नेहा बोरा का सेलेक्टिव एक्टिविज्म

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सन्त समीर

दिल्ली। नेहा बोरा के एक-एक लक्षण धीरे-धीरे बाहर आ रहे हैं। उनके चाहने वाले उनके आप्तवचन सुनते ही होंगे, इसलिए उनका परसों-नरसों का वीडियो ठीक से सुनने की अपील करने की ज़रूरत नहीं है। बात इतनी-सी है कि नेहा जी ने कहा—“ब्राह्मण महिलाएँ अनसेफ़ हैं, उनका रेप होता है। मन्दिरों में पुजारी रेप करते हैं। उन्नाव में, कठुआ में ये हमने देखा है।” ये हूबहू इन मोहतरमा के वाक्य हैं। उनके इतना बोलते ही एक पत्रकार ने पूछा कि दूसरी जगहों पर भी तो रेप होते हैं, वे क्या हैं… तो नेहा बोरा ने कुछ खिसियानी हँसी के साथ कहा—“जाइए… क्या है दोस्त!…”
मतलब कि ये जाहिला देवी नफ़रत में आकण्ठ ऐसी डूबी हैं कि कठुआ और उन्नाव ही पूरे हिन्दू समाज का चेहरा लग रहे हैं। अपराधी रेप करें, तो भी हर कहीं छवि पुजारी की दिखाई देती है। यह वही एजेण्डा है, जिसके तहत हिन्दुओं की चुप्पी और ‘छोड़ो भी, जाने दो’ की प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाकर आज़ादी के बाद से ही फ़िल्मों में मन्दिर के पुजारियों को बलात्कारी और आतङ्कवादियों को समाज का सताया हुआ दिखा-दिखाकर माहौल बनाया जाता रहा। अपराधी पुजारी के वेश में भी हो सकता है और मौलवी या वाइज़ के भी। यदि पुजारी या मौलवी बनने के बाद अधिकतर लोग बलात्कार में लिप्त हो जाते हों, तभी पुजारियों या मौलवियों की पूरी जमात पर बलात्कारी होने का ठप्पा लगाया जा सकता है; अन्यथा जो ऐसे आरोप लगाता है, वह मानसिक रूप से बीमार है, दुराग्रह से भरा हुआ है और किसी स्वार्थी एजेण्डे के तहत काम कर रहा है।

नेहा बोरा को कठुआ और उन्नाव की दो घटनाएँ पर्याप्त लगीं, पर उसी कठुआ में सन् 2018 के बाद से सौ से ज़्यादा बलात्कार की घटनाएँ हुई हैं। क्या सब मन्दिरों में हुईं और क्या सारे बलात्कारी पुजारी थे? उन्नाव में 2017 में भाजपा विधायक सेङ्गर पर बलात्कार का आरोप था। प्रश्न है कि क्या वह पुजारी था… अथवा भाजपा का था, केवल इसलिए एजेण्डे के हिसाब से उसे आज भी निशाने पर लेना आसान है? जिन काँग्रेसियों के आगे करने के चलते वे बोल रही थीं, क्या उन काँग्रेसी नेताओं का इतिहास देखने की ज़रूरत नहीं थी? सिङ्घवी का दफ़्तरी कारनामा याद कर लेतीं! घिनौनी घटनाओं को छोड़ ही दीजिए, केवल हम सबके सभ्य नेता नारायणदत्त तिवारी का स्वीमिङ्ग पूल वाला मनोरम दृश्य ही याद कर लेतीं।

जिस उन्नाव की बात नेहा जी ने की, उसी उन्नाव में उस घटना के बाद से अब तक लगभग चार सौ बलात्कार की घटनाएँ हो चुकी हैं, लेकिन क्या नेहा जी को उन सबका जुगराफ़िया नहीं समझ में आता? क्या देश में सारी बलात्कार की घटनाएँ हिन्दू लोग कर रहे हैं? मदरसों और मस्ज़िदों के वाक़यों के समय क्या इन एजेण्डाधारियों को दिनौंधी हो जाती है? ऐसे लोगों को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद, कानपुर, बलरामपुर, ग़ाज़ीपुर के मदरसों में हुए बलात्कार के मामले क्या महिलाओं की इज़्ज़त बढ़ाने वाले दिखाई देते हैं? राजस्थान, बिहार और असम में जो घटनाएँ हुईं, क्या उनमें मौलवियों द्वारा किया गया बलात्कार लड़कियों की आरती उतारने जैसा महान् काम था? तुलना करेंगे तो अनुपात हर एजेण्डे पर भारी पड़ेगा। जो भी हों, मैं मानता हूँ कि मौलवी हों या पुजारी, कुछेक घटनाओं के आधार पर इन सबको बलात्कारी घोषित कर देना ग़ैरज़िम्मेदाराना व्यवहार है।

जो लोग नफ़रत के वशीभूत ऐसे बेहूदा आरोप लगाते हैं, उन्हें पहले अपने कुनबे की असलियत देख लेनी चाहिए। एक प्रमाण देता हूँ। अदम गोण्डवी को हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति जानता ही होगा। “काजू भुने प्लेट में ह्विस्की गिलास में/रामराज उतरा है विधायक निवास में”—जैसे उनके लिखे न जाने कितने शेर कैसे नारे बन गए, यह भी बताने की ज़रूरत नहीं है। अदम जी धुर मार्क्सवादी थे, लेकिन हर वर्ग का व्यक्ति उनकी इज़्ज़त करता था। अद्भुत ईमानदारी थी उनमें। किसी तरह का एजेण्डा चलाने में विश्वास नहीं करते थे। अपनी ईमानदारी के चलते ही उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम साक्षात्कार में वह बात कही, जिसमें ये तथाकथित क्रान्तिकारी अपना चेहरा देख सकते हैं। मेरा सौभाग्य है कि अदम जी दिल्ली आए तो उन्होंने मुझसे मिलने की इच्छा जताई और मेरे पास सन्देश भेजा। उनके भतीजे दिलीप गोण्डवी उन्हें लेकर कनॉट प्लेस वाले हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ़्तर में मेरे पास आए। उनकी सेहत ख़राब चल रही थी, पर मेरे अनुरोध को उन्होंने टाला नहीं और धीरे-धीरे बात करते हुए सही, साक्षात्कार वाली अपनी बतकही पूरी की। उन्होंने बिना लाग-लपेट प्रगतिशील आन्दोलन पर टिप्पणी की—“हमने क्रान्ति के नाम पर बस इतना किया कि आपस में अपनी बीवियाँ बदल लीं।” साक्षात्कार छपने के बाद जो चर्चा चली, उसके बारे में तो ख़ैर क्या बताना!

वैसे, नेहा बोरा को अभी अपने गरेबाँ में झाँकने की ज़रूरत नहीं है। यदि ऐसे ही वे बाँग्लादेश वग़ैरह से प्रेरणा ग्रहण करती रहीं और उनके मुँह से इसी तरह के ग़ैरज़िम्मेदाराना आप्तवचन निकलते रहे, तो ज़्यादा नहीं, बस पाँच-सात साल में इतना अनुभव हो जाएगा कि वे यह करने लायक़ हो जाएँगी। ऐसी कुछ क्रान्तिकारी लड़कियों के उदाहरण दिए जा सकते हैं, पर हमारे जैसे लोग बस इतनी ही कामना कर सकते हैं कि परमात्मा नेहा बोरा जैसों की ऊर्जा को बेहतर दिशा दें।

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