श्रीराम जन्मभूमि दान में सेंध

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अवधेश कुमार

दिल्ली । श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के संदेहों के घेरे में आने से दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। लगभग 500 वर्षों के संघर्ष और हजारों बलिदान तथा स्वतंत्रता के बाद भी लंबे न्यायिक संघर्ष से श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति हुई, श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। अयोध्या में उमड़ती हुई श्रद्धालुओं की संख्या से हिंदू या सनातन समाज की आस्था समझी जा सकती है। वहां के चढ़ावे और चंदे में भी लोग से सेंधमारी कर रहे हैं तो यह हम सबके लिए डूब मरने की बात है। धर्म की दृष्टि से यह महापाप है। श्रद्धालु मंदिरों में इसलिए दान देना अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं और भावना यही रहती है कि इहलोक और परलोक दोनों जीवन अच्छे हो तथा किसी जन्म में हुये पाप या अपराध से क्षमा मिल जाए। हमारे धर्म में दान को महातप माना गया है। दान चोरी करने वाले के लिए तीनों लोकों में बुरी गति की बात है। वर्तमान जीवन में इस तरह की सेंधमारी करने वाले को कोई भी सजा कम होगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी गठित की, जिसकी प्राथमिक रिपोर्ट आ गई है, आगे भी जांच जारी है। प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है और पुलिस उसके आधार पर छानबीन कर रही है। गिरफ्तार आरोपियों व संदिग्धों से पूछताछ तथा ट्रस्ट एवं अन्य संबंधित व्यक्तियों से जानकारी भी ले रही है। विवेक का सामान्य तकाजा है कि हमें दोषियों या पापियों के संदर्भ में अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए कम से कम छानबीन की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करनी चाहिए। किंतु यह ऐसा संवेदनशील मामला है जिससे लोगों की भावनाएं जुड़ीं हैं तथा पूरी जानकारी बाहर न होने के कारण अलग-अलग तरह से अटकलें लग रहे हैं। राजनेताओं के राजनीतिक बयानों और मीडिया की लगातार कवरेज से कुछ ऐसा माहौल बन रहा है जिसमें सच तक पहुंचना लगभग असंभव है।

सच यह है कि श्रीराम जन्मभूमि चंदा चोरी मामले की वास्तविक जानकारी बयान देने वालों के पास बिल्कुल नहीं हो सकती। जितनी राशि बताई जा रही है पता नहीं उतना चंदा भी आया होगा कि नहीं। एक वरिष्ठ नेता का बयान है कि 20 हजार करोड़ से ज्यादा की चोरी हुई। क्या श्रीराम मंदिर में इतने दान आए? कोई कह रहा है कि हमने चांदी की फलां चीजें दीं और उसका आता – पता नहीं। यह जानकारी कहां से मिली कि उसका आता-पता नहीं है? क्या दान देने वाले को बार-बार बुलाकर दिखाया जाएगा कि आपने जो कुछ दिया था वह यहां रखा हुआ है? थोड़े शब्दों में कहे तो अतिवाद की सीमा को पार करने वाला वाले आरोप आ रहे हैं जिनका सच्चाई से लेना देना नहीं हो सकता। चूंकि चंपत राय ट्रस्ट के महासचिव हैं इसलिए राजनेताओं के सर्वाधिक निशाने पर वही हैं। गोपाल राव व अनिल मिश्रा दोनों संघ परिवार के संगठन से जुड़े रहे हैं इसलिए स्वाभाविक ही नेताओं के निशाने पर हैं। जिन नेताओं के पास स्वयं आय से अधिक संपत्ति दिखती है जो भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार होने के बावजूद पद से त्यागपत्र देने को तैयार नहीं थे उनकी शुचिता और ईमानदारी की बात कौन सुनेगा? जिनने मंदिर निर्माण के पहले विरोध को तो छोड़िए श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद जो दर्शन करने नहीं गए क्योंकि उन्हें लगता था कि मुस्लिम वोट बिखर जाएगा उनको श्रीराम मंदिर में शुचिता, ईमानदारी और नैतिकता की चिंता हो जाए इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है। इसलिए इनके वक्तव्यों पर जाने की आवश्यकता नहीं। इसमें भी दो राय नहीं कि चंदा का एक-एक पैसा सुरक्षित रहे इसके लिए जिस तरह की निगरानी होनी चाहिए उसमें कमी रही तभी यह संभव हुआ। आप किसी तरह की व्यवस्था कर लीजिए लालची मनुष्य उनमें से भी कोई न कोई खांच निकाल कर पाप और अपराध करते ही है। श्रीराम जन्मभूमि को महत्व मिलने के कारण उससे किसी तरह जुड़े ऐसे लोग जिनको समाज थोड़ा बहुत जानता है उनका सम्मान बढ़ा है। सामान्यत: प्रशासन भी ऐसे लोगों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करता है। इन दुष्टों ने इन सबका लाभ उठाया और महापाप किया। इनमें से कई की संपत्तियों और रहन-सहन के संबंध में आईं जानकारियां इसके प्रमाण हैं।

किंतु इसके लिए हम संघ, पूरे ट्रस्ट , मंदिर प्रबंधन प्रदेश और केंद्र सरकार सबको अपराधी नहीं मान सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ तो दान की राशि की देखरेख करने नहीं जा सकते। न संघ ऐसा कर सकता है। निरपेक्ष लोगों का कहना है कि जैसे ही यह जानकारी सामने आने लगी ट्रस्ट के शीर्ष लोग सक्रिय हुए और संदिग्धों के घर जाकर जांच करने की कोशिश की। उनके अनुसार स्वयं चंपत राय ने ऐसा किया। प्रश्न उठाया जा रहा है कि उन्होंने स्वयं जांच और छानबीन करने की बजाय पुलिस को मामला क्यों नहीं दिया? किसी संस्थान में कोई चोरी या गबन होता है तो पहले आरंभिक स्तर पर उसकी सच्चाई समझना आवश्यक होता है ताकि आगे की कार्रवाई की जाए। उसके बाद ही कानूनी कार्रवाई होती है यह ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व का दायित्व था। हम आप यहां किसी को दोषमुक्त नहीं मान सकते पर मीडिया और नेताओं के बयानों से थोड़ा परे हटकर सच्चाई समझने की कोशिश करें तो पूरा निष्कर्ष वही नहीं आएगा जैसा बनाया गया है। चंपत राय अगर संलिप्त हैं तो उन्हें कोई बचा नहीं सकता। तथ्य यह भी है कि उन्होंने स्वयं प्रदेश सरकार को एसआईटी जांच करने के लिए लिए लिखित आग्रह किया, पुलिस को भी सूचना दी तथा सामने आने के दूसरे दिन ही जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए त्यागपत्र दे दिया। इस कारण इस समय मंदिर प्रबंधन में इनकी कोई भूमिका नहीं। इस सच को देखे बगैर कैसे निष्कर्ष निकाल सकते हैं?

मांग यही होती रही कि वे पद छोड़ें। सीट और पुलिस जांच से कोई भी बाहर नहीं। यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि कोई बचना चाहेगा या किसी को बचाने की कोशिश होगी तो छिप जाएगा। चंपत राय, गोपाल राव व, अनिल मिश्रा या अन्य कोई दोषी हैं तो उनके विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और उम्मीद है होगी। देश, सरकार या प्रशासन श्रीराम मंदिर में चोरी सहन नहीं कर सकता। पर चोरी करने वाला किसी का करीबी माना जाता हो तो क्या उसमें दोनों की मिलीभगत मानी जाएगी? चंदे या चढ़ावे की गणना के लिए भारतीय स्टेट बैंक के कर्मचारी लगे हुए हैं। इसमें ट्रस्ट की भूमिका नहीं है। श्रीराम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्रा के सुझाव पर ही ऐसा किया गया था। सीसीटीवी कैमरे भी लगे हुए हैं और उनमें कई बार सुधार भी किए गए ताकि कोई गड़बड़ी करने वाला उसकी नजर से नहीं बचे। जब चोरों – बेईमानों के बीच मेल हो जाता है तो उसकी भी काट निकाल लेते हैं। पूरी रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि किन-किन तरीकों से चोरी हुई। अभी तक की जानकारी है कि दान पेटी से ही धन गायब हुए।

हमें बनाए जा रहे हैं वातावरण के खतरों को भी समझना चाहिए। मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्ति का संघर्ष लंबे समय से चल रहा है और यह आवश्यक है। वातावरण ऐसा बनाया जा रहा है जिससे भविष्य में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के सरकारी नियंत्रण में जा सकता है। सुझाव आ रहा है कि किसी पूर्व आईएएस अधिकारी के हाथों ट्रस्ट का संचालन दे दिया जाए। क्या इसके लिए केवल आईएएस उपयुक्त हो सकते हैं? आईएएस भ्रष्ट होते ही नहीं? धार्मिक संस्थाओं का संचालन धर्म क्षेत्र और समाज क्षेत्र के हाथों रहे यही उचित है। वह कोई भी हो सकता है। इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता है कि आगे जो ट्रस्ट बनेगा उसमें ऐसी घटना नहीं हो सकती? मूल बात मनुष्य का लालची होना है। भारत में शायद ही कोई मंदिर हो जहां चढ़ावे की पूरी की पूरी राशि संबंधित ट्रस्ट, प्रबंधन या मंदिर के खाते जाते हों। आप चलते-फिरते देख सकते हैं कि बहुत सारे लोग जो दान पत्र में नहीं डालकर किसी के हाथों देते हैं और वो पैकेट में रख लेते हैं जबकि लिखा होता है कि सारा दान पेटी में ही डालें। इसका निदान तो हमारे धर्मनिष्ट, सत्यनिष्ठ और नैतिक होने में ही है। सनातन समाज में जब तक सनातनी के नाते दायित्व बोध और उसके प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता नहीं होगी तब तक किसी भी स्थल को चोरी से मुक्त करना संभव नहीं होगा। इसलिए भविष्य में चंदे की गिनती और उनकी सुरक्षा को लेकर जितना संभव है सुरक्षित व्यवस्था हो किंतु अंतिम रास्ता तो समाज को मनुष्य के रूप में उनके जन्म और मृत्यु के उपरांत की स्थितियां और दायित्व व कर्मों का बोध कराने में ही है। जिस समाज का बहुत बड़ा वर्ग सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रूप से दीर्घकाल से च्युत या भटका हो, अज्ञानी हो उनको फिर से धर्म दृष्टि देना आसान नहीं है, पर रास्ता तो यही है। धार्मिक दृष्टि से सचेतन समाज ही इसे रोक सकता है या ऐसी घटना होने पर सही वातावरण बनाए रखकर निदान निकल सकता है।

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