वंदे मातरम पर कांग्रेस 

congress-party-flag.jpg.webp
अवधेश कुमार
दिल्ली । अखिल भारतीय कांग्रेस (ई) और राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् विवाद जिस सीमा तक बढ़ रहा है वह चिंताजनक ही नहीं दुर्भाग्यपूर्ण भी है। के राजधानी दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय पर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम गायन के समय का दृश्य विचलित करने वाला था। केरल सरकार के कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत नहीं गया गया। हालांकि कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में पूरा वंदे मातरम गीत गया गया जहां कांग्रेस की सरकारें हैं। उसके बाद गोवा के कार्यक्रम में वंदे मातरम पूरा नहीं गयागया। यह सच है कि वंदे मातरम कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय में झंडातोलन के दौरान पूरा गया गया। किंतु पहले छंद के बाद आप सोनिया गांधी , कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का हाव-भाव और व्यवहार देखिए। वीडियो में साफ दिख रहा है कि सोनिया गांधी हाथ से रोकने का इशारा कर रहीं हैं और असहज हैं जैसे कुछ असामान्य हो गया हो। सोनिया और खड़गे में बातचीत हो रही है , तीनों एक दूसरे की ओर देखते हैं। गाने वाले टीम का इनकी ओर ध्यान नहीं था। गायन की जिम्मेवारी संभाल रहे ललित देसाई को राहुल गांधी तथा दूसरे नेताओं के पास इस बीच जाते हुए देखा जा सकता है। कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश का यह कथन हास्यास्पद था कि खड़गे जी लंबे समय से खड़े थे और सोनिया जी उनके लिए कुर्सी चाह रही थी। 3 मिनट के गीत में खड़गे जी को कुर्सी की आवश्यकता कैसे महसूस हो गई। उसके बाद खड़गे जी ने खड़ा होकर भाषण दिया। जयराम रमेश ने ही वहां पत्रकारों को बताया की 28 अक्टूबर , 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता या वर्तमान कोलकाता अधिवेशन में ही तय हुआ कि केवल प्रारंभिक छंद गएंगे और तब से कांग्रेस की यही परंपरा रही है। इस स्पष्टीकरण से ही साफ हो जाता है कि संपूर्ण गीत के पक्ष में कांग्रेस के नेता नहीं थे। संसद में संशोधन कर वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर स्थान देने के बाद इसमें बाधा डालने या किसी तरह अपमान करने पर सजा हो सकती है। कांग्रेस ने उसे विधेयक का भी विरोध किया था। वंदे मातरम के 150 में वर्ष पर आयोजित संसद में बहस के दौरान भी कांग्रेस के नेताओं का भाषण सुन लीजिए। उन्होंने विरोध नहीं किया लेकिन उसमें जो भारत माता के प्रति भक्ति भाव है उसे स्वीकार करने की बात नहीं कही।
अनेक नेता मांग कर रहे हैं कि सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को इसके लिए क्षमा मांगनी चाहिए। अघोषित रूप से राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही वर्तमान कांग्रेस में वंदे मातरम के भक्ति भाव के लिए कोई जगह नहीं है। जब वे मानेंगे ही नहीं कि उन्होंने कोई गलती की है बल्कि कांग्रेस की परंपरा के अनुसार पूरी गीत ही नहीं गायी जानी चाहिए थी तो फिर क्षमा मांगने का प्रश्न कहां से पैदा होता है। हालांकि यह दिल दहलाने वाली घटना है कि स्वतंत्रता आंदोलन में सभी विचारों और संगठनों के लिए संघर्ष का मंच बनने वाली कांग्रेस आज भी भारत राष्ट्र के वास्तविक स्वरूप को स्वीकारने को तैयार नहीं है। सन् 1896 से लेकर 1936 तक कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में वंदे मातरम् का पूरा गायन होता था तथा मुसलमान ईसाई सभी गाते थे। धीरे-धीरे मुसलमानों के एक वर्ग में इसे लेकर विरोध था और वे कांग्रेस अधिवेशन में खड़े रहते हुए भी नहीं गाते थे। इसके इतिहास पर पिछले एक वर्ष में काफी चर्चा हो गई है इसलिए उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं। सच यही है कि कट्टर सांप्रदायिक दल तथा भारत विभाजन की मांग करने वालु मुस्लिम लीग और अन्य कुछ नेताओं के दबाव में 1937 में प्रमुख छंदों को हटाया गया। जयराम रमेश और अन्य कांग्रेस के नेता गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर का नाम लेते हुए बताते हैं कि उनकी ही सुझाव पर ऐसा किया गया। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर तो 1905 के स्वदेशी आंदोलन के समय लगभग हर दिन निकलने वाली प्रभात फेरियों में प्रतिदिन भावविभोर होकर वंदे मातरम गाते थे। जब कांग्रेस के अंदर पंडित नेहरू और अनेक नेता दबाव में आकर कहने लगे कि जिन पंक्तियां से मुसलमानों को आपत्ति है तो हमें हिंदू मुस्लिम एकता का ध्यान देते हुए उस पर जोर नहीं देना चाहिए। तब तक मोहम्मद अली जिन्ना और कई पुराने कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं की धारा बदल चुकी थी इसलिए सोचा गया कि शायद ऐसा कर देने से वे मान जायेंगे। सच यह है कि उनको पूरी गीत पर ही आपत्ति थी और आज भी आप देखेंगे कि मुसलमानों का एक बहुत बड़ा वर्ग वंदे मातरम को अपने मजहब से जोड़ते हुए अस्वीकार्य बताता है। हालांकि तब और आज भी मुसलमानों का एक छोटा वर्ग मानता है कि इसमें मूर्ति पूजा या देवी – देवताओं की पूजा करने के लिए नहीं कहा गया है।
यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कि केरल में चमुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस चुनाव लड़ती है और वह सरकार में शामिल है इसलिए वहां राष्ट्रीय गीत नहीं हुआ। कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल में यह स्थिति नहीं है। दूसरे, पहले राहुल गांधी एवं अभी प्रियंका वाड्रा सांसद हैं, जिनकी जीत मुस्लिम लीग के समर्थन से ही हुई है। तो उस कट्टर मानसिकता के मुसलमानों को नाराज न करने की सोच इसका एक प्रमुख कारण माना जा सकता है। ध्यान रखिए, 1907 में मुस्लिम लीग बनने के बाद ही इस गीत का विरोध शुरू हुआ था। विडंबना देखिए कि मुस्लिम लीग या वैसे नेताओं ने भारत को बांट दिया, वे चले गए लेकिन उस दौरान उनके दबाव में लिया गया गलत फैसला कांग्रेस आज तक बनाए रखना चाहती है। क्यों? 24 जनवरी, 1950 को दबाव में राष्ट्रीय गीत तो स्वीकार किया गया लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी का लिखा पूरा गीत उसी तरह गया जाएगा जैसे हम जन गण मन अधिनायक जय ही गाते हैं। पहली बात कि बाद में संसद के अंदर या बाहर प्रभावशाली पार्टियों और नेताओं ने सरकार पर इतना दबाव नहीं बनाया कि स्वतंत्रता के बाद इसे बदले और पूरे गीत को फिर से वापस लाया जाए। इस गीत के समर्थक कांग्रेस के नेता या तो स्वर्ग सिधार गए या फिर शक्तिशाली नहीं रहे। संसद सत्र के शुरु और अंत में भी इसका गायन नहीं होता था।जब संसद में भाजपा शक्तिशाली हुई तब 1992 में लालकृष्ण आडवाणी तथा राम नायक ने इसे उठाया तब जाकर संसद में गाने की परंपरा शुरू हुई।
राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी पिछले करीब सात आठ वर्षो में कट्टरपंथी मुसलमानों, ईसाईयों , अतिवादी वामपंथी, अल्ट्रा समाजवादी और भारत को कभी भी एक राष्ट्र न स्वीकार कर अलग-अलग भूखंडों का टुकड़ा मानने वालों के विचार पर चल रही है। जहां पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम स्वयं को दिमागी नक्सलवादी कहते हों उस पार्टी के अंदर की सोच पर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। वैसे भी कांग्रेस मान रही है कि भाजपा से टकराव में उसकी सबसे बड़ी शक्ति मुसलमान, अतिवादी कम्युनिस्ट,सोशलिस्ट और अराजकतावादी तत्व हैं। यानी वो सारी ताकतें कांग्रेस के साथ हैं जो भारत को एक प्राचीन राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं करती , जिन्हें हमारे वेद, उपनिषद, महाभारत आदि को इतिहास या यथार्थ ग्रंथ मानने पर आपत्ति है, जो हिंदुत्व या सनातन या उसके प्रतीकों के अंधविश्वास या प्रगति विरोधी मानते हुए जो गुस्सा का भाव रखते हैं वे सब कांग्रेस की विचारधारा निर्धारित करते हैं। कलमिलकर कांग्रेस के नेताओं पर इसके लिए मुकदमा हो या नहीं हो, लेकिन इस मानसिकता के विरुद्ध भारी संघर्ष की आवश्यकता है। वैचारिक स्तर पर इस संघर्ष को आगे ले जाकर ऐसी शक्तियों को कमजोर करना होगा। स्वयं कांग्रेस में भी इस धारा के विरोधी नेताओं कार्यकर्ताओं को इस पर विचार करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने लाल किले से देश में हिंसक अराजकता पैदा करने वाली शक्तियों के सक्रिय होने की जो बात कही उससे भी इस घटना को जोड़कर देखा जाना चाहिए।
(सोशल मीडिया से साभार)

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top