मेरी चिंता का स्वर भिन्न है …

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प्रवीण कुमार मकवाणा

अहमदाबाद। धर्मेंद्र प्रधान ने त्यागपत्र दे दिया। यह चिंता का विषय नहीं है। क्योंकि वह पद सदैव के लिए रिक्त नहीं हुआ है, उनके स्थान पर श्री प्रह्लाद जोशी आ गए हैं। मंत्रिमंडल में हेर-फेर होता, तब भी मंत्रालय बदलते ही हैं। फिर मोदी सरकार के कई मंत्रियों के तो मुझे नाम तक नहीं पता है।

दूसरा, चंद अराजक तत्त्वों के समक्ष सरकार ने घुटने टेक दिए। यह बात भी आहत नहीं करती। यह तो निश्चित है कि मुझ जैसे सामान्य नागरिक से कहीं अधिक जानकारी और इनपुट्स सरकार के पास रहे होंगे। सरकार ढेर सारे गुणा-भाग के बाद किसी निर्णय पर पहुँचती है। सरकार का एकमेव कार्य हमारे उत्साह को तुष्ट करना नहीं है।

हाँ, यह विरोधाभास अवश्य प्रतीत होता है कि यदि कुछ अराजक तत्त्व विरुद्ध खड़े थे, तो करोड़ों लोगों ने आपमें विश्वास प्रकट कर आपको स्टेट के नियमन का दायित्व सौंपा था। लेकिन, मेरी चिंता का विषय यह भी नहीं।

मेरी मूल चिंता विलग है। मैं सोचता हूँ कि जब कोई आंदोलन सफल होता है, तो उसमें प्रयुक्त चेहरों, विचारों और यहाँ तक कि नारों को भी एक प्रकार से वैलिडेशन मिलता है, परोक्षापरोक्ष रूप से।

एक धारणा, जो इस आंदोलन से जन्मी — शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, हिंदू मुस्लिम फालतू मुद्दे हैं, बीजेपी अपनी राजनीति के लिए उपयोग करती है।

शिक्षा तो निर्विवाद रूप से महत्त्वपूर्ण है ही। लेकिन दूसरा विषय मात्र राजनीतिक नहीं, उसकी जड़ें साभ्यतिक विमर्श से जुड़ती हैं। कोई भी विमर्श जिसका संबंध सांस्कृतिक मूल्यों अथवा अस्तित्वगत चेतना से हो, वह व्यर्थ कैसे हो सकता है ?

बीजेपी हिंदुत्व के नाम पर वोट बटोरती है ? बिल्कुल। ठीक वैसे ही, जैसे कांग्रेस मुस्लिम वोट बटोरती रही है, सपा और तृणमूल कांग्रेस भी। यहाँ तक विषय राजनीतिक है।

लेकिन, प्रायः देखने में आएगा कि जो विपक्ष से जुड़े लोग हैं अथवा नई पौध है अथवा कुछ जातियाँ हैं, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस आदि को वोट करती हैं, उनके नए लोगों के मन में धर्म के प्रति एक विद्रोह है, जिसकी जड़ें दार्शनिक अथवा विशुद्ध आध्यात्मिक चिंतना से न होकर, सतही तार्किक लगने वाले राजनीतिक वितान से जुड़ी हैं। यह स्थिति घातक है।

जब सांस्कृतिक चेतना के विषय में कोई राय राजनीतिक विमर्श के कारण बनती हो, वह अत्यंत सतही आधार पर खड़ी होती है।

ज़ेन-जी पीढ़ी रील देखती है। वह इस्लामिक थियोलॉजी नहीं पढ़ेगी; वह जगत भर में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के आधारों का विवेचन नहीं करेगी; वह भारत विभाजन के देवबंदी अथवा दहलवी कोण तक नहीं जाएगी; कश्मीर, मोपला, बंगाल की कहानियाँ उसके लिए स्क्रॉल कर आगे बढ़ जाने योग्य बोरिंग सामग्री बनेगी।

हिंदू-मुस्लिम बीजेपी का मुद्दा है। लेकिन जब बीजेपी नहीं थी, तब भी हिंदू मुस्लिम एक मुद्दा था। यदि मुद्दा न होता, तो लाखों हिंदुओं के धर्मांतरण का कारण क्या रहा ? लाखों मंदिरों के देव-विग्रह तोड़ने के पीछे कौनसा अदृश्य कारण रहा ? खैर …

विश्वभर में रेडिकल इस्लामिक तत्त्वों को लेकर घनघोर अनादर और घृणा भाव पनप रहा है। वहाँ बीजेपी नहीं है।

आपने गालियाँ बकती कितनी मुस्लिम लड़कियाँ देखीं आंदोलन में ? लगभग नहीं के बराबर। वे सब हिंदू लड़कियाँ थीं। लेफ्ट हिन्दू लड़कियों को इस्लाम की थाली में परोसने के लिए तैयार करता रहा है। यह ऐतिहासिक और वैचारिक तथ्य है। विषय यहाँ तक सीमित नहीं है।

भारत विरोधी अथवा हिन्दू विरोधी जितनी भी बातें हैं, उन्हें लेकर रिपोर्ट्स हैं, सर्वे हैं, किताबें हैं, रिसर्च पेपर्स हैं; कुला जमा हिन्दू विरोध के लिए एक पूर्णतः अकादमिक खाका है। जिसके आधार पर किसी भी कथित पढ़े-लिखे को झांसे में लिया जा सकता है। प्रत्युतः कौन धर्मपाल जी को पढ़ेगा, किसके पास सीताराम गोयल को पढ़ने का समय है और फिर वीपी काणे जी कृत धर्मशास्त्र का इतिहास उठाने का दुस्साहस तो कौन ही करेगा ??

ऐसे आंदोलन गंभीर सांस्कृतिक चेतना की गति को कुंद करते हैं, वे सतही वस्तुओं और मुद्दों में आकर्षण उत्पन्न करते हैं। अराजक लोगों की सतही बातों में उजास नजर आने लगता है और ऋषि-वाक्यों में अनास्था दिखाई पड़ने लगती है।

खैर … प्रकृति में कुछ भी नित्य नहीं है।

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