पवन विजय
दिल्ली। ये कोई इत्तेफाक नहीं है कि पैसा अमेरिका से निकलता है, शंघाई में ठहरता है और निशाना दिल्ली बनता है। नेविल रॉय सिंघम, अमेरिका में पैदा हुआ श्रीलंकाई मूल, चीनी नागरिक । थॉटवर्क्स बेचकर सात सौ पचासी मिलियन डॉलर जेब में, फिर सीधे शंघाई में डेरा। वहाँ से वो एक पूरी फैक्ट्री चलाता है पीपल्स फोरम, ट्राईकॉन्टिनेंटल, ब्रेकथ्रू न्यूज़। फैक्ट्री किस चीज की? नैरेटिव की। कश्मीर में भारत कब्जा कर रहा है, किसान आंदोलन में फासीवाद है, शाहीन बाग में क्रांति है, और चीन में सब ठीक है। न्यूयॉर्क टाइम्स तक को लिखना पड़ा कि ये बंदा चीनी प्रचार तंत्र का खजांची है। भारत में इसका काउंटर खोला गया न्यूज़क्लिक। ईडी की चार्जशीट कहती है जस्टिस एंड एजुकेशन फंड से दस दशमलव पाँच मिलियन डॉलर आए। किसलिए? ताकि अरुणाचल को चीन का दिखाने वाले नक्शे ईमेल में घूमें, ताकि कश्मीर पर जनमत-संग्रह की बात हो, ताकि जवानों पर सवाल उठे। दिल्ली पुलिस ने इसे अल्टीमेट पेमास्टर चीन कहा।
और जब सीधे नाम लेना मुश्किल हो तो रास्ता बनता है टाइड्स फाउंडेशन का। टाइड्स देता है अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट को। वही अमन, जो अमन-बिरादरी की आड़ में सेक्युलरिज्म का सर्टिफिकेट बांटता है। और अमन का चेहरा कौन? जमाल किदवई। अब जमाल किदवई को समझो। बाप अनवर जमाल किदवई जामिया का छठा वाइस चांसलर, बड़ा अफसर, मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर का संस्थापक। बेटे को विरासत में कुर्सी नहीं, कुर्सी का रसूख मिला। वही जमाल किदवई जो छब्बीस ग्यारह के कसाई अजमल कसाब के लिए दया याचिका पर दस्तखत करता है। एक सौ छियासठ लाशें, ताज में खून, और यहाँ मानवाधिकार की चिट्ठी। ये वही सोच है जो आतंकी को भी पीड़ित बना देती है और देश को ही कठघरे में खड़ा कर देती है।
और फॉक्स न्यूज़ ने जो किया वो इसी पैटर्न को नंगा करता है। फॉक्स की पड़ताल कहती है – तेरह देश, एक सौ एक संगठन, एक ही स्क्रिप्ट। फ्रांस में दंगा भड़काओ, अमेरिका में इजराइल के खिलाफ कैंपस जाम करो, भारत में चुनाव आयोग को गाली दो, संसद पर सवाल उठाओ। तरीका वही – पहले एनजीओ, फिर मीडिया, फिर सड़क पर भीड़, और पीछे से डॉलर। समझने की बात ये है कि ये भारत-विरोधी नैरेटिव गोली से नहीं, शब्द से लड़ता है। ये कहता है भारत में लोकतंत्र खतरे में है, ताकि बाहर से भारत को लेक्चर दिया जा सके। ये कश्मीर को फिलिस्तीन बनाता है, ताकि भारत को इजराइल जैसा विलेन दिखाया जा सके। और इसका पैसा कभी सीधे नहीं आता, हमेशा टाइड्स, अमन, पीपल्स फोरम जैसी तीन परतों में लिपटा हुआ आता है ताकि पकड़ में न आए। सिंघम सिर्फ एक नाम नहीं है, वो एक मॉडल है – पैसा बाहर का, लेबल मानवाधिकार का, और टारगेट भारत। इसे पहचानिए, सोरोस और सिंघम के एजेंट्स को पहचानिए।



