चंडीगढ़। मिका गिल, जो खालिस्तानी आतंकी गुरुपतवंत सिंह पन्नू के गांव में तिरंगा फहराने वाले भारतीय सिख युवा हैं, ने पंजाब के गांव-गांव में बड़ी स्क्रीनों पर दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम पंजाब 95) दिखाए जाने पर सवाल उठाया है। ज़ी5 से फ़िल्म हटने के बाद इसका ग्रामीण स्तर पर प्रचार क्यों हो रहा है? क्या यह कोई साजिश है? कौन जिम्मेदार है-रिलीज का ऑर्डर, हटाने का फैसला या अब गांवों में स्क्रीनिंग?

तथ्य यह हैं कि फ़िल्म जसवंत सिंह खालरा की कहानी पर आधारित है, जिसने 1980-90 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और गुप्त अंतिम संस्कारों का दस्तावेजीकरण किया था। सीबीएफसी ने 2022 में 21 कट्स और टाइटल चेंज की सिफारिश की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील के बाद भी थिएट्रिकल रिलीज नहीं हुई। 03 जुलाई 2026 को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 पर ‘सतलुज’ नाम से बिना कट्स रिलीज हुई, लेकिन 48 घंटे में फिल्म भारत में हटा दी गई। ज़ी5 की स्क्रीन पर फिल्म अब ‘अनुपलब्ध’ दिखा रहा है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया—कुछ हिस्सों का इस्तेमाल ‘एंटी-इंडिया ताकतें’ अपने हक में कर सकती हैं। अब भी यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय ज़ी5 ग्लोबल पर उपलब्ध है। वहां से इसे नहीं हटाया गया है।
फ़िल्म में बब्बर खालसा (भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठन) के आत्मघाती हमलावर को ‘सूरमा’ और ‘आध्यात्मिक योद्धा’ दिखाया गया है, जबकि पूर्व सीएम बेअंत सिंह की हत्या का संदर्भ है। केपीएस गिल (जिन्होंने उग्रवाद पंजाब से खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी) को खलनायक बनाकर पेश किया गया है। 1990-91 में गिल को हटाने के दौरान बसों से हिंदू-सिखों का कत्लेआम हुआ, जिसे फ़िल्म में नजरअंदाज किया गया। यह एकतरफा नैरेटिव है जो इतिहास को विकृत करता है। पंजाब में 21,000+ मौतें हुईं; गिल की भूमिका को लेकर विवाद हो सकता है (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स के आरोप), लेकिन उन्होंने आतंक का सफाया भी किया।

दिलजीत दोसांझ की दोहरी छवि: कैमरे पर “ओम नमः शिवाय” और देशभक्ति, लेकिन ‘पंजाब 95’ जैसी स्क्रिप्ट पर काम। उनकी क्या कोई व्यावसायिक मजबूरी थी यह? संभव। वे मजबूरी में क्या कलाकार की जिम्मेदारी को भूल गए—जो आतंकियों को ग्लोरिफाई करने लगे। इस फिल्म की आलोचना करने पर अधिवक्ता विनीत जिंदल को जान से मारने की धमकियां मिलीं, जो खालिस्तानी तत्वों से आईं। इस पर दोसांझ क्या कहेंगे?

गांव-गांव स्क्रीनिंग का मामला: SAD (शिरोमणि अकाली दल) ने फ़िल्म गांवों में दिखाने का ऐलान किया, इसे ‘कांग्रेस दमन’ के खिलाफ बताया। वायरल वीडियो राजस्थान-पंजाब गांवों के हैं। ज़ी5 से हटने के बाद पायरेटेड कॉपीज या लोकल स्क्रीनिंग फैली। ‘पीपुल्स रिस्पॉन्स’ कहा जा रहा है, लेकिन बड़े स्क्रीन का आयोजन संगठित लगता है। कोई ‘बड़ी साजिश’ साबित नहीं, पर राजनीतिक फायदे (अकाली दल vs कांग्रेस/केंद्र) साफ हैं। रवनीत सिंह बिट्टू ने दिलजीत पर “पैसे के लिए फ्लिप-फ्लॉप” का आरोप लगाया।
जवाबदेही:
- ज़ी5 पर रिलीज—OTT नियमों की अनदेखी? CBFC प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
- हटाना—केंद्र का फैसला।
- गांव स्क्रीनिंग—स्थानीय प्रशासन, पुलिस और राजनीतिक दल जवाब दें। फर्जी/अनसर्टिफाइड शो अवैध।
पंजाब का इतिहास संवेदनशील है। 1984-95 का दर्द सच्चा है, लेकिन आतंकियों को हीरो बनाना गलत। दोनों पक्ष (पीड़ित, सुरक्षा बल) दिखाएं। सच्ची देशभक्ति छद्म नहीं, बल्कि एकता और सत्य पर टिकी होनी चाहिए। साजिश की बजाय कानून, सत्य और जवाबदेही से समाधान निकालें।




