दिल्ली । विट्ठल भाई पटेल भवन में डिप्टी स्पीकर हाल में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की 126वीं जयंती की पूर्व संध्या पर भारतीय जनसंघ की ओर से एक आयोजन हुआ ।
आयोजन की अध्यक्षता जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री भारत भूषण पांडे जी ने की।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्वान विचारक प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा:-
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक महान राष्ट्रभक्त और अद्वितीय प्रतिभा थे।
उनकी अन्य विशेषताओं की चर्चा पूर्व वक्ताओं ने की है।
यहां मैं एक मुख्य बात की चर्चा करना चाहता हूं ,कि वस्तुत: भारतीय जनसंघ की स्थापना की प्रेरणा और पहल
मुख्यतः डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की ही रही।
(पहले तो अंग्रेजों ने अपने व्यापार की रक्षा के लिए सिपाहियों की भर्ती के नाम पर एक रक्षक दल बनाया और बाद में उसे ही सेना कहने लगे।
जबकि स्वयं इंग्लैंड में कोई स्टैंडिंग आर्मी नहीं थी। प्रथम महायुद्ध के समय उन्होंने ताबड़तोड़ अपने सभी वयस्क नागरिकों की सेना में अनिवार्य भारती की थी क्योंकि उनके वहां कोई स्टैंडिंग आर्मी नहीं थी।
भारतीयों की उस सेवा के बल पर उन्होंने भारत में भारत के वीर राष्ट्रभक्तों क्रांतिकारियों का भयंकर दमन और संहार किया। परंतु उन्हें अंतत: भारतीय सेना की वीरता से ही घबराकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की वीरता से घबरा कर भारत छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा।
तब उन्होंने कांग्रेस की ठंडी धारा के अपने मित्र नेताओं जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाकर जाने का निर्णय किया। )
जवाहरलाल नेहरू जितना अंग्रेजों से प्रभावित थे ,उतना ही स्टालिन और लेनिन से प्रभावित थे और सोवियत संघ का आदर्श अपने सामने रखते थे।।
इसलिए उन्हें हिंदू समाज की स्वाभाविक शक्ति का उभरना अपने लिए बहुत खतरा दिखता था।
इस बीच विभाजन में गांधी जी की भूमिका से देश में क्षोभ था और गांधी जी के प्राणों पर संकट था।
यह खबर गुप्तचर विभाग को लग गई थी परंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने कोई आवश्यक सतर्कता नहीं बरती।
शायद उनके मन में था कि घटना को घट जाने दिया जाए और फिर हम इसका लाभ उठाएंगे ।
असल रहस्य क्या था यह तो अगर विस्तृत जांच हो तब पता चलेगा।
तो गांधी जी की हत्या हो गई और जवाहरलाल नेहरू ने या कांग्रेस पार्टी ने पहले से ही ऐसी कोई तैयारी कर रखी थी कि तत्काल ही महाराष्ट्र तथा अन्य स्थानों पर चितपावन ब्राह्मणों की हत्या और उनके घर जलाने का क्रम शुरू हो गया ।मध्य प्रदेश राज्य में भी काफी दमन हुआ और बिना किसी प्राथमिकी को दर्ज किए तथा बिना किसी साक्ष्य के हिंदू शक्तियों की दोनों धाराओं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा पर प्रतिबंध लगा दिया गया और वीर सावरकर तथा गुरु गोलवलकर जी को बंदी बना लिया गया।
वीर सावरकर में तो राजनीतिक प्रखरता और चेतना सदा ही थी परंतु गुरु जी गोलवलकर आध्यात्मिक झुकाव के थे और वह संपूर्ण राष्ट्र से यानी विशेष कर अपने संपूर्ण हिंदू समाज से अतिशय प्रेम करते थे इसलिए उन्हें यह बहुत ही आघात कारी लगा कि जिसे हम स्नेह करते हैं जिनको पूरी तरह अपना मानते हैं उन्होंने अकारण ,बिना किसी प्रमाण, बिना किसी साक्ष्य ,बिना किसी संभावना की जांच किए इस तरह से संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया और मुझे बंदी बना लिया ।
व्यापक लोकजागरण और आंदोलन से अंततः उन्हें गुरुजी को रिहा करना पड़ाम संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा।इसमें द्वारिका प्रसाद मिश्र सरदार पटेल और पंडित मौलिचंद्र शर्मा की विशेष भूमिका थी ।
रिहा होने के बाद उनसे देश के अनेक मनीषियों ने मंत्रणा की ।
डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही यह समझाया कि यह जो आधुनिक किस्म की पार्टियां हैं वह प्रतिस्पर्धी को सहन नहीं करती है और इनको यानी जवाहरलाल नेहरू जी को हिंदू शक्तियों से डर है इसलिए स्वयं हिंदू शक्तियों की भी प्रतिनिधि कोई एक पार्टी बनाना बहुत आवश्यक है।
इस प्रकार जनसंघ के निर्माण की मुख्य प्रेरणा और पहला तथा उसके पक्ष में तर्क सर्वप्रथम डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही दिए थे ।गुरु गोलवलकर जी को ये तर्क सही लगे और उन्होंने कहा कि ठीक है आप पार्टी बनायें ।
तो उन्होंने अपने कुछ स्वयंसेवक दिए अटल बिहारी वाजपेई, दीनदयाल उपाध्याय , बलराज मधोक और नानाजी देशमुख आदि को और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय पार्टी गठित हो गई ।इसमें शुरू में बहुत ही उच्च कोटि के विद्वानों और राष्ट्रभक्तों को शामिल किया गया। अटल जी ,डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव का काम करते थे ।इस प्रकार जनसंघ की स्थापना में निर्णायक भूमिका डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की है जो इतिहास ,राजनीति और सनातन धर्म के आधारों के बहुत बड़े ज्ञाता थे ।
इसीलिए जनसंघ का लक्ष्य अखंड भारत ,गोवंश की सम्पूर्ण रक्षा और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने तथा भारत के सभी समुदायों में राष्ट्रीय भावना का उन्मेष करना था ।
संस्कृति वस्तुतः धर्म के सिवाय और कुछ नहीं होती। धर्म ही संस्कृति है
जिसे अंग्रेजी में कल्चर कहते हैं वह तो बहुत मामूली चीज है ।वह छोटे-छोटे भेद के द्वारा अलग संस्कृति कहने लगते हैं। अलग कल्चर कहने लगते हैं।
लेकिन सनातन धर्म की संस्कृति संपूर्ण राष्ट्र की एक है ।इसलिए धर्म ही जनसंघ का प्रयोजन था ।धर्म की स्थापना और धर्म मय राज्य की स्थापना जनसंघ का मूल प्रयोजन था।
बाद में 1980 में उसके एक प्रमुख अंश ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। शेष लोग उससे अलग मूल जनसंघ चला रहे हैं।
इन दिनों विश्व की जैसे स्थिति है उसमें अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का राजनीति के स्वरूप निर्धारण में बहुत महत्व है।
तो पहले जो समाजवादी दौर था उसके कारण कांग्रेस और उसके विरोधी दल सभी समाजवाद की बात करते थे। समाजवाद समाजवाद चारों तरफ था।
सोवियत संघ का विघटन हो गया और समाजवाद दुनिया में बहुत ही भयंकर मतवाद के रूप में बदनाम हो चुका है क्योंकि उसने बहुत बर्बरता की है अतः अब समाजवाद का कांग्रेस का और अपने को समाजवादी कहने वाली किसी भी धारा का कोई भविष्य नहीं है ।
कांग्रेस लगातार बदलती रही है और राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने उसे ईसाई मिशनरियों की सेवक पार्टी बनाने की पहल की। राहुल वही लक्ष्य आगे बढ़ा रहे हैं।
मैं ने 2014 में ही आस्था चैनल पर अपने प्रसारण में भी कहा था और लेख में भी लिखा था कि भारतीय समाज बहुत परिपक्व समाज है और उसने धीरज से कांग्रेस को काफी अवसर दिए और जब कांग्रेस सोनिया गांधी के समय हिंदू विरोधी हो गई तो उसने उसे बदलने का निश्चय किया ।
नरेंद्र मोदी केवल किसी संगठन के बल पर नहीं आए हैं। वह देवताओं के आशीर्वाद और संत महात्माओं के आशीर्वाद तथा धर्म प्राण हिंदुओं की योजना से आए हैं ,इच्छा से आए हैं, प्रयास से आए हैं ।
हिंदुत्व का यह परिवेश कम से कम 50 वर्ष रहेगा और अगर हिंदू दलों ने अच्छा कार्य किया तो सदा के लिए भारत हिंदू राष्ट्र के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो जाएगा ।
भारतीय जनता पार्टी का विकल्प भी कोई हिंदू पार्टी ही बन सकेगी जो सनातन धर्म से प्रेरित हो ,जो भारत के मर्म को जानती हो और भारत के सत्व को आगे बढ़ाने वाली हो।
जनसंघ पहले से ही इसी के लिए गठित एक पार्टी है ।इसलिए जनसंघ के सामने अवसर ही अवसर है।
परंतु केवल विचारों से कोई पार्टी नहीं आगे बढ़ती ।पुरुषार्थ और तप करना होगा ।राजनीतिक पुरुषार्थ और लक्ष्य प्राप्ति के लिए तपस्या के द्वारा ही संगठन आगे बढ़ते हैं ।यदि अगले 10 वर्षों तक जनसंघ ने पुरुषार्थ और तप किया तो चहुं ओर विजय ही विजय है। भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में वह राष्ट्र को मान्य हो सकेगी।
पुरुषार्थ और तप करना आपके हाथ में है।
भारत माता की जय।



