भारत का विभाजन करवा दिया, अब तो कांग्रेस तुष्टीकरण से बाहर निकले!

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । यह वाक्य आज की राजनीति में बार-बार गूंज रहा है। “वंदे मातरम्” को लेकर कांग्रेस का ताजा रुख इस पुरानी आलोचना को फिर से जिंदा कर देता है। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने साफ कह दिया कि कांग्रेस 1937 के कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले पर अडिग रहेगी। कार्यक्रमों में “वंदे मातरम्” के सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। यानी कि पूर्ण गीत गाने से परहेज।

भाजपा इसे तुष्टीकरण बता रही है और आरोप लगा रही है कि यही मानसिकता कभी देश को बांटने का कारण बनी। स्‍वभाविक है यह जिद बेकार है, क्योंकि यह राष्ट्रीय प्रतीक को भी वोटबैंक की नजर से देखती है। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यही फैसला लिया था। गांधी, नेहरू, पटेल, बोस जैसे नेता मौजूद थे। रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह भी ली गई। बाद के अंतरों में देवी-देवताओं के उल्लेख को लेकर कुछ मुस्लिम नेताओं की आपत्ति थी। कांग्रेस ने तुरंत झुककर सिर्फ पहले दो अंतरे रखने का रास्ता चुना।

अब इस संदर्भ में अनेक तर्क मौजूद हैं कि यह शुरुआत थी उस नीति की, जिसमें राष्ट्रीय भावनाओं को एक इस्‍लामिक समुदाय की नाराजगी के आगे झुका दिया जाता था। यानी कि इस्‍लाम के लिए, उसको माननेवालों की चाटुकारिता के लिए कांग्रेस झूकी और तब से वह लगातार झुक रही है, जबकि यह सर्वविदित है कि स्वतंत्रता संग्राम में “वंदे मातरम्” नारा बन चुका था। फिर भी कांग्रेस ने उसे काट-छांटकर छोटा कर दिया।

इसे वह समावेशिता का नाम देती है, जबकि हकीकत यह है कि यह कांग्रेस की कमजोरी और देश के सामने उसकी तुष्टीकरण नीति के रूप में आज भी लोग मानते हैं। इसी नीति का नतीजा विभाजन में निकला कि मुस्लिम लीग की पाकिस्तान मांग को कांग्रेस ने बार-बार समझौतों से मजबूत किया। अलग निर्वाचन, प्रांतीय स्वायत्तता की मांगें, हर बार कांग्रेस पीछे हटती गई।

1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस सरकारों के कामकाज ने मुस्लिम अविश्वास बढ़ाया। कांग्रेस ने मुस्लिम जनमानस को राष्ट्रीय आंदोलन से पूरी तरह जोड़ने में नाकामी दिखाई। जिसके परिणाम में मोहम्‍मद अली जिन्ना की हठधर्मिता बढ़ती गई। अंत में 1947 में विभाजन स्वीकार करना पड़ा। लाखों मारे गए, करोड़ों उजड़े। अब कौन है इसका जिम्‍मेवार?

यद‍ि कांग्रेस ने शुरू से मजबूत रुख अपनाया होता और तुष्टीकरण की बजाय एकता पर जोर दिया होता, तो शायद देश का बंटवारा टल सकता था। निश्‍चित तौर पर कांग्रेस के साथ उतने ही अंग्रेज और लीग भी भारत विभाजन के अपराधी हैं। सच यही है कि विभाजन के लिए कांग्रेस की नरम नीति ने रास्ता आसान किया। आज भी वही जिद दिख रही है।

स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय में “वंदे मातरम्” को लेकर विवाद हुआ। जो वीडियो में सामने मौजूद है, उससे साफ है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने पूर्ण गीत रुकवाने की कोशिश की। कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्‍ल‍िकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी के बीच चल रहे “वंदे मातरम्” के ठीक बीच का संवाद देखा जा सकता है। कांग्रेस इनकार करती है, पर जो दिख रहा है, उसको कैसे कांग्रेस नकार सकती है ? पर अब तो पूरी तरह से ही सामने आ गया है, पार्टी का आधिकारिक रुख साफ है कि “वंदे मातरम्” के सिर्फ दो अंतरे।

केसी वेणुगोपाल कहते हैं कि यह भावनात्मक मुद्दा है, भाजपा के लिए राजनीतिक, किंतु यहीं कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि जब देश का राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम्” है, तो उसे आधा क्यों रखना? क्या पूर्ण गीत गाने से किसी की भावनाएं आहत होती हैं? क्या राष्ट्रभक्ति भी तुष्टीकरण का शिकार होनी चाहिए? यह जिद बेकार इसलिए है क्योंकि यह देश को एकजुट रखने की बजाय विभाजित रखने वाली मानसिकता को बढ़ावा देती है।

“वंदे मातरम्” मातृभूमि का गुणगान है। पहले दो अंतरे सुंदर हैं, मगर पूरा गीत अपनी संपूर्णता के साथ भारत माता और राष्‍ट्र देव भारत की आराधना है जोकि राष्ट्रीय प्रतीक है। उसे काटकर पेश करना कमजोरी का संकेत देता है। कांग्रेस को अब इस पुरानी नीति से बाहर निकलना चाहिए। तुष्टीकरण की राजनीति ने अतीत में नुकसान पहुंचाया। वर्तमान में भी यह राष्ट्रीय प्रतीकों को कमजोर करती है।

वस्‍तुत: देश की एकता तभी मजबूत होगी जब हर दल राष्ट्रीय भावनाओं को वोटबैंक से ऊपर रखे। वैसे तो अच्‍छा होता जो कांग्रेस अपनी ऐतिहासिक गलतियों से सबक लेती। विभाजन की त्रासदी दोहराने लायक नहीं। “वंदे मातरम्” जैसे गीतों को लेकर समझौता करने की बजाय उन्हें गर्व से अपनाना ही वास्‍तव में पूर्ण देशभक्‍ति है, अन्‍यथा यह समझ आता है कि जो कांग्रेसी आज “वंदे मातरम्” के पूर्ण गान का विरोध कर रहे हैं, वे अब भी इतिहास की घटनाओं से कुछ भी सीख लेना नहीं चाहते।

आज कांग्रेस यह समझे कि तुष्टीकरण की राजनीति अब पुरानी पड़ चुकी है। समय आ गया है कि वह इससे बाहर निकले और राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने वाली नीति अपनाए, उसे आत्‍मसात करके उस पर आगे बढ़े । अन्यथा यही जिद बार-बार देश की एकता पर सवाल खड़े करती रहेगी। देश को कमजोर करती रहेगी और लोगों को आपस में लड़वाती रहेगी!

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