रामेश्वर मिश्र पंकज
दिल्ली। वामपंथ और दक्षिण पंथ शब्द फ्रांस की राज्य क्रांति के बाद फ्रांस में उभरा। राजा के आसन के दाहिनी ओर जागीरदार बैठते थे। वे दक्षिण पंथी कहे गए। बाई ओर विद्रोहियों के नेताओ को बैठने का अवसर प्रदान किया गया पहली बार। उसके पहले उधर भी जागीरदार ही बैठते थे। तो उन विद्रोहियों को वामपंथी कहा गया। फिर ईसाई यूरोप में यही पदावली चल पड़ी। भारत में मूर्ख उसे ही दोहराते हैं। कम्युनिस्ट्स को भी कम्यूनिस्ट या हत्यारों के झुण्ड ही लिखना चाहिए। वामपंथी नहीं।
यह बात मैने पाञ्चजन्य में 1980, के दशक में भी लिखी थी। तरूण जी तब संपादक थे। सन मुझे याद नहीं। हत्यारों के झुण्ड न लिख सकें तो कम्युनिस्ट लिखें। वह भी सही शब्द है। समस्त यूरोप कम्युनिज्म से घृणा करता है। परंतु वामपंथ या लेफ्ट शब्द वहां सम्मानित है। क्योंकि सिस्टम की जकड़न भयानक है और विद्रोही होने को नैतिक साहस वाला मान लिया जाता है। अतः कम्युनिस्टों को कभी लेफ्टिस्ट या वामपंथी नहीं कहें। वे इसे यूरोप अमेरिका में भुनाते है। यह बात मैं social media में भी चार पांच बार लिख चुका हूँ पर अपने लोगों ने ध्यान नहीं दिया। स्वयं को दक्षिणपंथी कहना खुद को गाली देना है। सनातनी ही सही शब्द है। या फिर राष्ट्रभक्त कहे। राष्ट्रवादी भी नहीं कहें क्योंकि वह भी यूरोपीय पद रहा था और वहां अब उसे अच्छा नहीं मानते जर्मनी आदि के राष्ट्रवाद के कारण। राष्ट्र भक्त पवित्र पद है। सनातनी तो शाश्वत और सर्वोत्तम है ही।



