जब कवि ने कहा

2-18.jpeg

____________________________
दिल्ली। कस्तूरी द्वारा आयोजित साहित्यिक श्रृंखला “जब कवि ने कहा” के अंतर्गत 20 सितंबर 2026 को इंडियन इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में रचनाकार मनोज सिंह के ‘खंडकाव्य ’ चंद्रिकोत्सव पर पुस्तक–परिचर्चा का आयोजन किया गया।
पुस्तक परिचर्चा की शुरुआत डॉ. चैताली सिन्हा जी ने चंद्रिकोत्सव खंड काव्य के अंश का पाठ करके किया।
पुस्तक परिचर्चा के क्रम में मुख्य वक्ता के रूप में निशा नाग पुरोहित जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत सभी श्रोताओं के अभिवादन और अभिनंदन से की। उन्होंने आयोजकों को मंच पर आमंत्रित करने के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने विनम्रता से कहा कि वे कभी-कभी अपनी पद्धति से चलती हैं – “पीछे का पहले और पहले का बाद” और फिर वक्ता ने बताया कि उन्होंने मनोज जी की दो पुस्तकों को देखा है। पहली पुस्तक: मैं रामवंशी हूँ – जिसे उन्होंने भली-भाँति पढ़ा है। दूसरी पुस्तक: मैं आर्यपुत्र हूँ – जिसे वे अभी पढ़ने की ओर अग्रसर हैं। वक्ता ने पुस्तक आर्यपुत्र की गहनता पर प्रकाश डाला। और आर्यपुत्र में मनोज जी वेदों, पुराणों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों और अनेकानेक इतिहास ग्रंथों को भी खंगालते हैं, टटोलते हैं और बड़ी खूबसूरती से अपनी बात को रखते हैं। उनके अनुसार लेखक ने केवल कथा नहीं कही, बल्कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्रोतों का गहन अध्ययन कर तथ्यों को सुंदरता से प्रस्तुत किया है।
मुख्य अतिथि भारती गोरे जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत कार्यक्रम के सूत्रधार विशाल जी, उपस्थित बच्चों, छात्रों और सभी सुधीजनों का अभिवादन करते हुए की, उन्होंने बताया कि उन्होंने ‘चंद्रिकोत्सव’ को एक बार नहीं, बल्कि कई बार और अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ा है। यह पुस्तक एक बार पढ़कर समझने वाली नहीं है। संयोग की बात बताते हुए उन्होंने कहा कि जैसे अभी निशा जी को ‘कामायनी’ याद आ रही थी, वैसे ही उन्हें भी ‘चंद्रिकोत्सव’ पढ़ते हुए लगातार जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का स्मरण होता रहा। उन्होंने कहा कि ‘चंद्रिकोत्सव’ और ‘कामायनी’ के मार्गक्रमण और साधारणीकरण में गहरा साम्य है। इस साम्य को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने ‘कामायनी’ के कई उद्धरणों का उदाहरण दिये।
रचनाकार एवं साहित्यकार मनोज सिंह जी ने अपने वक्तव्य में सभी का आभार व्यक्त किया। वक्ता ने कहा कि अगर हम प्राचीन काल के साहित्यिक इतिहास को देखें तो इतिहास का प्रारंभ ही पद से होता है।
रामायण और महाभारत आज भी पद्य के रूप में ही गाई जाती हैं, पढ़ी नहीं जाती। वक्ता ने शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि-
मिस्र में पूजा स्थलों पर मिली प्राचीनतम रचनाएँ भी पद्य में हैं। मेसोपोटामिया और ईरान की आर्य परम्परा में भी आरंभिक रचनाएँ पद्य में ही मिलती हैं। यानी यह केवल भारतीय नहीं, वैश्विक सत्य है। वक्ता ने अपने अनुज विद्वान से हुई चर्चा का जिक्र करते हुए 8वीं शताब्दी के कश्मीर के महान राजा जयापीड का उदाहरण दिया।जयापीड कर्कोट वंश का इतना प्रतापी राजा था इतना बड़ा सम्राट होने के बावजूद उसे ‘कवि’ कहलाने पर गर्व था। उसके अभिलेखों में उसे कवि कहा गया है। वक्ता ने एक अनूठी रचना का जिक्र किया जिस पर वह अध्ययन कर रहे हैं – महाकवि दामोदर भट्ट कृत ‘कुट्टनीमतम्’। और अंत में वक्ता ने विनम्रता से कहा कि वह रोज़ पढ़ने का प्रयास करते हैं और विद्वानों के सामने बोलते हुए उन्हें स्वयं विश्वास नहीं हो रहा कि उन्होंने ऐसा गहन चिंतन किया है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रेरणा मल्होत्रा जी कहते हैं वक्ता ने सबसे पहले आयोजकों का आभार व्यक्त किया कि उन्हें इस कार्यक्रम में बुलाया गया। उन्होंने अपने से पूर्व बोलीं निशा जी, भारती जी और स्वयं रचनाकार को सुनने के बाद अपनी बात रखी। वक्ता ने कहा कि पुस्तक को पढ़ने से पहले उसे देखना होता है। इस पुस्तक को देखते ही – नीला रंग: समुद्र जैसा गंभीर, शांत, सहजता का प्रतीक। चांदनी की शीतलता, समुद्र पर चाँद की परछाई। पुस्तक पर प्रभात प्रकाशन का नाम देखकर वक्ता ने आश्चर्य व्यक्त किया। प्रभात प्रकाशन आमतौर पर कविता प्रकाशित नहीं करता, वह नॉन-फिक्शन और राष्ट्रवादी विषयों के लिए जाना जाता है। वक्ता ने कहा – “प्रभात ने किया तो कुछ विशेष होगा” – इससे पुस्तक के महत्व का अंदाजा लगता है। यह वक्तव्य केवल पुस्तक समीक्षा नहीं था, बल्कि पुस्तक के बाह्य सौंदर्य, रंगों के मनोविज्ञान और प्रकाशन परंपरा को तोड़कर कविता को स्थान देने के साहस की सराहना थी। वक्ता ने बहुत ही साहित्यिक और सहज भाषा में श्रोताओं को पुस्तक से जोड़ा।
इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार आलोचक, संपादक ,वक्ताओं और विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य एवं कला अध्येता विशाल पाण्डेय जी ने किया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन आदित्य नाथ तिवारी जी ने किया ।
परिचर्चा का समापन वंदे मातरम द्वारा किया गया।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top