गाजियाबाद: गाजियाबाद के अजय भाटी ने एक बच्ची को गोद लिया और उसके साथ दुष्कर्म किया। ऐसे बाप पर लानत भेजना चाहिए। अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। यह फैसला अपराध की गंभीरता को दिखाता है। लेकिन एक-दो भयानक घटनाओं से पूरे समाज को एक तराजू पर तौलना गलत है। इससे यह निष्कर्ष निकालना कि जो आदमी बेटी गोद लेता है, वह संदेह के घेरे में आ जाता है, पूरी तरह अनुचित है। ऐसे सोच वाले लोगों को अपनी सोच बदलनी चाहिए।
गोद लेना करुणा है, संदेह नहीं
गोद लेना करुणा, जिम्मेदारी और परिवार बनाने का फैसला होता है। देशभर में हजारों पिता अनाथ या असहाय बच्चियों को घर देते हैं, उन्हें पढ़ाते-लिखाते हैं, उनकी सुरक्षा का ख्याल रखते हैं और उन्हें अपनी संतान की तरह पालते हैं। ये संवेदनशील पिता होते हैं। एक अपराधी की हरकत से इन सभी पिताओं पर शक करना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि गोद लेने की प्रक्रिया को भी नुकसान पहुँचाता है। समाज में पहले से ही गोद लेने को लेकर कई सामाजिक और कानूनी जटिलताएँ हैं। यदि हर गोद लिए गए बच्चे के पिता को संदेह की नजर से देखा जाने लगे, तो कई परिवार इस नेक काम से पीछे हट सकते हैं। अपराध की निंदा होनी चाहिए, अपराधी को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन निर्दोष पिताओं को एक साथ खड़ा करके आरोपित नहीं किया जा सकता।
एक आरोपी से पूरी कांवड़ यात्रा को मत नापिए
इसी तरह कुछ पत्रकारों ने खोज निकाला कि बिहार के जमुई मामले का आरोपी कांवड़ लेकर जाता था। कितनी नीची सोच है ऐसी पत्रकारिता की, जो एक-दो घटनाओं को सामने रखकर कांवड़ ले जाने वाले हर व्यक्ति को संदेह के घेरे में डाल देती है। ऐसे ही कुछ लोग अजय भाटी का उदाहरण देकर हर उस बाप पर सवाल उठाते फिरेंगे जिसने बेटी गोद ली है। किसी एक अपराधी को कांवड़ यात्रा से जोड़कर लाखों श्रद्धालु यात्रियों का अपमान नहीं किया जा सकता। ये यात्री पूरी आस्था और अनुशासन के साथ यह यात्रा करते हैं। एक व्यक्ति का अपराध पूरी परंपरा या पूरे समुदाय का चरित्र नहीं बन जाता।
पत्रकारिता बड़ी जिम्मेदारी का काम है। पत्रकार हो या यूट्यूबर, हर शब्द संभालकर खर्च करना चाहिए। सनसनी फैलाने से पहले सोचना चाहिए कि कहीं निर्दोष लोगों की छवि तो नहीं बिगाड़ रहे। अपराध की खबर हो, सजा की खबर हो, लेकिन सामान्यीकरण से बचना चाहिए। समाज तभी मजबूत रहता है जब वह अपराधी को अलग करके देखे, पूरे समाज को अपराधी बनाकर नहीं।



