राजद सांसद सुधाकर सिंह द्वारा बिहार STF के DG कुंदन कृष्णन पर अवैध संपत्ति अर्जित करने का आरोप

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आरा (बिहार): यह विवाद भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को हुई भरत भूषण तिवारी (मानसिक रूप से अस्वस्थ सामाजिक कार्यकर्ता) की कथित फर्जी एनकाउंटर से जुड़ा है। उस समय कुंदन कृष्णन (1994 बैच IPS, वर्तमान में DG Operations और STF प्रमुख) STF के प्रभारी थे। सुधाकर सिंह (बक्सर से RJD सांसद) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयानों में STF नेतृत्व पर सवाल उठाए थे।

इसके जवाब में कुंदन कृष्णन ने 6 अक्टूबर 2026 को अपने अधिवक्ता के माध्यम से 5 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा था। इसमें सार्वजनिक माफी और आरोपों को वापस लेने की मांग की गई थी, अन्यथा सिविल और आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर करने की चेतावनी दी गई। सुधाकर सिंह ने माफी देने से इनकार किया और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, लोकसभा अध्यक्ष तथा अन्य प्राधिकारियों को पत्र लिखकर नोटिस की वैधता (सरकारी अनुमति के अभाव) और मामले की जांच की मांग की। मुख्यमंत्री ने गृह विभाग को जांच का आदेश दिया था।

3 नवंबर 2026 को सुधाकर सिंह ने पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संपत्ति संबंधी गंभीर आरोप लगाए और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, UPSC, CVC, DoPT तथा लोकायुक्त को दस्तावेजों के साथ पत्र भेजे। उन्होंने स्वतंत्र जांच (EOU/SVU या केंद्रीय एजेंसी) की मांग की।

सुधाकर सिंह के मुख्य आरोप

सुधाकर सिंह ने वार्षिक संपत्ति विवरण (IPR), बिहार भूमि पोर्टल और अन्य दस्तावेजों के आधार पर दावा किया कि:कुंदन कृष्णन और परिवार की अचल संपत्ति का मूल्य लगभग 185 करोड़ रुपये है। सेवाकालीन वेतन लगभग 5 करोड़ रुपये और पैतृक संपत्ति लगभग 30-38 करोड़ रुपये घटाकर लगभग 150 करोड़ रुपये की अवैध/बेनामी संपत्ति का आरोप। कुछ रिपोर्टों में घोषित संपत्ति (पैतृक को छोड़कर) लगभग 87 करोड़ रुपये बताई गई।

घोषित मूल्य और वास्तविक बाजार मूल्य में बड़ा अंतर (जैसे नालंदा के बिंद/दरियापुर की कृषि भूमि, पटना नाला रोड का मकान, गुरुग्राम का फ्लैट आदि)।
कई जमीनों का उल्लेख IPR में नहीं या कम मूल्य पर (जैसे पटना ट्रांसपोर्ट नगर में 14.06 डिसमिल जमीन – सरकारी मूल्य ~91 लाख, बाजार मूल्य ~7 करोड़; नालंदा बिंद में अतिरिक्त जमीन; कैमूर भगवानपुर में ~16 एकड़ 88 डिसमिल जमीन)।

पत्नी डॉ. मल्लिका सिंह के नाम पर पटना (बैरिया, सिमली मुरारपुर आदि) में करोड़ों की जमीन। कुछ जमीनें भारती इंफ्राटेल को लीज पर दी गईं।
रितेश रंजन सिंह उर्फ बिट्टू सिंह (जन सुराज से जुड़े) के साथ जमीन के लेन-देन/आसन्न प्लॉट खरीदने का आरोप। बिट्टू सिंह के नाम पर ~175-200 करोड़ की संपत्ति का दावा (पटना में कथित 130 कट्ठा आदि)।
नकदी, सोना, हीरा और रत्नों में ~8 करोड़ (पति-पत्नी दोनों)।
धनौत की जमीन बिक्री का दावा IPR में लेकिन भूमि पोर्टल पर नाम बरकरार; भूमि सीलिंग कानून का उल्लंघन की आशंका।
मांग: सभी चल-अचल संपत्तियों का स्वतंत्र मूल्यांकन, IPR और भूमि पोर्टल का मिलान, रजिस्ट्री/जमाबंदी/भुगतान स्रोत की जांच, बेनामी संपत्ति के वास्तविक लाभार्थियों की पहचान।

सुधाकर सिंह ने कहा कि यह व्यक्तिगत या राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि जवाबदेही का मामला है। उन्होंने नोटिस से न डरने और दस्तावेजों का हिसाब मांगने की बात कही। कुछ रिपोर्टों में उन्होंने कहा कि यह केवल 20% खुलासा है।

कुंदन कृष्णन की प्रतिक्रिया

ETV Bharat से बातचीत में कुंदन कृष्णन ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि सब कुछ पारदर्शी है। उन्होंने आरोपों को एकतरफा और निराधार बताया।

मुख्य बिंदु:

32 वर्षों से सेवा में हैं और नियमित रूप से संपत्ति विवरण सरकार को जमा करते रहे हैं। पूर्ण पारदर्शिता है।
सुधाकर सिंह ने आय के विभिन्न स्रोतों और बैंकों से लिए गए ऋणों पर ध्यान नहीं दिया।
पैतृक संपत्ति से पर्याप्त मासिक आय है। पत्नी डॉ. मल्लिका सिंह बिहार सरकार की डॉक्टर हैं, उनकी अपनी आय और माता-पिता से प्राप्त संपत्ति है।
पैतृक जमीन का एक प्लॉट 2012 में बेचा था (पिता लंदन से लौटे थे) और उस पैसे से गुरुग्राम का फ्लैट खरीदा।
कैमूर की जमीन पिछड़े इलाके में है, इस साल दो पार्सल (प्रत्येक 8 कट्ठा) में खरीदी गई, इसलिए पिछली IPR में नहीं दिख रही।
उन्होंने कहा कि सांसद CA नहीं हैं और जो मन में आता है कह रहे हैं, जो मानहानिकारक है।

कुछ अन्य रिपोर्टों में कहा गया कि उन्होंने संपत्ति आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया देने से इनकार किया या चुप्पी साधी। नोटिस संबंधी मामले में उन्होंने कहा था कि गृह विभाग से अनुमति की जरूरत नहीं है और सिविल सूट करेंगे।

आरोप एकतरफा दस्तावेजी दावों पर आधारित हैं। अभी तक कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा पुष्टि या खंडन नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री द्वारा पहले नोटिस संबंधी शिकायत पर गृह विभाग को जांच का आदेश दिया गया था। सुधाकर सिंह ने लोकायुक्त नियुक्ति और उच्च न्यायालय में याचिका की बात कही है। दोनों पक्षों की बातों को बिना पूर्वाग्रह के देखा जाना चाहिए और कानूनी/प्रशासनिक प्रक्रिया का इंतजार करना उचित है।

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