भ्रष्टाचार का विकराल रूप और समाज का मौन !

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— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : भ्रष्टाचार के आकंठ तक डूबे जनप्रतिनिधि, ब्यूरोक्रेट्स और समाज में भ्रष्टाचार को लेकर गहरी चुप्पी—देश और समाज के लिए घातक है। यहां जब जनप्रतिनिधि लिखा जा रहा है तो इसमें पक्ष-विपक्ष सभी शामिल हैं।अपवाद छोड़ दिया जाए तो कोई दूध के धुले नहीं हैं। सब पर्सेंटेज के खेल में बराबर के खिलाड़ी हैं। अब तो हालात ये हैं कि नेताओं से ज़्यादा ब्यूरोक्रेसी का ध्यान राजनीति और चुनाव पर है।क्योंकि उन्हें भी राजनीति का चस्का लग चुका है। सबको पहले जी भर कर पैसे कमाना है। फिर VRS या रिटायरमेंट के बाद राजनीति में एंट्री लेनी है। सो, हर ओर राजनीति और भ्रष्टाचार हावी है।सबको अपने-अपने नंबर बढ़ाने हैं।

हादसे हो रहे हैं। इमारतें, सड़कें, फ्लाईओवर धंस रहे हैं।कभी ज़’हरीली कफ सिरप नौनिहालों को मौ’त के घाट उतार रही है।कभी ज़’हरीली शराब से लोगों की जानें जा रही हैं।कहीं बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते लोगों की मौ’तें हो रही हैं। सरकारी अस्पतालों की खस्ताहाल हालात और मरीज़ों की भीड़ भयावह बनती जा रही है। कहीं एंबुलेंस और पक्की सड़क तक नसीब नहीं। वहीं स्कूल के जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी, प्रतियोगी परीक्षाओं और नियुक्तियों में लेटलतीफ़ी, प्रशासनिक पदों की रिक्तियां, प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव ; सबकुछ फील गुड दे रहा है। न्यायपालिका में केसेज का बोझ इतना है कि न्याय की उम्मीद में लोगों की ज़िंदगियां गुज़र जाती हैं। कोर्ट के चक्कर लगाते-लगाते हालत ख़राब हो जा रही है।

परिवर्तनकारी परिणाम मूलक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय—कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में कार्यक्रमों, आंकड़ों की जादूगरी चल रही है। पब्लिसिटी स्टंट के जितने तौर तरीके होते हैं वो सब चल रहे हैं। स्टूडेंट्स-की ऊर्जा और कार्यक्षमता का राजनीति दोहन कर रही है। व्यवस्था उन्हें पंगु बना रही है। किन्तु ज़वाबदेही कहां है? इन सबका कौन ज़िम्मेदार है? क्या कभी जांच की आंच किसी कलफ़दार तक पहुंचती है? कोई लाटसाहब और नेताजी ; सलाखों के पीछे पहुंचते हैं?याकि मुद्दे की ट्रेंडिंग के हिसाब से ही सबकुछ शून्य हो जाता है?

क्या समाज अपनी शक्ति को पहचान पा रहा है? ये सच है कि लोगों की आय बढ़ी है, महंगाई बढ़ी है। किन्तु इसके समानांतर उतनी ही रफ़्तार से भ्रष्टाचार भी समाज में इंजेक्ट हुआ है। लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं करता है। समाज ने अपने सारे कार्य और उत्तरदायित्व – सरकार और प्रशासन को सौंपकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी सी मार ली है‌।

हालांकि सरकार-सुशासन और पारदर्शिता के तमाम काम कर रही है। वन क्लिक साल्यूशन पर ज़ोर है। लेकिन अपवाद छोड़ दिया जाए तो कोई भी सरकारी ऑफिस ऐसा नहीं है।जहां बिना सुविधा शुल्क (रिश्वत) के लोगों के आसानी से काम हो पा रहे हों। सब ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। पक्ष-विपक्ष, समाज सबका मौन समर्थन है। कोई न कुछ बोलना चाहता है और न सुनना चाहता है। न ही समाधान लाना चाहता है।

मुद्दे, विरोध—सिर्फ़ शोर और कुंठित घ्रणित नारों में तब्दील हो चुके हैं। जनसरोकार केवल शब्दों की जुगाली में शोभा दे रहा है।हर व्यक्ति भ्रष्टाचार के दंश से कराह रहा है। लेकिन सब मौन हैं। हादसे होते हैं। मौ’तें होती हैं। कुछ दिन शोरगुल होता है। कागज़ में कार्रवाई की फ़ाइलें दौड़ती हैं। फिर चारो ओर गहरी ख़ामोशी छा जाती है। समाज, सरकार, प्रशासन तभी जागते हैं जब तक कोई नई मुसीबत न आ जाए। अन्यथा किसे चिंता है?

लोगों को सिर्फ़ दूसरों का भ्रष्टाचार बुरा लगता है।अपना भ्रष्टाचार—प्रतिष्ठा में चार चांद लगाता है।शीशमहल बनाता है।आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा पार कराता है। चारो ओर भाषणों की भरमार है‌। अपने गिरेबान में झांके बग़ैर सब केवल दूसरों को उपदेश दे रहे हैं।सबकी नज़र सिर्फ़ इस पर टिकी है कि-कहां से कितना कमा लिया जाए? बाक़ी सब भाड़ में जाए।

ये सब इसीलिए हो रहा है क्योंकि हम एक व्यक्ति और समाज के नाते अपने राष्ट्रीय चरित्र को तिलांजलि देते जा रहे हैं।जब समाज में धन और राजनीति जैसे तत्व हावी होते हैं तो इसकी परिणति ऐसे ही होती है। लोगों को लगता है कि – मेरे सुधरने बस से क्या होगा? यही वो सोच है जिसके चलते हम पतन की ओर बढ़ रहे हैं। क्योंकि हमारा एक-एक कार्य देश और समाज के जीवन में परिलक्षित होता है। ठीक वैसे ही जैसे चींटियों का चीनी इकट्ठा करना। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि सब जानते हुए भी हम मौन हैं।

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