नई दिल्ली । देश में विदेशी फंडिंग का खेल अब जॉर्ज सोरोस और फोर्ड फाउंडेशन से आगे निकल चुका है। नया खिलाड़ी है – ठाकुर फैमिली फाउंडेशन। नाम सुनने में लगता है जैसे कोई समाजसेवी संस्था हो, लेकिन इसकी जड़ें और जेब दोनों अमेरिका में हैं।
इसका मालिक है दिनेश ठाकुर। वही दिनेश ठाकुर जो रैनबैक्सी में नौकरी करता था, फिर अमेरिका जाकर उसी कंपनी को कोर्ट में घसीटा और व्हिसलब्लोअर बनकर 48.6 मिलियन डॉलर, मतलब करीब 400 करोड़ रुपये जेब में डालकर ‘जनसेवा’ करने निकल पड़ा।
जनसेवा का तरीका देखिए – भारत आकर सीधे दवा नहीं बांटी, सीधे मीडिया और एनजीओ बांटे।
2020 से 2025 तक इस ‘दानवीर’ ने 188 लोगों और संस्थाओं को 21 करोड़ रुपये बांटे हैं। पैसा गया कहां?
स्क्रॉल को, द वायर को, कारवां को। वही पोर्टल जो दिन-रात भारत की कोविड मैनेजमेंट, भारतीय दवाओं और आयुर्वेद को टारगेट करते हुए रिपोर्ट छापते रहे। और हर रिपोर्ट के नीचे छोटा सा डिस्क्लेमर – “This report is supported by Thakur Family Foundation”। मतलब पैसा ठाकुर का, कलम आपकी, एजेंडा किसका?
सबसे बड़ा जुगाड़ ऑल्ट न्यूज वाला है। ऑल्ट न्यूज के पास विदेश से पैसा लेने का लाइसेंस ही नहीं है, क्योंकि एफसीआरए नहीं है। तो क्या किया? संस्था को नहीं, संस्था में काम करने वालों को पैसा दे दिया। सुमैया शेख और शरफरोज सतानी के नाम पर लगभग 50 लाख रुपये। कानून की किताब में यह सीधा-सीधा एफसीआरए का बायपास है।
और अब हद तो तब हो गई जब 2026 में इसने भारत की न्यायपालिका पर रिसर्च करने के लिए विदेशी लेखकों को पैसा देना शुरू कर दिया। विषय है – “भारत में ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी”। मतलब अमेरिका में बैठकर तय होगा कि भारत का जज कैसा काम कर रहा है।
यह पब्लिक हेल्थ है या पब्लिक इंटरफेरेंस?
जब एक आदमी जिसका पूरा धंधा ही भारतीय फार्मा इंडस्ट्री को बदनाम करके बना हो, वही भारत में हेल्थ रिपोर्टिंग फंड करे, तो उसे पत्रकारिता नहीं, हितों का टकराव कहते हैं।
यह दान नहीं है। यह निवेश है – भारत के विमर्श में, भारत की छवि में, और भारत की संस्थाओं में दखल देने का निवेश।



