मीडिया स्कैन डेस्क
दिल्ली। भाजपा की सोशल मीडिया लड़ाई क्यों ठेके और बजट के बीच अटक गई है?
एक समय था जब सोशल मीडिया पर मोदी समर्थकों की कतारें खत्म होने का नाम नहीं लेती थीं। हर मुद्दे पर लंबी श्रृंखलाएँ बनती थीं, जवाब मिलता था, और विपक्ष के तर्क अक्सर उसी भीड़ में दब जाते थे। आज वही मंच अलग तस्वीर दिखा रहा है। कई पुराने समर्थक लिखना छोड़ चुके हैं। कुछ खुले विरोध में उतर आए हैं। यह बदलाव बाहरी आलोचकों की तरह हल्का नहीं है। यह भीतर से आ रहा है, इसलिए इसकी कीमत ज्यादा है।
भीतर से आई आलोचना बाहरी शोर से अलग क्यों है
अशुतोष गुप्ता, उर्मिलेश यादव या योगेंद्र यादव जैसी आवाज़ें लंबे समय से एक खास ढाँचे में काम करती रही हैं। उनके तर्क पूर्वानुमेय होते हैं। पाठक अक्सर पहले से जानता है कि निष्कर्ष कहाँ पहुँचेगा। भीतर से निकली आलोचना इस पूर्वानुमेयता को तोड़ती है। जो व्यक्ति वर्षों तक सरकार के पक्ष में तर्क गढ़ता रहा हो, वही जब चुप्पी साध ले या उलटा लिखने लगे, तो उसके शब्दों का वजन अलग होता है। पाठक इसे ‘विरोधी प्रचार’ नहीं, ‘निराशा’ मानता है।
यह निराशा अचानक नहीं जन्मी। कई कार्यकर्ता और छोटे इन्फ्लुएंसर कहते हैं कि उन्हें पहचान नहीं मिली। बड़ी कंपनियों को ठेका मिला, बजट मिला, और वायरल कंटेंट का लक्ष्य मिला। जमीन पर जो लोग मुद्दा समझकर लिख रहे थे, वे अक्सर बिना संसाधन के रह गए। जब लंबे समय तक समर्थन का कोई ठोस प्रतिफल नहीं दिखता, तो लोग या तो चुप हो जाते हैं या दूसरा रास्ता चुन लेते हैं। हाल ही में एक कट्टर समर्थक रहे इन्फ्लुएंसर का मामला इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। लंबे समय तक पक्ष में बोलने के बाद जब पहचान नहीं मिली, तो विपक्ष से पैसा लेकर एक ट्वीट कर दिया गया। यह एक व्यक्ति की कमजोरी भी हो सकती है, लेकिन यह व्यवस्था की चेतावनी भी है। वफादारी अगर केवल भावना पर टिकी रहे और संस्थागत सहयोग न मिले, तो वह टिकती नहीं।
ठेके पर चलता आईटी सेल और वायरल का जाल
भाजपा का सोशल मीडिया संचालन अब काफी हद तक ठेके के मॉडल पर टिका दिखता है। बड़ी कंपनियाँ शामिल होती हैं। उनका काम स्पष्ट है: ऐसा कंटेंट बनाओ जो वायरल हो। क्लिक, शेयर और ट्रेंडिंग उनका मापदंड है। वोटर के मन पर स्थायी असर, स्थानीय मुद्दे की बारीकी, या कार्यकर्ता की भाषा उनकी प्राथमिकता नहीं होती। उन्हें जमीनी आंदोलन की जानकारी भी सीमित रहती है, क्योंकि उनका संबंध पार्टी की विचारधारा से नहीं, अनुबंध से होता है।
इस मॉडल की सीमा यहीं है। जो आज पैसे के लिए एक पक्ष का प्रचार कर रहा है, कल दूसरे पक्ष के लिए भी कर सकता है। प्रशांत किशोर जैसे उदाहरण राजनीतिक परामर्श के क्षेत्र में यह लचीलापन पहले ही दिखा चुके हैं। ठेकेदार की निष्ठा अनुबंध की अवधि तक होती है। पार्टी की लंबी लड़ाई के लिए यह पर्याप्त नहीं। वायरल कंटेंट एक दिन ट्रेंड बनाता है, अगले दिन भुला दिया जाता है। मतदाता का निर्णय अक्सर उन छोटे, बार-बार दोहराए गए तर्कों से बनता है जो स्थानीय भाषा, स्थानीय शिकायत और स्थानीय चेहरे से जुड़ते हैं। ठेके की मशीन यह काम उतनी गहराई से नहीं कर पाती।
नई टीम बनी, बजट नहीं मिला: लड़ाई कैसे लड़ी जाए
पार्टी ने सोशल मीडिया और मीडिया के लिए नई टीमें बनाईं। इरादा सही था। अंदर के लोगों को जिम्मेदारी दी गई, ताकि बाहरी ठेके पर निर्भरता घटे। लेकिन योजना को अमल में लाने के लिए पर्याप्त बजट नहीं दिया गया। बिना पैसे के वीडियो, रिसर्च, ग्राफिक्स, स्थानीय भाषा के कंटेंट और लगातार कैंपेन नहीं चल सकते। नतीजा सस्ते क्वालिटी के वीडियो हैं। अच्छा कांसेप्ट भी खराब प्रस्तुति में अपनी धार खो देता है। दर्शक तीन सेकंड में स्क्रॉल कर जाता है। विपक्ष का अपेक्षाकृत बेहतर पैकेज्ड कंटेंट उसी क्षण में आगे निकल जाता है।
जिनके पास बजट है, यानी सरकार से भुगतान लेकर मीडिया और सोशल मीडिया संभालने वाली बड़ी कंपनियाँ, उनके पास अक्सर विजन की कमी दिखती है। वे संदेश को उत्पाद की तरह बेचती हैं, आंदोलन की तरह नहीं। सरकार को यह फर्क समझना होगा। पैसा लगाने से ही काम नहीं चलता। दिशा भी चाहिए। नई टीमों को अगर बजट नहीं मिलेगा, तो वे कागज पर बनी रणनीति बनकर रह जाएँगी। लड़ाई मैदान में लड़ी जाती है, फाइलों में नहीं।
कांग्रेस के मुकाबले पिछड़ता मोर्चा
अभी भी कई मुद्दों पर भाजपा का सोशल मीडिया कांग्रेस के सामने टिक नहीं पा रहा। यह स्वीकार करना कमजोरी नहीं, यथार्थ है। विपक्ष ने छोटे-छोटे क्रिएटर्स, व्यंग्य, और तेज प्रतिक्रिया की श्रृंखला बनाई है। भाजपा की ओर से जवाब अक्सर देर से, भारी-भरकम और ऊपर से थोपा हुआ लगता है। जब आंतरिक टीम के पास संसाधन नहीं और बाहरी कंपनी के पास जमीनी समझ नहीं, तो यह अंतर स्वाभाविक है।
इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। सोशल मीडिया अब केवल प्रचार का मंच नहीं रहा। यह जनता की पहली प्रतिक्रिया का स्थान है। यहाँ हारी हुई धारणा बाद में रैली और बूथ तक पहुँचती है। अगर डिजिटल मोर्चे पर लगातार पीछे रहना जारी रहा, तो मैदानी संगठन पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
धुरंधरों को पहचानो, प्रतिस्पर्धा मत बढ़ाओ
पार्टी के बीच कई लोग हैं जो मुद्दा समझते हैं, भाषा जानते हैं और वर्षों से बिना ठेके के लिखते रहे हैं। उन्हें सामने लाने की जरूरत है। बड़ी कंपनियों को हायर करना गलत नहीं। पेशेवर क्षमता का उपयोग होना चाहिए। लेकिन जो लोग पक्ष में खड़े रहे, उनकी भी पहचान और हर तरह की मदद जरूरी है। केवल दो-तीन एंकरों तक मीडिया समर्थन को सीमित रखना खतरनाक है। जब मीडिया के साथी कहते हैं कि भाजपा पर भरोसा करके लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती, क्योंकि जरूरत पड़ने पर समर्थन नहीं मिलता, तो यह शिकायत सुनी जानी चाहिए।
आंतरिक प्रतिस्पर्धा यहाँ बाधा बनती है। एक विभाग दूसरे को श्रेय नहीं देना चाहता। ठेकेदार और आंतरिक टीम एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। जब तक यह हाथ नहीं पकड़ेंगे, संदेश बिखरेगा। आने वाले समय में चुनौतियां बढ़ेंगी। आर्थिक मुद्दे, स्थानीय असंतोष और विपक्ष की आक्रामक डिजिटल रणनीति एक साथ आएँगे। केवल वायरल वीडियो से यह मोर्चा नहीं संभलेगा।
लंबी लड़ाई ठेके के भरोसे नहीं टिकती
सोशल मीडिया की लड़ाई एक चुनाव का अभियान नहीं है। यह निरंतर कथा है। जिसके पास बजट है लेकिन विजन नहीं, और जिसके पास विजन है लेकिन बजट नहीं, दोनों अलग-अलग अधूरे हैं। नई बनी टीमों को योजना लागू करने लायक संसाधन दिए बिना उनसे परिणाम की उम्मीद रखना व्यावहारिक नहीं। साथ ही, पुराने समर्थकों को पहचान और सहयोग दिए बिना वफादारी की अपेक्षा भी अधूरी है।
बड़ी कंपनियां उपकरण हो सकती हैं, मालिक नहीं। असली धार उन लोगों से आती है जो विचार से जुड़े हों और जिन्हें संस्था पीछे खड़ी दिखे। दस साल पहले की भीड़ अपने आप नहीं बनी थी। उसे संदेश, निरंतरता और साथ खड़े होने का भरोसा मिला था। वही भरोसा आज फिर से बनाना होगा। नहीं तो ठेके पर चलता प्रचार एक दिन ट्रेंड बनाएगा, और अगले दिन समर्थक कहीं और लिखता मिलेगा। लड़ाई लंबी है। उसे केवल कंपनियों के भरोसे नहीं लड़ा जा सकता।



