दिलीप सी मंडल
दिल्ली। ठाकुर का कुआं हो या ब्राह्मनिकल पेट्रियार्की, या मनुस्मृति को आज की महिलाओं की स्थिति से जोड़ना… इनसे एससी, एसटी, ओबीसी का कोई लेना देना नहीं है.
ठाकुर का कुआं 1932 में मुंशी प्रेमचंद ने लिखी, जो कायस्थ थे. ये जाति जनरल में आती है. इनसे प्रभावित होकर बाद में कविताएं लिखी गईं. पर शुरुआत यहीं है.
ब्राह्मनिकल पेट्रियार्की यानी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का आविष्कार प्रो. उमा चक्रवर्ती ने 1990 के दशक में किया जो ब्राह्मण थीं.
ये शब्द इससे पहले न लिखा गया था, न बोला गया था.
राहुल गांधी इसी के आधार पर मनुस्मृति को महिला शोषण का आधार बता रहे हैं और कह रहे हैं कि महिलाओं को पिता, भाई और बेटे की गुलामी से आजाद हो जाना चाहिए.
इन सबसे किसी ओबीसी या दलित या आदिवासी का लेना-देना नहीं है. ये सब प्रगतिशील और मार्क्सवादी लोगों के आपसी मैटर हैं. वही शुरू करते हैं फिर दो ग्रुप बनाकर आपस में लड़ते हैं.
ये सब वहीं निपटा लीजिए.
बाबा साहब ने पानी के मैटर में भेदभाव का जिक्र सिर्फ एक बार किया है, जब रमजान के महीने में दौलताबाद के मुसलमानों ने पानी पीने को लेकर उनके साथ बुरा बर्ताव किया था, जातिसूचक गाली दी थी और मारपीट की नौबत आई थी.
ये 1934 की घटना है. बाबा साहब की आत्मकथा वीजा की प्रतीक्षा में ये घटना डिटेल में लिखी है. हर लाइब्रेरी में तथा ऑनलाइन उपलब्ध है.
पानी को लेकर भेदभाव के लिए उन्होंने किसी हिंदू पर कभी दोष नहीं लगाया. उनका लिखा एक एक लाइन पढ़ लीजिए. कहीं नहीं मिलेगा.
आप महाराष्ट्र घूमने जाएं तो वह जगह देख सकते हैं.



