नई कुली अर्थव्यवस्था: क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं?

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28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है।
बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुँचा रहा है।
उधर हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है।
मोतियाबिंदी अर्थ शास्त्री इसे “स्टार्टअप क्रांति” कहते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण?
चेहरे बदल गए हैं। लठैत जमींदार की जगह अब हूडी पहनने वाले फाउंडर हैं। कुली अब सूटकेस नहीं, फूड पैकेट और किराने के बैग ढो रहा है।
ढांचा मगर वही है। भारत के महानगरों में लाखों प्रवासी युवक आज क्विक कॉमर्स, डिलीवरी ऐप्स, लॉजिस्टिक्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। निवेशक अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर ताली बजाते हैं। स्टार्टअप फाउंडर नए भारत के “आइकॉन” कहलाते हैं। विज्ञापन इन्हें “डिलीवरी हीरो” और “पार्टनर” बताते हैं। लेकिन चमकदार शब्दों के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। ये नव युग के कुली मेहनत करते हैं, कौशल प्रदर्शन नहीं।
दो सौ वर्षों से कुली गिरी चल रही है, पहले अंग्रेजों की, अब अमेरिकन्स की। या तो गोरे आदमी का मैन फ्राइडे, या बाबुओं का सामान ढोता कुली! बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश या राजस्थान से आया युवक दस-दस घंटे बाइक चलाता है। बारिश, धूप, प्रदूषण, दुर्घटना: सब झेलता है। पाँच साल बाद उसके पास क्या बचता है? बस टूटता शरीर और अनिश्चित भविष्य। यह रोजगार अवसर कम, श्रम दोहन अधिक है।
मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर्स तो कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन हौले हौले हमारी अर्थव्यवस्था “सुविधा सेवा” आधारित समाज बनती जा रही है। एक ऐसा समाज जहाँ मध्यम वर्ग अपनी सुविधा के लिए अलादीन का बटन दबाता है और कोई अदृश्य भूत, यानी श्रमिक दस मिनट में सामान लेकर दरवाज़े पर हाज़िर हो जाता है।
आराम अब नया धर्म बन चुका है।
देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया और नवाचार की बातें करता है, मगर करोड़ों युवा आज भी बेहद प्राथमिक श्रम चक्र में फँसे हुए हैं। शहरों की सुविधा का बोझ इन्हीं कुलियों के कंधों पर लदा है, कहते हैं पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।
समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, “हमारी भाषा भी अब सच्चाई छिपाने लगी है। कुली अब “गिग पार्टनर” बन गया है। नौकरी “फ्लेक्सिबिलिटी” कहलाने लगी। शोषण “ऑपर्च्युनिटी” बन गया। स्टार्टअप संस्कृति कई बार नई रंगाई-पुताई वाला पुराना हवेली तंत्र लगती है।”
यह समस्या केवल डिलीवरी ऐप्स तक सीमित नहीं है। भारत पहले भी ऐसा दौर देख चुका है।
बीपीओ और आईटी सर्विस सेक्टर के उभार के समय लाखों युवा कॉल सेंटर और आउटसोर्सिंग नौकरियों में चुक गए। शुरुआती वर्षों में यह आर्थिक चमत्कार जैसा लगा। वेतन बढ़े। अंग्रेज़ी बोलने वाली पीढ़ी तैयार हुई। परिवार खुश हुए। लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।
बहुत बड़ी संख्या में युवाओं ने सीमित और दोहराव वाले कौशल सीखे। वे वैश्विक सेवा उद्योग के “रिप्लेसेबल पार्ट” बनकर रह गए। देश ने डिग्रीधारी युवाओं की फौज तो पैदा कर ली, मगर नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता उतनी विकसित नहीं हुई।
आज की गिग अर्थव्यवस्था उसी गलती को और बड़े पैमाने पर दोहरा रही है। एक डिलीवरी बॉय रोज़ी तो कमा सकता है, मगर क्या यही किसी युवा राष्ट्र का सपना होना चाहिए? रोजगार अगर व्यक्ति को ऊपर उठाने की बजाय वहीं जकड़ दे, तो वह विकास नहीं, संगठित ठहराव है।सबसे खतरनाक असर मानसिक है।
शहरी भारत आज प्रवासी श्रमिकों पर पूरी तरह निर्भर है। गरम खाना इसलिए पहुँचता है क्योंकि कोई बारिश में भीग रहा है। रातोंरात पार्सल इसलिए आता है क्योंकि किसी ने नींद छोड़ी है। दस मिनट में किराना इसलिए मिलता है क्योंकि किसी ने अपनी सेहत दाँव पर लगाई है।
लेकिन कोई यह नहीं पूछता;
चालीस साल की उम्र में उस डिलीवरी राइडर का क्या होगा? उसकी टूटी कमर का इलाज कौन करेगा?एल्गोरिद्म उसे बेकार कर देंगे तो नया कौशल कौन देगा?
किसी सभ्यता की असली पहचान उसके अरबपतियों से नहीं, उसके श्रमिकों की गरिमा से होती है।
मज़दूरी सीढ़ी बननी चाहिए, दलदल नहीं। देश तब आगे बढ़ते हैं जब श्रमिक मांसपेशियों से कौशल की ओर बढ़ते हैं।
यह आधुनिकता नहीं। यह डिजिटल सामंतवाद है। स्टार्टअप कहानी केवल यूनिकॉर्न पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। उसे कुशल नागरिक भी पैदा करने चाहिए। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था दस मिनट में बर्गर पहुँचा सकती है, लेकिन दस साल में श्रमिक को गरिमा नहीं दे सकती, वह वास्तव में प्रगति नहीं कर रही। वह बस गोल-गोल दौड़ रही है, लाइक एलिस इन वंडरलैंड।

गलत नंबर, छूटी ट्रेन और फिसला संतरा: जब कामदेव ने किस्मत की पटकथा लिखी

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मथुरा । प्रेम रस, प्रेम रोग या प्रेम का बीज आखिर कैसे अंकुरित होता है?

क्या प्रेम गुलाब का फूल लेकर दरवाजे पर दस्तक देता है? क्या चांदनी रात में कोई मधुर संगीत बजने लगता है? क्या आसमान से फूल बरसते हैं?

फिल्में और धारावाहिक तो यही दिखाते हैं। लेकिन जिंदगी की पटकथा कुछ और ही होती है।

असल जीवन में प्रेम अक्सर बिना सूचना के आता है। कभी गलत नंबर बनकर फोन करता है। कभी भीड़ भरी ट्रेन में बगल की सीट पर बैठ जाता है। कभी किसी मामूली दुर्घटना में छिपा होता है। और कभी किसी ऐसी घटना में, जिसे याद करके इंसान पहले शर्मिंदा होता है और बाद में मुस्कुराता है।

लगता है प्रेम के देवता कामदेव को सीधे रास्ते पसंद ही नहीं हैं।

भारतीय मिथकों में भी प्रेम की राहें बड़ी टेढ़ी रही हैं। राजा दुष्यंत शिकार खेलने निकले थे, विवाह करने नहीं। लेकिन वन के एक आश्रम में शकुंतला से भेंट हुई और इतिहास बदल गया। नल और दमयंती ने पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। संदेशवाहक हंसों ने दोनों के बीच प्रेम का पुल बनाया। भगवान शिव की तपस्या भंग करने भेजे गए कामदेव स्वयं भस्म हो गए, लेकिन प्रेम का बीज बो गए।

शायद तभी से प्रेम संयोगों का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है।

आगरा के एक अध्यापक राज की कहानी सुनिए। एक बरसाती शाम वे अपने एक सहयोगी को फोन मिलाने की कोशिश कर रहे थे। जल्दबाजी में नंबर गलत लग गया। दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज आई। “उम्मीद है आप कोई टेलीमार्केटिंग वाले नहीं हैं।” राज हंस पड़े। बातचीत शुरू हुई। दस मिनट एक घंटे में बदल गए। फिर रोज बात होने लगी। फोन के उस पार ऋषिकेश की शिक्षिका अनीता थीं। आवाज पहचान बनी, पहचान अपनापन बनी और अपनापन रिश्ते में बदल गया। एक गलत नंबर ने सही जीवनसाथी दिला दिया।

लखनऊ की नेहा की प्रेम कहानी तो एक फिसलन से शुरू हुई। सुपरमार्केट का फर्श गीला था। पैर फिसला और संतरे पूरे गलियारे में बिखर गए। नेहा शर्म से भर उठीं। तभी एक युवा इंजीनियर अर्जुन उनकी मदद के लिए दौड़े। दोनों संतरे समेटते रहे और साथ-साथ हंसते रहे।
बाद में कॉफी हुई। फिर मुलाकातें। और फिर शादी। आज भी दोनों मजाक में कहते हैं कि उनकी शादी में सबसे बड़ा योगदान संतरे का था।
मथुरा के करण गोविंद की कहानी भारतीय रेलवे की सौजन्य से शुरू हुई। मुंबई जाने वाली ट्रेन में वह इतनी गहरी नींद में सो गए कि अपना स्टेशन ही पार कर गए। पहले तो उन्हें गुस्सा आया, लेकिन अगले कुछ घंटे उन्होंने सहयात्री अदिति के साथ बातचीत में बिताए। किताबों, यात्राओं, सपनों और संघर्षों पर चर्चा होती रही। सुबह तक मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हो चुका था। दो साल बाद सात फेरे भी हो गए।
बेंगलुरु मेट्रो में रोहित ने एक युवती को अपनी सीट देने की पेशकश की। युवती ने मना कर दिया। रोहित ने फिर आग्रह किया। उसने फिर मना कर दिया। कुछ ही देर में दोनों के बीच यह बहस छिड़ गई कि आखिर सीट पर बैठने का ज्यादा अधिकार किसका है। पूरी बोगी मुस्कुरा रही थी। बहस बातचीत में बदली, बातचीत दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में। कुछ वर्षों बाद वही दोनों विवाह के मंडप में थे।
पुणे की मीरा को नहीं मालूम था कि जन्मदिन पर मंगाया गया पिज्जा उनकी जिंदगी बदल देगा। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए डिलीवरी बॉय समीर पिज्जा लेकर पहुंचे। दोस्तों ने उन्हें अंदर बुला लिया। चाय पिलाई, बातें हुईं और नंबरों का आदान-प्रदान हो गया। अगले दिन पिज्जा का डिब्बा कूड़े में चला गया, लेकिन रिश्ता बचा रहा।
चेन्नई के दो मेडिकल छात्रों अनन्या और विकी की कहानी और भी अलग है। उनकी पहली मुलाकात किसी पार्क या कैफे में नहीं हुई थी। एनाटॉमी लैब में घंटों साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों के बीच दोस्ती हुई। फॉर्मेलिन की गंध, मोटी किताबों और कठिन परीक्षाओं के बीच प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह बना ली।
आज दोनों डॉक्टर हैं, पति-पत्नी हैं और दो बच्चों के माता-पिता भी।
गुरुग्राम की पूजा की प्रेम कहानी एक छोटी-सी कार दुर्घटना से शुरू हुई।
पार्किंग करते समय उनकी कार दूसरे वाहन से हल्की-सी टकरा गई। नुकसान कम हुआ लेकिन बातचीत ज्यादा हो गई। बीमा की जानकारी साझा हुई, फिर कॉफी हुई, फिर मुलाकातें शुरू हुईं। कार का डेंट कुछ दिनों में गायब हो गया। रिश्ता नहीं।
और शायद सबसे खूबसूरत कहानी अहमदाबाद के हरीश और सुनीता की है। दोनों साठ वर्ष की आयु पार कर चुके थे। एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मरम्मत का काम चल रहा था। हरीश को अपनी नियमित सीट छोड़नी पड़ी। खाली कुर्सी केवल सुनीता जी के पास थी। पहले अखबारों पर चर्चा हुई। फिर किताबों पर। फिर जीवन की स्मृतियों पर।
धीरे-धीरे अकेलापन साथ में बदल गया। दोनों ने विवाह कर लिया। प्रेम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसे कैलेंडर पढ़ना नहीं आता।
इन सभी कहानियों में एक बात समान है। जिंदगी अपने सबसे बड़े मोड़ों की घोषणा नहीं करती। न कोई बिगुल बजता है, न कोई चेतावनी मिलती है। बस एक साधारण-सा पल आता है और चुपचाप जीवन की दिशा बदल देता है।
एक गलत नंबर। एक छूटी हुई ट्रेन।एक बिखरा हुआ संतरा। एक छोटी-सी टक्कर। या फिर पुस्तकालय की एक खाली कुर्सी।
फिल्में परफेक्ट प्रेम कहानियां गढ़ने पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। जिंदगी वही काम मुफ्त में कर देती है।
शायद इसलिए हमारे पूर्वजों ने कामदेव को पुष्प-बाणधारी कहा था। उनके बाण दिखाई नहीं देते। कोई आवाज नहीं करते। लेकिन कब किसे लग जाएं, कोई नहीं जानता।
कभी वे दुष्यंत को शकुंतला तक ले जाते हैं। कभी नल और दमयंती के बीच हंसों को संदेशवाहक बना देते हैं। और कभी आगरा के किसी अध्यापक से एक गलत नंबर डायल करा देते हैं।
हजारों वर्षों से प्रेम की लीला यही है।
सिर्फ माध्यम बदल गए हैं।

2.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक के 81 प्रोजेक्ट्स से मजबूत हो रही आधारभूत संरचनाएं

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जयपुर। यदि दूरदर्शी और सकारात्मक परिणाम देने की सोच के साथ कार्य किया जाए, तो कुछ भी असंभव नहीं है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के इसी विजन के चलते राजस्थान में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट नई रफ्तार पकड़ रहा है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से जारी ‘पैमाना’ रिपोर्ट के आंकड़े विकास की यही कहानी बयां कर रहे हैं। इसके अनुसार राजस्थान में रेलवे, सड़क, ऊर्जा, पेट्रोलियम और नागरिक उड्डयन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की लगभग 2.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कुल 81 परियोजनाएं प्रगतिरत हैं।

राजस्थान रिफाइनरी : पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में क्रांतिकारी कदम

प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक राजस्थान रिफाइनरी परियोजना का जल्द ही उद्घाटन किया जाना है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अंतर्गत संचालित इस परियोजना की लागत 79 हजार 459 करोड़ रुपये है। बाड़मेर के पचपदरा में बनी इस रिफाइनरी से ना केवल राजस्थान बल्कि पूरे पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में क्रांतिकारी बदलाव आएगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। इसके साथ ही बाड़मेर में एचपीसीएल द्वारा 461 करोड़ रुपये की लागत से पेट्रोकेमिकल निकासी एवं विपणन टर्मिनल परियोजना भी प्रगति पर है, जिसे दिसंबर 2026 तक पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित है।

एनर्जी ट्रांसमिशन से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता राजस्थान

राजस्थान में ऊर्जा के क्षेत्र में काफी संभावनाएं होने के कारण बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है। प्रदेश में 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक की एनर्जी ट्रांसमिशन की 19 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें बहुराज्यीय प्रोजेक्ट्स भी शामिल हैं। इनमें 25 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली ‘राजस्थान पार्ट-1 पावर ट्रांसमिशन परियोजना’ राजस्थान के साथ मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश तक फैली है।

पटरी पर रफ्तार पकड़ रहा रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर

रेलवे क्षेत्र की बात की जाए, तो राजस्थान में उत्तर-पश्चिम रेलवे की 23 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनकी लागत 1 लाख 64 हजार 998 करोड़ रुपये है। जिनमें लगभग 1 लाख 55 हजार 524 करोड़ रुपये की लागत की 10 बहुराज्यीय परियोजनाओं के अलावा प्रदेश में भी कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। एक लाख 24 हजार करोड़ रुपये की लागत से गुजरात-हरियाणा-महाराष्ट्र-राजस्थान और उत्तरप्रदेश से गुजरने वाले वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का कार्य पूर्ण होने जा रहा है। प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाले प्रोजेक्ट्स में 968 करोड़ रुपये की देवगढ़ मदारिया से नाथद्वारा, 166 करोड़ रुपये की नाथद्वारा-नाथद्वारा टाउन, 799 करोड़ रुपये की पुष्कर-मेड़ता सिटी, 189 करोड़ रुपये लागत की पोकरण-रामदेवरा नई रेल लाइन ऐतिहासिक कदम साबित होंगे। वहीं, 166 करोड़ रुपये की वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों के रखरखाव एवं कार्यशाला डिपो परियोजना, 1 हजार 634 करोड़ की अजमेर-चंदेरिया दोहरीकरण, 468 करोड़ की सादुलपुर-चूरू दोहरीकरण, 747 करोड़ की धौलपुर-सरमथुरा गेज परिवर्तन, 967 करोड़ की गुढ़ा-ठाठा मीठड़ी नई रेल परियोजना, 1 हजार 203 करोड़ की सवाईमाधोपुर-जयपुर रेलवे लाइन तथा 1 हजार 390 करोड़ रुपये की आगरा फोर्ट-बांदीकुई दोहरीकरण जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स भी प्रदेश में चल रहे हैं।

सरपट दौड़ रहा सड़कों के विकास का रथ

राजस्थान में सड़क मार्गों के विकास के जरिये आधारभूत संरचनाओं का विकास रथ भी तेज गति से दौड़ रहा है। प्रदेश में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के साथ एनएचएआई के द्वारा लगभग 18 हजार करोड़ रुपये की 28 सड़क एवं राजमार्ग परियोजनाएं चल रही हैं। इनमें राजस्थान से गुजरने वाला लगभग 6 हजार 500 करोड़ रुपये के अधिक की लागत का दिल्ली-वडोदरा ग्रीनफील्ड अलाइनमेंट भी शामिल है। वहीं, लगभग 195 करोड़ की लागत से एनएच-25 पर पचपदरा-बागुंडी ख्ांड का चार लेन और 379 करोड़ की लागत से अजमेर-जोधपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर ब्यावर-गोमती चार लेन का कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है। इसी प्रकार एनएच-11 पर फतेहपुर, मंडावा और झुंझुनूं बाईपास 186 करोड़ की लागत से पूर्ण हो चुका है। एनएच-162 पर 606 करोड़ रुपए की लागत से नाथद्वारा से भटेवर तक का उन्नयन जैसे कई राजमार्गों पर विकास कार्य प्रगतिरत हैं।

रनवे पर राजस्थान की ऊंची ‘उड़ान’

राजस्थान में भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण 2 हजार 874 करोड़ रुपये लागत की 3 महत्वपूर्ण परियोजनाएं क्रियान्वित कर रहा है। बूंदी-कोटा में 1 हजार 507 करोड़ की नई ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा परियोजना को अगस्त 2025 में स्वीकृति मिली और नवंबर 2027 तक पूर्ण होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह परियोजना हाड़ौती क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसी प्रकार उदयपुर हवाई अड्डे पर 887 करोड़ रुपए की एकीकृत टर्मिनल परियोजना को पूर्ण करने का लक्ष्य सितंबर 2026 तय किया गया है। वहीं, जोधपुर हवाई अड्डे पर 480 करोड़ रुपए की नए घरेलू यात्री टर्मिनल परियोजना लगभग पूर्ण हो चुकी है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि राजस्थान एक आधुनिक और सुदृढ़ अवसंरचना वाले राज्य के रूप में उभर रहा है। लगभग 2.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक की 81 केंद्रीय परियोजनाएं, राजस्थान रिफाइनरी, सौर ऊर्जा संचरण नेटवर्क, रेलवे का आधुनिकीकरण, नए हवाई अड्डे और चौड़े राजमार्गों के जरिये राजस्थान अपनी नई पहचान स्थापित कर रहा है।

प्यासा ब्रज: तालाबों-कुंडों की धरती श्रीकृष्ण नगरी आखिर पानी को क्यों तरस रही है?

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दिल्ली । ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं।

कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे।तालाब गांवों की धड़कन होते थे।
आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़।

यह वही ब्रज है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वही भूमि, जिसे संतों ने “धरा पर स्वर्ग” कहा। लेकिन अब यह स्वर्ग प्यास से फटे होंठों वाला मरुस्थल बनता जा रहा है। विडंबना देखिए । यमुना किनारे बसे शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जूझ रहे हैं।

कभी ब्रज का हर गांव एक छोटे जल-संसार जैसा था। कुंड थे। पोखर थे। बावड़ियां थीं। बरसात का पानी सहेजने की अद्भुत लोक-व्यवस्था थी।
बूढ़े लोग बताते हैं कि मथुरा और वृंदावन में बीस तीस फीट खोदो तो मीठा पानी मिल जाता था। अब डेढ़ सौ फीट नीचे भी कई बार सिर्फ गाद या हवा निकलती है। धरती का सीना खाली हो चुका है। जैसे किसी ने भीतर का सारा जीवन चूस लिया हो।

गर्मियों में हालात और भयावह हो जाते हैं। मोहल्लों में, गांवों में पानी के लिए रोज छोटे-छोटे युद्ध होते हैं। टैंकर आता है तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान में बादल उतर आया हो।

यह संकट अचानक नहीं आया। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है।
ब्रज के तालाब और सरोवर सिर्फ सजावट नहीं थे। वे धरती के बैंक थे। बरसात का पानी जमा करते थे, भूजल रिचार्ज करते थे, गर्मी कम करते थे। लेकिन विकास के नाम पर इन जलाशयों को मिटा दिया गया। कहीं कॉलोनियां उग आईं। कहीं पार्किंग बन गई। कई कुंड कूड़ाघर में बदल गए।
कंक्रीट ने मिट्टी की सांस रोक दी।

धरती पानी पीना भूल गई।
राजनीति ने भी अपना खेल खेला। चुनावों में बड़े-बड़े वादे हुए। यमुना सफाई की बातें हुईं। हर घर जल पहुंचाने के दावे हुए। घाट चमकाए गए। रंगीन लाइटें लगीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन गांवों के सूखे हैंडपंप किसी भाषण का हिस्सा नहीं बने।

मथुरा से सांसद बनीं हेमा मालिनी ने भी यमुना और जल संकट पर कई घोषणाएं कीं। करोड़ों रुपये योजनाओं में खर्च हुए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। “नमामि गंगे” और “जल जीवन मिशन” जैसे अभियानों का खूब प्रचार हुआ। मगर जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है। शहर के कुछ हिस्सों में पाइपलाइन पहुंची, लेकिन बाहरी बस्तियां और गांव अब भी भूजल के भरोसे हैं।

सबसे दुखद हालत यमुना की है।
जिस नदी को ब्रज की मां कहा जाता था, वह कई जगहों पर नाले जैसी दिखती है। दिल्ली और दूसरे शहरों का प्रदूषण बहता हुआ यहां पहुंचता है। काले झाग, बदबू और गंदगी ने नदी की आत्मा को घायल कर दिया है। श्रद्धालु आरती उतारते हैं, लेकिन नदी खुद जैसे मदद की गुहार लगा रही हो।
एक समय था जब बच्चे यमुना में छलांग लगाकर तैरना सीखते थे। आज माता-पिता बच्चों को नदी के पास जाने से डरते हैं। पानी में बीमारी है। जहरीले रसायन हैं। गांवों के कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड और TDS की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। लोग धीरे-धीरे बीमार हो रहे हैं। दांत खराब हो रहे हैं। किडनी रोग बढ़ रहे हैं। टाइफाइड और हेपेटाइटिस आम बात बनते जा रहे हैं।

पर्यटन ने भी दबाव बढ़ाया है।
हर साल करोड़ों श्रद्धालु ब्रज पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट और नई कॉलोनियां तेजी से बढ़ रही हैं। पानी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन जल संरक्षण की रफ्तार घोंघे जैसी है। विकास हो रहा है या विनाश?

स्थानीय नेतृत्व की विफलता अब खुली किताब है।
भव्य परियोजनाओं पर ध्यान रहा। फोटो खिंचवाने पर ध्यान रहा। लेकिन तालाब बचाने, वर्षा जल संचयन लागू करने और अतिक्रमण हटाने जैसे बुनियादी काम पीछे छूट गए। विकास का ढोल बजता रहा, मगर धरती भीतर से सूखती रही।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।
कुछ गांवों में लोग खुद चंदा इकट्ठा कर तालाब साफ करा रहे हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। युवा वृक्षारोपण अभियान चला रहे हैं। कुछ NGO वर्षा जल संचयन और चेक डैम बनाने की मांग उठा रहे हैं।

असल लड़ाई पाइपलाइन की नहीं, सोच की है।
जब तक विकास और प्रकृति साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई योजना स्थायी नहीं होगी। चमचमाती सड़कें प्यास नहीं बुझातीं। रंगीन घाट सूखे भूजल को नहीं भरते।

ब्रज आज पूरे देश को चेतावनी दे रहा है।
यदि श्रीकृष्ण की भूमि प्यास से तड़प सकती है, तो कोई शहर सुरक्षित नहीं। प्रकृति देर से हिसाब करती है, मगर बहुत सख्ती से करती है।
अब समय आ गया है कि नेता भाषणों से आगे बढ़ें।
तालाब बचाए जाएं।

कुंड पुनर्जीवित हों।
वर्षा जल संचयन अनिवार्य बने।
यमुना में गिरता गंदा पानी रोका जाए।
क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जीवन का है।
ब्रज की पुकार आज बहुत साफ सुनाई दे रही है :
“भव्य चमकीली परियोजनाएं बाद में बनाना, पहले हमारे कुंड, तालाब, वन, बगीचे, नदी सुरक्षित करो।”

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