डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल । देश में जब ‘नीट’ प्रश्नपत्र लीक का मामला सामने आया तो स्वाभाविक रूप से लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों में गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ। यह उन युवाओं के भविष्य का प्रश्न था जिन्होंने वर्षों की मेहनत, आर्थिक संसाधन और मानसिक ऊर्जा इस परीक्षा की तैयारी में लगाई थी। ऐसे समय में छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति माना जा सकता है।
वैसे भी किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को अपनी बात रखने, सरकार से जवाब मांगने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करने का पूरा अधिकार है, किन्तु दिल्ली में पिछले दिनों में जो घटा है, उसे देखने के बाद यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या यह आंदोलन अभी भी छात्रों के भविष्य और शिक्षा सुधार को लेकर हो रहा है?
जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के अनेक दृश्य, वहां उठ रहे विभिन्न प्रकार के नारे, अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक संगठनों की बढ़ती सक्रियता तथा शिक्षा से असंबंधित मुद्दों की प्रमुखता ने इस आंदोलन की दिशा और उद्देश्य पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है।
इसी संदर्भ में जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन को लेकर अनेक वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक चर्चाएं सामने आ रहे हैं। इनमें कुछ स्थानों पर ऐसे नारे सुनाई देने के दावे किए गए जिनका NEET, परीक्षा सुधार या शिक्षा व्यवस्था से कोई प्रत्यक्ष संबंध दिखाई नहीं देता।
यदि वास्तव में किसी प्रदर्शन में “आरएसएस मुर्दाबाद”, “ब्राह्मण मुर्दाबाद”, “हम हिंदू नहीं हैं”, अथवा किसी देवी-देवता के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां जैसे नारे लगाए गए हों, तो यह साफ दर्शाता है कि आन्दोलन के नाम पर वास्तविकता में जंतर-मंतर भी हिन्दू विरोध और सनातन धर्म को टार्गेट किया जा रहा है। कुछ नारे तो बेहद ही आपत्ति जनक है, जिन्हें यहां लिखने के लिए भी हिम्मत चाहिए, किंतु आप सभी को सच से अवगत कराना भी जरूरी है, इसलिए आप स्वयं पढ़ें और विचार करें कि आखिर इस आन्दोलन को कौन लोग चला रहे हैं!
सीता का पति क्या कर लेगा। भगवान भी मोदी की तरह कमीना है, जब चाहे मौसम बदल देता है। नाम रहेगा अल्लाह का। प्रेमानंद महाराज नहीं हैं। हम हिंदू नहीं हैं, हमें हिंदू मत कहो। भारत तेरे टुकड़े होंगे। अब विचार करें कि इन नारों को सुनकर या पढ़कर किस देश भक्त को आक्रोश ही आएगा? साच्चायी तो यही है कि ऐसे नारे न सिर्फ आंदोलन के घोषित उद्देश्य से असंबंधित हैं, बल्कि ये समाज में अनावश्यक वैमनस्य भी उत्पन्न करते हैं।
इसी प्रकार, यदि मंच पर महिलाओं के आरक्षण, किसानों के आंदोलन अथवा अन्य राजनीतिक विषय प्रमुख होने लगें, तो इससे यह संदेश जाना स्वभाविक है कि छात्र आंदोलन अब अनेक अलग-अलग एजेंडों का साझा मंच बन गया है। लोकतांत्रिक बहुलता अपने आप में नकारात्मक नहीं है, किंतु जब मूल प्रश्न पीछे छूट जाए, तो आंदोलन की प्रभावशीलता कम होने लगती है। फिर उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। फिर प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार और कुछ स्थानों पर अव्यवस्था की खबरें और वीडियो भी चिंता बढ़ाते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न संसाधनों और सहयोग का है। सार्वजनिक चर्चा में यह भी सामने आया कि कुछ प्रदर्शनकारियों को विदेशों से भोजन अथवा अन्य प्रकार की सहायता भेजी जा रही है। सरकार के खिलाफ चल रहे इस प्रदर्शन में बांग्लादेश, पाकिस्तान, कतर, नेपाल जैसे देशों की सद्भावना जाग उठी है। वीडियोज सामने आ रहे हैं कि इन देशों से अनजान व्यक्ति जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारियों के लिए फूड डिलीवरी ऐप से महँगा खाना भेज रहे हैं।वहीं नेपाल के युवा लगातार वीडियो बनाकर भारत के युवाओं को ‘नेपाल जैसा कारनामा’ करने के लिए भड़का रहे हैं।
क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) से जुड़े लोग यहां “जय भीम, जय भीम” के नारे लगाते नजर आए हैं। अब आप स्वयं ही विचार करें, इस नारे का इस आन्दोलन में क्या काम है! नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन (एनएफआईडब्ल्यू), जिसने नई दिल्ली में जंतर-मंतर के पास परिसीमन और जनगणना प्रक्रियाओं से कोटा को अलग करके संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने की मांग रखी है, सोचने वाली बात है कि यहां इस तरह की मांग का क्या औचित्य है?
कांग्रेस सेवा दल के स्वयंसेवक एनआईएफडब्ल्यू के सदस्य यहां बड़ी संख्या में मौजूद हैं। इस्लामवादियों और बुर्का पहने महिलाओं की उपस्थिति भी सहज देखी जा सकती है, जब उनसे NEET विरोध प्रदर्शन के बारे में पूछा जा रहा था तो वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहीं थी। किसान नेता गुरनाम सिंह चरुनी के नेतृत्व वाली भारतीय किसान यूनियन (चरुनी गुट) और उनके समर्थक यहां मौजूद हैं। यह बात समझ से परे है कि किसानों का कोई संगठन छात्रों के अधिकारों के लिए विरोध प्रदर्शन करने क्यों आया है?
निहंग तलवारें लहराते हुए पुलिसकर्मियों को धमका रहे हैं। ये निहंग पंजाब में हुए पेपर लीक के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं और दिल्ली तक का सफर तय कर विरोध प्रदर्शन करने आए हैं! जंतर-मंतर पर, सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने महिला पत्रकारों के साथ छेड़छाड़ की और पुरुष पत्रकारों को पीटना आखिर क्या दर्शा रहा है? ऐसे में साफ नजर आता है कि जंतर-मंतर पर चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध प्रदर्शन छात्रों की चिंताओं को उठाने और उनके हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से बिल्कुल भी नहीं किया जा रहा है। पूरा विपक्ष यहां मौजूद है, सिर्फ मुखौटा छात्रों का लगा लिया गया है।
पिछले पांच दिन आम आदमी के लिए मुश्किल भरे रहे हैं, क्योंकि कई मेट्रो स्टेशन बंद हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह देश के आम व्यक्ति के टैक्स से खड़ी की गई हैं, इसलिए यहां सभी राजनीतिक दलों की भूमिका भी विचारणीय है। सत्ता का विरोध करने का अर्थ यह नहीं हो सकता है कि आप विरोध के लिए किसी भी सीमा तक चलें जाएं।
सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन यदि किसी छात्र आंदोलन का केंद्र शिक्षा सुधार से हटकर केवल सत्ता परिवर्तन की राजनीति बन जाए, तो इसे मूल मुद्दे को पीछे छोड़ देना कहते हैं। शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता, प्रश्नपत्र सुरक्षा, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई जैसे विषय ही ऐसे आंदोलन के केंद्र में रहने चाहिए, जोकि फिलहाल इस पूरे आन्दोलन से गायब हैं!
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े आंदोलन में समाज को जोड़ने वाले संदेश अधिक होने चाहिए या समाज को विभाजित करने वाले? यदि किसी भी मंच पर धर्म, जाति या समुदाय विशेष के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग हो रहा है, तो इसे क्या माना जाए ? निश्चित ही इससे आंदोलन का नैतिक आधार कमजोर हुआ है। शिक्षा सुधार की लड़ाई को किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक, जातीय या वैचारिक वैमनस्य में बदलना छात्रों के हित में नहीं माना जा सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि छात्र आंदोलन अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटे। यदि उसकी प्राथमिकता निष्पक्ष परीक्षा, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों में सुधार, प्रश्नपत्र लीक पर कठोर दंड और छात्रों के भविष्य की सुरक्षा है, तो उसे व्यापक सामाजिक समर्थन मिलेगा ही, किंतु यदि आंदोलन का प्रमुख संदेश राजनीतिक ध्रुवीकरण, असंबंधित मुद्दों या भड़काऊ नारों से जुड़ना होगा तो स्वभाविक है संदेश देशभर में बिल्कुल भी सही नहीं जाएगा, जोकि अब यहां दिखाई भी दे रहा है।
वस्तुत: लोकतंत्र में सशक्त छात्र आंदोलन किसी भी राष्ट्र की शक्ति होते हैं। वे व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी बनाते हैं और सुधार का मार्ग प्रशस्त करते हैं, किंतु उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनका नैतिक अनुशासन, स्पष्ट उद्देश्य और तथ्याधारित संघर्ष होता है, इसलिए किसी भी छात्र आंदोलन की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसने कितने राजनीतिक नारे लगाए, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि उसने शिक्षा व्यवस्था को कितना अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाया।
ध्यान रहे- यदि आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटकता है, तो इतिहास उसे शिक्षा सुधार के आंदोलन के रूप में याद नहीं रखता, वह इतिहास में एक ऐसे आंदोलन के रूप में दर्ज हो जाता है, जिसने छात्रों के वास्तविक प्रश्नों को व्यापक राजनीतिक संघर्ष के शोर में कहीं पीछे छोड़ दिया। निश्चित ही वह इस भूमिका में एक अपराध की श्रेणी में ही याद किया जाता है।



