कांग्रेस को असली वफादारी अब कार्यकर्ताओं से नहीं, पत्रकारों से मिल रही है

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दिल्ली। रामलीला मैदान की रैली में भीड़ जुटाने की उठापटक इतनी बढ़ गई कि जो कार्यकर्ता नहीं पहुंचे, उन्हें सीधा सस्पेंड कर दिया गया। यूथ कांग्रेस के 60 कार्यकर्ताओं को चिट्ठी जारी कर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। यह पहली बार है जब कांग्रेस ने रैली में अनुपस्थिति को इतना बड़ा अपराध मान लिया। संदेश साफ है-आओ, भीड़ बनो, वरना बाहर का रास्ता पकड़ो।

इसी बीच पत्रकारों के लिए 1200 पास बनाए गए। साक्षी जोशी जैसी पत्रकार एक-दो दिन पहले ही पार्टी ऑफिस की लाइन में खड़ी होकर पास ले आईं। डर था कि कहीं छूट न जाएं। कांग्रेस प्रवक्ता बनकर साक्षी खुद फ्रंट फुट पर आकर कांग्रेस का बचाव करती दिखाई दी। कथित तौर पर 1200 पास बांटने के बावजूद रामलीला मैदान के बाहर पत्रकारों की कतार लग रही थी। मुख्यधारा मीडिया के पत्रकार जो कवर करने पहुंचे, उन्हें पत्रकार मानने में भी कांग्रेस हिचकिचा रही थी। दूसरी तरफ साक्षी जोशी जैसे कथित तौर पर 1200 कांग्रेसी पत्रकार मंच के आस पास पूरी चुस्ती से खड़े थे, जबकि कार्यकर्ता नदारद थे। इन बातों से निष्कर्ष यही निकलता है कि कांग्रेस को अपने कार्यकर्ताओं के लिए इतनी मेहनत करनी पड़ रही है, जबकि उसे पत्रकार कम मेहनत पर भी उपलब्ध हो जाते हैं।


स्थिति यह है कि आज अगर कोई कांग्रेस नेता प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का चुनाव लड़े तो प्रेसिडेंट बनना आसान लग सकता है। मीडिया के एक बड़े हिस्से में कांग्रेस की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी है कि कार्यकर्ता से ज्यादा पत्रकार पार्टी के प्रति समर्पित नजर आ रहे हैं।

यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता पहले से ही नाराज हैं। मंच पर भाषण आईसा की नेहा वोरा का होता है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल की नजर में एनएसयूआई के नेता स्टूडेंट लीडर नहीं हैं। उनकी पसंद युवा लीडर के रूप में नेहा हैं। कांग्रेस को यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता सिर्फ भीड़ खड़ी करने के लिए चाहिए। भाषण देने, फोटो खिंचवाने और मंच सजाने का काम बाहर के लोगों के पास चला गया है। अंदर से कार्यकर्ता कह रहे हैं कि उन्हें सिर्फ संख्या भरने का काम सौंपा जा रहा है, नेतृत्व नहीं।

कांग्रेस एक नया उदाहरण स्थापित करना चाहती है-रैली में आना अनिवार्य होगा, वरना बाहर का रास्ता। लेकिन सवाल यह है कि जब पत्रकार खुद लाइन लगाकर पास लेने को तैयार हैं और कार्यकर्ता सस्पेंशन की धमकी पर भी नहीं आ रहे, तो पार्टी की असली ताकत कहां खड़ी है? भीड़ जुटाने की मजबूरी और मीडिया की सहज उपलब्धता के बीच कांग्रेस का यह नया समीकरण कितना टिकाऊ होगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

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