विनय झा
अयोध्या : चम्पत राय को बिना न्यायिक प्रक्रिया के सीधे फाँसी दे दो,अथवा बिना न्यायिक प्रक्रिया के सीधे बरी कर दो । दोनों परस्पर विरोधी गुटों के मेंढकों में एक समानता है — न्यायिक प्रक्रिया को ताक पर रखों और केवल अपने झुण्ड की बात सुनो।
होमो इडियट प्रजाति स्वयं को सेपियन्स कहती है किन्तु कुछ अपवादों के सिवा इसे श्याम−श्वेत में ही सबकुछ देखने की बीमारी है,सतरङ्गी चीजें दिखायेंगे तो माथा दुखने लगता है।
कानपुर के ईसाई कॉलेज से पढ़े विनोद पाण्डे का कहना है कि विनय झा और चम्पत राय दोनो बिहारी है जिस कारण विनय झा ने चम्पत राय का समर्थन किया।
पिछले पोस्ट में मैंने चम्पत राय का न तो समर्थन किया और न विरोध,मैंने न्यायिक प्रक्रिया की बात कही ।
पिछले पोस्ट में चम्पत राय का जन्मस्थान उत्तरप्रदेश का नगीना दिया गया है । किसी को यह सूचना गलत लगे तो स्वयं ऑनलाइल ढूँढ ले,चम्पत राय प्रसिद्ध व्यक्ति है । बिना छानबीन का प्रयास किये कॉलेज में पढ़े व्यक्ति विनोद पाण्डे ने उनको झूठमूठ बिहारी क्यों कहा?
क्योंकि चम्पत राय को बिना न्यायिक प्रक्रिया के सीधे फाँसी देना चाहते हैं,मैंने न्यायिक प्रक्रिया की बात कही तो गुस्सा मुझपर भड़क गया ।
लगभग छ−सात लोगों ने इससे भी आगे बढ़कर मेरे लिए अपशब्दों का प्रयोग किया । उनमें से कई लोगों ने मेरे पोस्ट को पूरा पढ़ा भी नहीं,ऊपर की एकाध पङ्क्तियाँ पढ़कर राय बना लेते हैं और फिर गाली−गलौच पर उतर आते हैं।
किन्तु ऐसे मुट्ठी भर लोगों से सैकड़ों गुणा अधिक संख्या उन लोगों की है जिनको मेरा पिछला पोस्ट पसन्द आया और लाइक ठोके — मुझे वास्तविक शिकायत उनसे ही है । अभीतक चौदह सौ लोगों ने पिछले पोस्ट पर लाइक ठोके हैं,जबकि उससे लाखों गुणा अधिक महत्वपूर्ण “चरित्र” और पीछे के लेखों पर दौ−चार सौ लाइक ही मिलेंगे । चम्पत राय जैसे फालतू विषय पर एक सहस्र अतिरिक्त लाइक हैं जो “चरित्र” और उसी प्रकार के गम्भीर लेखों पर नदारद हैं । लोगों को फालतू और हल्के मनोरञ्जक विषय चाहिए । ऐसे हल्के विषयों पर लिखना मैंने बहुत पहले ही बन्द कर दिया था । चम्पत राय पर कुछ भी लिखने की मेरी ईच्छा नहीं थी,मैंने जानबूझकर यह देखने के लिए लिखा ताकि पता चले कि फेसबुक ने जानबूझकर मेरे लेखों को दबाना आरम्भ कर दिया है अथवा लोग ही गम्भीर लेखों पर लाइक नहीं करते । पिछले कई लेखों में मैंने एक नयी नीति अपनायी है — हर लेख में चित्र वा चलचित्र डाल देता हूँ क्योंकि उसे लाइक नहीं करने वालों ने भी यदि देखने के लिए क्लिक किया तो फेसबुक ऐसे लोगों की संख्या बता देता है । ऐसे लोगों की संख्या लेख पर लाइक ठोकने वालों से बीस गुणी अधिक है । अतः फेसबुक रीच नहीं घटाता,अधिकांश लोग ही ऐसे हैं जो गम्भीर विषय पसन्द नहीं करते।
मुझपर न तो गालियों का प्रभाव पड़ता है और न प्रशंसा का,इन बातों की जाँच केवल लोगों को समझने के लिए मैं करता हूँ।
पराशर होराशास्त्र में यह भी लिखा है कि धर्मभाव का ईश यदि कामभाव में हो तो काम पर धर्म का नियन्त्रण रहता है,किन्तु कामभाव के ईश यदि धर्मभाव में हों तो धर्मक्षेत्र में काम का प्रकोप रहता है । कामेश नीच का हो तो करैले पर नीम चढ़ा।
यह टिपण्णी किसी व्यक्ति पर नहीं है —
वैसे सभी दलों और संगठनों पर है जो होमो इडियट को “होमो” बनाना चाहते हैं
विनय झा ने पिछले पोस्ट में लिखा :
चम्पत राय को जब चढ़ावे के धन की चोरी का पता चला, तब मामला दबाया नहीं गया। अयोध्या पुलिस ने लवकुश मिश्र के घर छापा मारा और लगभग १०–१२ लाख रुपये बरामद किये। यह कार्यवाही चम्पत राय की उपस्थिति में हुई। यदि चम्पत राय चोरी छिपाना चाहते, तो क्या वे पुलिस कार्यवाही में उपस्थित रहते?
कैमरों से छेड़छाड़ और दान-गणना व्यवस्था में गड़बड़ी की जानकारी मिलने पर ट्रस्ट-स्तर पर गुप्त कैमरे लगवाये गये। उन्हीं गुप्त कैमरों और CCTV साक्ष्यों के आधार पर SIT के पास आज ठोस सामग्री है। अतः यह कहना कि चम्पत राय ही चोरी के संरक्षक थे, तथ्य के विपरीत और अन्यायपूर्ण है।
चम्पत राय का दोष अवश्य है—वे अच्छे प्रशासक सिद्ध नहीं हुए। इतने बड़े दान-तन्त्र में SOP टूटे, दान-गणना कक्ष की सुरक्षा शिथिल रही, चाबियों और कर्मियों पर नियंत्रण कमजोर रहा, और ऐसे लोग भीतर पहुँच गये जिन पर भरोसा करना भारी भूल सिद्ध हुआ। यह प्रशासनिक विफलता है, और इसकी नैतिक जिम्मेदारी शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से बच नहीं सकती।
किन्तु प्रशासनिक अयोग्यता और चोरी में संलिप्तता — दोनों एक बात नहीं हैं। चम्पत राय की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि वे चिकनी-चुपड़ी बातें करने वालों पर शीघ्र भरोसा कर लेते हैं और मनुष्य की पहचान नहीं कर पाते। इसी कमजोरी का लाभ उन लोगों ने उठाया जो दान-व्यवस्था के भीतर पहुँच गये।
आज मीडिया का बड़ा भाग तथ्य की जगह मीडिया-ट्रायल कर रहा है। विपक्ष तो राजनीति करेगा ही; पर आश्चर्य यह है कि भाजपा-समर्थक मीडिया भी कुछ संकेतों पर चम्पत राय को ही बलि का बकरा बनाने में लगी है।
सही माँग यह होनी चाहिए कि SIT जाँच पूरी करे, केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहे, बल्कि उन सभी लोगों तक पहुँचे जिनके कारण चोरी की व्यवस्था बनी, चाबियाँ गलत हाथों में पहुँचीं, कैमरों से छेड़छाड़ हुई और दान-गणना की मर्यादा टूटी।
चम्पत राय अपराधी हैं या नहीं — यह न्यायिक जाँच का विषय है। पर अभी तक जो तथ्य सामने हैं, वे उन्हें चोर सिद्ध नहीं करते; वे उन्हें एक असफल प्रशासक अवश्य सिद्ध करते हैं।
रामभक्तों के दान का विषय राजनीति या मीडिया-ट्रायल का विषय नहीं होना चाहिए। यह पारदर्शी जाँच, पूर्ण लेखा-परीक्षा और दोषियों को कठोर दण्ड देने का विषय है।
कुछ लोग मेरे पोस्ट का जानबूझकर गलत अर्थ लगा रहे हैं कि मैं चम्पत राय को निर्दोष मानता हूँ । उनकी जन्मकुण्डली में धर्म के भाव में प्रचण्ड धनयोग एवं अशुभ भी!ड्राइवर तो माध्यम है
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चम्पतराय जी को बलि का बकरा बनाना अनुचित है क्योंकि बड़े बड़े मगरमच्छों ने इस बहती गंगा में हाथ धोये हैं । एक व्यक्ति को बलि का बकरा बनाकर बड़े मगरमच्छों को बचाना मीडिया का उद्देश्य है । घोटाला विशाल स्तर का है । चम्पत राय स्वयं चोर न भी हों तब भी दोषी है और जेल जाने योग्य हैं — क्योंकि सबसे वरिष्ठ पद पर वही थे और चोरी चलती रही ।
चम्पत राय की जानकारी और संलिप्तता के बिना कोई चोर वहाँ चोरी कर ही नहीं सकता ।
सबसे अधिक वेध=नृ : ट्रस्ट का सर्वेसर्वा बनने का प्रयास कर रहा है ।



