दिल्ली। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार एक ऐसा घाव है जो स्वतंत्रता के बाद भी नहीं भरा। अंग्रेजों के समय में अपने अधिकारियों को बचाने के लिए उन्हें विशेषाधिकार दिए गए, बड़े-बड़े पाप छुपाए गए। लेकिन आजाद भारत में ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। फिर भी, भ्रष्टाचार जारी है। सिपाही से लेकर बड़े अधिकारी तक, सबकी गाड़ियों से पैसा निकलता रहता है। जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होगी—निलंबन की बजाय घर पर बुलडोजर नहीं चलेगा-तब तक यह रुकने वाला नहीं है। लाखों की प्राइवेट नौकरी छोड़कर सरकारी नौकरी की ओर लोगों का आकर्षण इसलिए है क्योंकि यहां वेतन से कहीं ज्यादा, करोड़ों की कमाई का रास्ता साफ दिखता है। इस तस्वीर ने समाज का व्यवस्था पर विश्वास उठा दिया है।
भ्रष्टाचार भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को खोखला कर रहा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी आम है। छोटे स्तर पर तो यह रोजमर्रा की बात हो गई है। एक साधारण व्यक्ति को पासपोर्ट बनवाने, राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस के लिए भी चप्पल खोलनी पड़ती है। लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब बड़े अधिकारी इसमें लिप्त होते हैं। वे नीतियां बनाते हैं, फाइलें घुमाते हैं और करोड़ों की लूट मचाते हैं।
छोटे स्तर के उदाहरण: सिपाही और क्लर्क की लूट
कल्पना कीजिए, एक ट्रक ड्राइवर सड़क पर चल रहा है। चेकिंग पॉइंट पर सिपाही रुकवाता है। ओवरलोडिंग या कागजात में छोटी सी गलती का हवाला देकर 500 से 2000 रुपये की रिश्वत मांगता है। यह रोज की घटना है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार की शिकायतें सबसे ज्यादा आती हैं। एक सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक ‘हफ्ता वसूली’ का सिलसिला चलता है—दुकानदारों से, ठेलेवालों से, यहां तक कि गरीब मजदूरों से।
क्लर्कों की कहानी भी कम नहीं। सरकारी दफ्तर में फाइल अटक जाती है। ‘स्पीड मनी’ के नाम पर 1000-5000 रुपये देने पड़ते हैं। हाल के मामलों में पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन भर्ती घोटाले में निचले स्तर के कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई। ऐसे में योग्य उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं और अयोग्य, लेकिन पैसे वाले आगे बढ़ जाते हैं। इससे पूरा सिस्टम कमजोर होता है।
मध्यम स्तर: इंस्पेक्टर और अधीक्षक
मध्य स्तर पर भ्रष्टाचार और संगठित रूप ले लेता है। दिल्ली के सीबीआई इंस्पेक्टर दीपक फलस्वाल का मामला ताजा है। उन्होंने एक केस सेटल करने के बदले दो करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी। हरियाणा के आईपीएस अधिकारी दीपक गहलावत पर काउंटरफीट दवाओं के रैकेट से तीन करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगा। सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया। ऐसे अधिकारी जांच प्रभावित करते हैं, अपराधियों को बचाते हैं और खुद मोटी कमाई करते हैं।
पुलिस विभाग में ‘कैश फॉर बेल’ या केस दबाने की प्रथा आम है। नारदा स्टिंग ऑपरेशन में पश्चिम बंगाल पुलिस अधिकारियों की रिश्वत लेते हुए वीडियो सामने आई। इनसे समाज का कानून व्यवस्था पर भरोसा टूटता है।
बड़े अधिकारी और बड़े घोटाले
सबसे खतरनाक भ्रष्टाचार उच्च स्तर पर होता है। आईएएस और आईपीएस अधिकारी, जो नीति बनाने वाले होते हैं, खुद लूट का हिस्सा बन जाते हैं। झारखंड की आईएएस पूजा सिंघल के घर से ED छापे में 20 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए। मनी लॉन्ड्रिंग केस में उन्हें गिरफ्तार किया गया। केरल के आईएएस टीओ सूरज पर फ्लाईओवर प्रोजेक्ट में फंड के दुरुपयोग का आरोप, उनके पास 11 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति मिली।
छत्तीसगढ़ के आईएएस बाबूलाल अग्रवाल ने फर्जी अकाउंटों से 40-60 करोड़ की हेराफेरी की। उत्तर प्रदेश के नोएडा से पूर्व आईएएस नीरज यादव पर लैंड अलॉटमेंट घोटाले में 250 करोड़ रुपये का आरोप। गुजरात के आईएएस राजेंद्रकुमार पटेल ने लैंड क्लियरेंस के लिए ‘स्पीड मनी’ का फिक्स्ड रेट चलाया-प्रति वर्ग मीटर 5-10 रुपये। 800 से ज्यादा आवेदनों में 10 करोड़ से ज्यादा की कमाई।
बड़े घोटालों की सूची लंबी है-2G स्पेक्ट्रम घोटाला (1.76 लाख करोड़), कोलगेट (1.86 लाख करोड़), कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला (70,000 करोड़)। इनमें मंत्री और अधिकारी दोनों शामिल रहे। यूपी एनआरएचएम घोटाले में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी गिरफ्तार हुए।
क्यों आकर्षित होती है सरकारी नौकरी?
लोग सरकारी नौकरी इसलिए चाहते हैं क्योंकि यहां ‘सेट’ हो जाने पर पेंशन, पावर और पैसा-तीनों मिलते हैं। वेतन तो औसत है, लेकिन ‘एक्स्ट्रा इनकम’ असीमित। यूपीएससी की तैयारी में लाखों खर्च कर युवा इसलिए लगते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि पोस्टिंग के बाद रिटर्न मिलेगा। लेकिन इससे योग्यता का ह्रास होता है। ईमानदार अधिकारी भी दबाव में आ जाते हैं या ट्रांसफर हो जाते हैं।
समाधान है बुलडोजर सी सख्ती
निलंबन या ट्रांसफर से भ्रष्टाचार नहीं रुकता। अपराधी को पता चलता है कि worst case में सैलरी बंद हो जाएगी, लेकिन लूटा हुआ पैसा सुरक्षित रहेगा। यदि भ्रष्टाचारी के घर पर बुलडोजर चल जाए, संपत्ति जब्त हो, परिवार सड़क पर आ जाए, तो डर पैदा होगा। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने माफिया और अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चलाकर उदाहरण पेश किया। इसी तरह भ्रष्ट अधिकारियों पर लागू होना चाहिए। जब तक कर्मचारी से लेकर अधिकारियों के बीच कानून का डर पैदा नहीं होगा, स्थितियां नहीं बदलेंगी।
सख्त कानून चाहिए—Prevention of Corruption Act को और मजबूत बनाएं। संपत्ति का स्रोत पूछने का अधिकार, समयबद्ध जांच, डिजिटल ट्रांसपेरेंसी। ई-गवर्नेंस से फाइलों में घूमने की गुंजाइश कम हो। लोकपाल और सीवीसी को स्वतंत्र शक्ति दें।
भ्रष्टाचार राष्ट्र की प्रगति में बाधक है। जब तक सिपाही से लेकर सचिव तक सबको एक समान सजा नहीं मिलेगी, तब तक बदलाव नहीं आएगा। अंग्रेजी विरासत के विशेषाधिकारों को खत्म करें। बुलडोजर सिर्फ प्रतीक नहीं, कार्रवाई का हथियार बने। समाज पर अधिक विश्वास ना करें। वह अपना विश्वास खो चुका है। वह भ्रष्टाचार के साथ जीना सिख रहा है। वह सड़क से लेकर रेल तक, थाने से लेकर अंचल तक सामने प्रतिदिन भ्रष्टाचार होते देखता है लेकिन कुछ बोलता नहीं। उसे आदत पड़ गई है। वह जानता है कि एक बार उसने बोला दिया फिर सिस्टम उसे जीने नहीं देगा। वह बोल नहीं रहा, इसका मतलब बिल्कुल यह नहीं लगाया जाना चाहिए वह देख और समझ भी नहीं रहा है।



