उद्योग नीति आदि के माध्यम से भारत का निर्माण करने वाले नेहरू थे या डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी? 

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पंकज कुमार झा

रायपुर : पिछले पोस्ट में अपन ने पूछा था कि स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री कौन थे? अनेक मित्रों ने सही ही जवाब दिया है कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

स्वतंत्रता उपरांत नेहरू कैबिनेट में ऐसे दो मंत्री बने, जो कांग्रेस से नहीं थे। जिन्हें गांधीजी के दबाव के कारण बिल्कुल अनिच्छा से नेहरू ने अपनी टीम में शामिल किया था। दोनों को अंततः निकल भी जाना पड़ा नेहरू सरकार से। किंतु दोनों ने जाते-जाते भी अपना काम कर दिया था।

जहां अंबेडकर जी के पास विधि-विधायी काम आया। संविधान निर्माण का काम आया, वहीं डॉक्टर मुखर्जी के पास भारत की उद्योग नीति आदि बनाने का। नए भारत का औद्योगिक पथ कैसा हो, इसे तय करने का।

डॉक्टर अंबेडकर ने अपना काम इस बेहतरीन ढंग से किया कि उन्हें हम सभी संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं, भले संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद रहे हों। है न?

किंतु डॉक्टर मुखर्जी उद्योग-व्यापार आदि की दृष्टि से भारत निर्माता कहे जाने योग्य हैं जिनका श्रेय पंडित नेहरू ने हड़प लिया। गलत तो नहीं है एम यह तथ्य?

स्वतंत्रता में तुरंत बाद भारत की दशा और दोष तय होनी थी। पहले प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के पास हजार कार्य और लाख व्यस्तता थी। भारत विभाजन, शरणार्थी संकट, साम्प्रदायिक विषय, नए शासन की नीति, शिक्षा नीति, भाषा, कृषि, रोजी-रोजगार समेत हजार तरह के विषय थे जिसे उन्हें देखना था। ऐसे में ….

ऐसे में क्या उनके पास इतना समय रहा होगा कि वे उद्योग नीति के बारे में पूर्णकालिक ढंग से सोच-विचार कर सकें? और ऐसा वे करते भी क्यों भला? उनकी टीम में इस कार्य के लिए ऐसे विद्वान डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, जिनकी विद्वता नेहरू से तो अधिक ही थी। है न?

जो सबसे कम उम्र के तब के सबसे प्रतिष्ठित कोलकाता विश्वविद्यालय के वीसी रह चुके थे। जो हमेशा भारतीय संस्कृति, जीवन पद्धति और महान सनातन दर्शन के आधार पर भारत को आगे ले जाना चाहते थे। जिनके पिता आशुतोष मुखर्जी भी वीसी और बहुत बड़े कानूनविद थे। तो पारिवारिक रूप से भी वही चिंतन उन्हें विरासत में मिली थी। ऐसे में ..

ऐसे में गांधी की पसंद और उनके दर्शन के आधार पर भारत की अर्थ-उद्योग नीति को आकार देने में डॉक्टर मुखर्जी अधिक सक्षम हो सकते थे, थे भी।

इधर व्यस्तता और अपेक्षाकृत कम समझ के कारण निश्चित ही इस मामले में पंडित नेहरू, डॉक्टर मुखर्जी पर निर्भर होते। थे भी।

अतः यह तार्किक और प्रामाणिक रूप से उचित होगा कि जिस तरह संविधान निर्माता भारत रत्न अम्बेडकर को कहा जाता है, उसी तरह उद्योग आदि की दृष्टि से भारत निर्माता डॉक्टर मुखर्जी को कहा जाना चाहिए। नेता में रूप में भले सामने नेहरू हों लेकिन भिलाई संयंत्र समेत तमाम औद्योगिक इकाइयों समेत तमाम सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक संस्थानों के सृजन और औद्योगिक नीति आदि के निर्माण का श्रेय डॉक्टर मुखर्जी को जाना चाहिए।

जम्मू कश्मीर के संवैधानिक एकीकरण के लिए डॉक्टर मुखर्जी ने जीवन बलिदान दिया जिन्हें सच्ची श्रद्धांजलि Narendra Modi जी ने अनुच्छेद 370 और 35 अ जैसे सफेद कानूनों को घिस कर दिया। इसी तरह डॉक्टर मुखर्जी की औद्योगिक नीति को भी अधिक बेहतर तरीके से लागू कर भी मोदीजी ने डॉक्टर मुखर्जी के कृतित्व को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि दी है।

संविधान निर्माता अम्बेडकर और भारत के अर्थतंत्र के निर्माता डॉक्टर मुखर्जी, दोनों की स्मृति को सादर नमन। इन दोनों को कृतित्व को कभी उचित ढंग से नेहरू और उनके खानदान द्वारा समर्पित नहीं किया गया। मोदीजी में इन दोनों के महान कार्यों को जनमानस तक पहुंचा कर श्रेष्ठ कार्य किया है।

इतिहास में अब इन दोनों का स्थान किसी भी वंशवादी सत्ता से अधिक बेहतर ढंग से प्रतिष्ठापित किया गया है। भारत का उद्योग जगत अब एक प्रणेता में बतौर डॉक्टर मुखर्जी को सदा वंदन करेगा। ऐसा ही करना भी चाहिए। हमें अपने पुरखों के यश पर फैलाए गए धुंध को साफ करते रहने का कार्य करते रहना होगा।

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