केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और राज्य की निष्पक्षता की वास्तविक परीक्षा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह बहुसंख्यक दबाव के बीच अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की कितनी दृढ़ता से रक्षा करती है।

धार्मिक स्वतंत्रता किसी एक समुदाय का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक मानवाधिकार है। यदि किसी भी देश में किसी समाज को भय, दबाव या हिंसा की आशंका के कारण अपनी आस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सीमित करने के लिए विवश होना पड़े, तो यह केवल पीड़ित समाज का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिन्ता का विषय है। मानवाधिकारों की विश्वसनीयता भी तभी बनी रह सकती है, जब उनके मानदण्ड व्यक्ति, देश या धर्म देखकर नहीं, बल्कि समान रूप से लागू किए जाएँ।

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