पटरियों पर दौड़ता नया हिंदुस्तान, मुस्कुराता मध्यवर्ग और मजबूत होती राष्ट्रीय एकता

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Caption: Amar Ujala

दिल्ली । एक ज़माना था, जब शादी का कार्ड मिलते ही सबसे पहले रेल यात्रा की चिंता शुरू हो जाती थी। टिकट मिलेगा या नहीं? ट्रेन समय पर चलेगी या नहीं? भीड़ कितनी होगी? रात कैसे कटेगी? बच्चे संभलेंगे या नहीं?बिस्तरबंद, संदूकों, सुराही, खाने में पूरी सब्जी, नमकीन, डकार के लिए चूर्ण! फुल टेंशन।
आज तस्वीर बदल रही है।
इस सप्ताह चेन्नई में हमारे परिवार की एक शादी है। लेकिन यह सिर्फ एक शादी नहीं, बदलते भारत की एक खूबसूरत राष्ट्रीय एकता की कहानी भी है। रिश्तेदार देश के अलग-अलग शहरों से आ रहे हैं। कोई बेंगलुरु से, कोई कोयंबटूर से, लड़के वाले दिल्ली से, रिश्तेदार हैदराबाद से और कोलकाता से भी। हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, मैसूर से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और पांच घंटे में बैंगलोर होकर चेन्नई पहुंचे।
सफर शुरू होते ही लगा कि मंज़िल से पहले ही जश्न शुरू हो गया है।
कोच चमचमा रहा था। सीटें आरामदेह थीं। झटके नाममात्र के थे। न खाने की फिक्र, न पानी की चिंता। गर्मागर्म नाश्ता और चाय अपनी सीट पर ही मिल गए। साफ-सुथरे शौचालय, शांत माहौल और बड़ी खिड़कियों से बाहर भागते खेत, पहाड़ और गांव।
चेन्नई कब आ गया, पता ही नहीं चला।
स्टेशन पर उतरे तो ऐसा नहीं लगा कि कई घंटे की यात्रा करके आए हैं। हम सीधे शादी की रौनक में शामिल होने के लिए तैयार थे।
यही सबसे बड़ा बदलाव है।
एक समय रेल यात्रा अपने आप में इम्तिहान होती थी। लोग घर से पूड़ी-सब्ज़ी, अचार, पानी की बोतलें और दवाइयों का थैला लेकर चलते थे। पूरी रात सामान की रखवाली करनी पड़ती थी। शादी में पहुंचते-पहुंचते आधी थकान चेहरे पर साफ दिखाई देती थी।
आज वंदे भारत ने सफर की पूरी तासीर बदल दी है।
अब यात्रा बोझ नहीं, छुट्टियों और खुशियों का हिस्सा बन गई है।
भारत का नया आकांक्षी मध्यवर्ग यही चाहता था। वह हवाई यात्रा जितना आराम चाहता है, लेकिन परिवार के साथ रेल यात्रा का अपनापन भी नहीं छोड़ना चाहता। वंदे भारत ने दोनों के बीच का रास्ता निकाल दिया है।
ट्रेन के भीतर भी भारत की एक छोटी-सी तस्वीर दिखाई देती है। कोई लैपटॉप पर काम कर रहा है। बच्चे खिड़की से बाहर झांक रहे हैं। बुजुर्ग आराम से अखबार पढ़ रहे हैं। अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, लेकिन मुस्कान की भाषा सबकी एक होती है। मोबाइल प्रेम इतना बढ़ गया है, की पहले जैसे आपस में अजनबी बात नहीं करते!

भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियां और इंजन नहीं है। यह देश की धड़कन है। यह गांवों को शहरों से, पहाड़ों को समुद्र से और दिलों को दिलों से जोड़ती है।

आज भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। करीब 68 हजार किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर रोज़ लगभग 13 हजार यात्री ट्रेनें दौड़ती हैं। हर दिन 2 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग रेल से सफर करते हैं। यानी कई देशों की पूरी आबादी से भी ज़्यादा लोग रोज़ भारतीय रेल पर भरोसा करते हैं।
साल 2019 में पहली वंदे भारत एक्सप्रेस नई दिल्ली और वाराणसी के बीच शुरू हुई थी। आज 2026 तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 160 से अधिक वंदे भारत सेवाएं चल रही हैं। इन ट्रेनों का निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत हुआ है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे नए भारत की पहचान बन चुकी है।
समय की बरबादी और सिरदर्दियों से तो बचते ही हैं, इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि रिश्ते और भी करीब आ गए हैं।
अब मैसूर का परिवार आराम से चेन्नई की शादी में शामिल हो सकता है। बेंगलुरु का बेटा सुबह निकलकर दोपहर तक घर पहुंच सकता है। बुजुर्ग बिना ज़्यादा थके बच्चों और पोते-पोतियों से मिलने जा सकते हैं।
रेल अब केवल यात्रियों को नहीं, उम्मीदों को भी मंज़िल तक पहुंचा रही है।
यह भी सच है कि भारतीय रेल की असली ताकत केवल वंदे भारत नहीं है। लाखों लोगों के लिए आज भी साधारण मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें जीवनरेखा हैं। किसान, मज़दूर, छात्र, व्यापारी और तीर्थयात्री, सबके लिए रेल बराबरी का सफर उपलब्ध कराती है।
इसी बराबरी में भारत की असली ताकत छिपी है।
रेल हमें केवल एक शहर से दूसरे शहर नहीं ले जाती। वह हमें एक-दूसरे के और करीब भी ले आती है। रास्ते में मिलने वाले लोग, बदलते नज़ारे, अलग-अलग बोलियां और साझा मुस्कानें हमें याद दिलाती हैं कि विविधता के बावजूद हम एक ही देश की संतान हैं।
इस बार चेन्नई की शादी में हमारे परिवार को जोड़ने का काम केवल रिश्तों ने नहीं किया। वंदे भारत ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई।
कभी-कभी राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होता। वह तब होता है, जब दादा-दादी बिना थके शादी में पहुंच जाएं। जब बच्चे सफर का आनंद लें। जब रिश्तेदार समय पर मिलें। जब यात्रा शिकायत नहीं, खुशगवार याद बन जाए।
भारतीय रेल पिछले 170 वर्षों से देश को जोड़ती आई है। वंदे भारत उस लंबी यात्रा का नया पड़ाव है। यह केवल तेज़ रफ्तार ट्रेन नहीं, बल्कि उस नए भारत की तस्वीर है जो अपने नागरिकों को सुविधा, सम्मान और बेहतर जीवन देना चाहता है।
मैसूर से चेन्नई तक के इस सफर में हमने सिर्फ दूरी तय नहीं की। हमने बदलते भारत की रफ्तार को अपनी आंखों से देखा, महसूस किया और जिया।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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