एक्सपोज हुआ ‘ब्राम्हणवाद’ का झूठा प्रोपेगेंडा : भाग एक

राकेश उपाध्याय

दिल्ली। देश के विभाजन के पूर्व भारत बुरी तरह से अंग्रेजी साम्राज्य द्वारा लूटा गया, बांटा गया । गंगा घाटी की लूट ने संसार में लूट के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त किए। इन बातों से देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए ही अंग्रेजी राज में जातिगत ऊंच नीच का नया ताना-बाना रचा गया।

वस्तुतः आज नए सिरे से हर तथ्य की पड़ताल आवश्यक है। मसलन, आजादी के समय मौजूद 582 गणराज्यों की स्वायत्त राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक-व्यापारिक व्यवस्था का अध्ययन करते समय यह पूछा ही जाना चाहिए कि ये गणराज्य किन जातियों के आधिपत्य में अपनी व्यवस्था का संचालन कर रहे थे?

शोधपरक आंकड़ों के मुताबिक, 582 रियासतों या गणराज्यों में केवल 19 रियासतें या गणराज्य ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, कायस्थ आदि के नियंत्रण में थीं, उनमें भी ज्यादातर आज के महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात आदि इलाकों में थीं।
इन 19 कथित ब्राह्मण नियंत्रण के गणराज्यों  को हटा देने के बाद बचती हैं 563 रियासतें, इनमें से 370 गणराज्यों का शासन-प्रशासन सीधे तौर पर क्षत्रियों, क्षत्रिय उपजातियों, मराठों, कुनबी, कुर्मी, कुशवाहा, यादव, पाल आदि अनेक प्रमुख योद्धा जातियों के हाथ में था। इन 370 गणराज्यों में ग्वालियर के कुर्मी शासक, इंदौर होल्कर घराने के धनगड़ यानी पाल शासक, कोल्हापुर के शाहूजी महाराज, बड़ौदा के गायकवाड़, मराठी पंवार, परमार आदि अनेक समूह शामिल हैं।

स्पष्ट है कि आज के कथित ओबीसी समाज के अधिकांश जातियों के लोग ही भारत का शासन-प्रशासनन चलाते आ रहे थे। 563 रियासतों या गणराज्यों में अधिकांश रियासतें या गणराज्य आज की कथित पिछड़ी, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जातियों के ही अधीन थे। इनके जाति प्रमुखों में ही इन गणराज्यों के संचालन का दायित्व था। लिहाजा इन जातियों के भीतर राजप्रमुख बनने के लिए भारी प्रतिस्पर्धा भी रहती थी।

शोध विवरण के अनुसार, गुजरात, एमपी, महाराष्ट्र, कर्नाटक में सागर किनारे तक फैले 39 गणराज्य ऐसे थे जिनका सीधा नियंत्रण, प्रशासन कृषक, मत्स्यपालन, आखेट, युद्धक सामग्री के उत्पादन से जुड़ी कोली आदि जातियों के हाथ में ही था।

पहले भी अनेक शोध विवरणों में यह जानकारी आ चुकी है कि बंगाल की रियासत पर अनुसूचित जाति की महारानी रानी रासमणि का ही नियंत्रण था। गंगा घाटी में यदुवंश, निषाद जाति, डोम जाति, राजभर जाति, कुशवाहा जाति, पासवान, खटिक और चर्मकार के भी अनेक स्वायत्त राजकीय व्यवस्थाएं चल रही थीं। इनमें से कई को गणराज्य का दर्जा मिला हुआ था।

वस्तुतः इन सभी की स्वायत्ता को अंग्रेजी राज में चुनौती दी गई, और षड्यंत्रपूर्वक धीरे धीरे उसे कमजोर किया गया, या नष्ट ही कर दिया गया। इसमें अनेक कारक सम्मिलित हैं, जिनपर शोधपूर्ण सामग्री कभी दी जाएगी।
1947 से 1950 के मध्य भारत सरकार ने विधिपूर्वक इन जाति समूहों के नियंत्रण में चल रहे स्वायत्त गणराज्यों को अपने अधीन कर लिया। सबसे अंत में गोवा का नियंत्रण हमें मिला। यह इतिहास का ऐसा सत्य है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

प्राचीन भारत की वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था पर जो उंगली उठाते हैं, उन्हें पहले इसका जवाब देना होगा कि यदि उनके बताए अनुसार चारों ओर ब्राह्णण ही ब्राह्मण था तो 563 से अधिक रियासतों पर किस तरह से अन्य गैर ब्राह्मण जातियों का आधिपत्य आया?

यहां यह बताना उल्लेखनीय है कि औरंगजेब की सत्ता उखड़ने के बाद धीरे धीरे भारत की कथित पिछड़ी जातियों ने अपनी स्वायतत्ता फिर से अपने गणराज्यों में कायम कर ली। 1857 आते आते 584 गणराज्यों में मुस्लिम नवाबों या उनके सूबेदारों का हिस्सा बुरी तरह घट गया। 1947 में तो मुश्किल से 50 से भी कम रियासतें मुस्लिम अगुवाई में शेष बची थीं।

इस प्रकार मुस्लिम आधिपत्य के कमजोर पड़ते ही कथित पिछड़ी जातियों के नेतृत्व ने और जनजातियों ने अपनी स्वतंत्रता कायम कर ली थी, जिन्हें पुनः ब्रिटिश राज में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

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