गांधी की विरासत का बाजारीकरण: शांति प्रतिष्ठान में टूटती गांधीवादी आत्मा की पीड़ा

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दिल्ली। गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली। यह नाम सुनते ही कई गांधीवादी कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और सामाजिक आंदोलनकारियों की आंखों के सामने एक ऐसा परिसर उभर आता है जहां विचारों की गंध हवा में घुली रहती थी। जहां सस्ते कमरों में रात बिताकर दूर-दराज से आए किसान, नेता, पर्यावरण कार्यकर्ता और अहिंसावादी अपनी बात रखते थे। जहां सभागार में दो-चार हजार रुपये में बैठकें होती थीं और कैंटीन में सादगीपूर्ण चाय-चर्चा चलती थी। लेकिन आज उसी प्रतिष्ठान में तोड़-फोड़ का शोर है, दीवारें खुल रही हैं, कुर्सियां गायब हैं, कैंटीन बंद है और एक नया स्वरूप उभर रहा है- जिसकी कीमत पर गांधी के सिद्धांतों की बलि चढ़ रही है।

2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार, संस्थान घोर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। देश भर के 150 केंद्र बंद हो चुके थे, सालाना एक-डेढ़ करोड़ जुटाना मुश्किल हो गया था। कोरोना ने स्थिति और बिगाड़ दी। ऐसे में नवीनीकरण की जरूरत कोई नकार नहीं सकता। लेकिन सवाल यह है कि यह नवीनीकरण किस दिशा में जा रहा है? क्या यह गांधीवादी मूल्यों को मजबूत करने के लिए है या बाजार की शर्तों पर संस्थान को व्यावसायिक केंद्र में बदलने की तैयारी?

प्रतिष्ठान के स्वागत कक्ष से सोफे-कुर्सियां हटा दी गई हैं। बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है। सबसे गंभीर मुद्दा है निजी कॉर्पोरेट फंडिंग। आरोप है कि एक निजी कॉर्पोरेट समूह ने भारी धनराशि दी है, लेकिन नाम का कोई आधिकारिक खुलासा नहीं हुआ। पारदर्शिता की कमी गांधीवादी सिद्धांतों के ठीक उलट है। गांधी जी पारदर्शिता को नैतिकता का आधार मानते थे। सार्वजनिक धन या संस्था का संचालन गुप्त सौदों से नहीं चल सकता।

लेखक चिंतक किशन कालजयी के अनुसार, प्रतिष्ठित गांधीवादी विचारक पी.वी. राजगोपाल, सुदर्शन अयंगार, सुरेंद्र कुमार, निशांत अखिलेश और अन्यों ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं। नवनिर्माण के लिए पैसा किसने दिया? शर्तें क्या हैं? क्या लिखित समझौता हुआ? क्या प्रबंधन ने गांधीवादी समुदाय को विश्वास में लिया? इन सवालों के जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं आए।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुमार प्रशांत जी, जो संस्थान के अध्यक्ष हैं, पर गांधीवादी परंपरा बनाए रखने की जिम्मेदारी है, लेकिन परिवर्तन की इस प्रक्रिया में कई पुराने साथी दुखी हैं।

आर्थिक दबाव में संस्थान को बचाने की कोशिश सराहनीय हो सकती है, लेकिन तरीका चिंताजनक है। चर्चा है कि सभागार का किराया ₹2,000-₹4,000 से बढ़कर ₹50,000-₹55,000 हो सकता है। शोधकर्ताओं और कार्यकर्ताओं के लिए कमरे, जो ₹800-₹900 में मिलते थे, अब ₹3,000-₹3,500 प्रतिदिन तक पहुंच सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो सामान्य गांधीवादी कार्यकर्ता, जो सीमित संसाधनों के साथ दिल्ली आते हैं, यहां से वंचित हो जाएंगे। संस्थान जो विचार और आंदोलनों का केंद्र था, धीरे-धीरे उन लोगों के लिए हो जाएगा जिनके पास भुगतान की क्षमता है। यह गांधी की समानता और सादगी के विरुद्ध है।

लेखक गिरिश पंकज के अनुसार : गांधी शांति प्रतिष्ठान को जिस तरीके से ‘गांधी व्यावसायिक प्रतिष्ठान’ बनाने की निर्लज्ज कोशिश की जा रही है, यह दुर्भाग्यजनक है।अब यह बात साफ हो गई है कि गांधी के नाम पर इस देश में कुछ लोग मलाई खा रहे हैं। उनके तन पर भले खादी का कपड़ा हो, लेकिन वे विचार से पूरी तरह से पूंजीवादी हो चुके हैं।गांधी शांति प्रतिष्ठान में मैं भी कई बार रुक चुका हूँ। बहुत पहले तीन सौ रुपये में एक पलंग मिल जाता था फिर बाद में वह 700 भी हुआ, लेकिन अब जिस तरह से उसका कायाकल्प हो रहा है, उसे देखते हुए यह आशंका गलत नहीं है कि अब यह संस्था महंगे होटल में तब्दील होने जा रही है।

गिरिश पंकज आगे लिखते हैं : ऐसा करना गांधी का अपमान होगा, और यह भी साबित हो जाएगा कि गांधी के नाम पर किस तरह से पूंजीवादी सत्ता पनप रही है। इसका खुलकर विरोध होना चाहिए।

गांधी शांति प्रतिष्ठान केवल एक इमारत नहीं है। 1958 में स्थापित यह संस्थान स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक और गांधीवादी परंपरा का जीवंत स्मारक रहा है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरू, आर.आर. दिवाकर जैसे नेताओं से जुड़ा, जेपी आंदोलन के दौरान लोकतंत्र की रक्षा का केंद्र। 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण को यहीं से गिरफ्तार किया गया था। यहां अनुपम मिश्र जैसे पर्यावरणविदों की यादें जुड़ी हैं। अब उसी अनुपम भाई वाले कमरे का टूटना कई गांधीवादियों के दिल को चीर रहा है।

कुमार प्रशांत के नेतृत्व में संस्थान को गांधी से अलग करने की शिकायतें पहले भी रही हैं। कुछ लोग आरफा खानम शेरवानी, अजीत अंजुम जैसे पत्रकारों को गांधी पुरस्कार से जोड़ने पर सवाल उठाते हैं। अब तोड़-फोड़ का विरोध हो रहा है, लेकिन प्रबंधन पर कोई असर नहीं दिखता।

यह विवाद सिर्फ एक संस्थान का नहीं है। यह बड़े सवाल को उठाता है-क्या गांधी की संस्थाएं भी बाजार के दबाव में आत्मसमर्पण कर रही हैं? आज कई एनजीओ, ट्रस्ट और स्मारक आर्थिक तंगी में कॉर्पोरेट फंडिंग ले रहे हैं, लेकिन शर्तें अक्सर छिपी रहती हैं। नतीजा होता है मिशन का भटकना। गांधी जी ने कहा था कि साधन और साध्य एक होने चाहिए। अगर साधन बाजारू हो गए तो साध्य गांधीवादी कैसे रहेगा?

कुछ लोग कहते हैं कि आधुनिक सुविधाएं जरूरी हैं, पुराना ढांचा जर्जर हो गया है। यह तर्क सही हो सकता है, लेकिन बिना पारदर्शिता के, बिना गांधीवादी समुदाय से परामर्श के, और बिना यह सुनिश्चित किए कि मूल उद्देश्य बना रहे, यह नवीनीकरण विश्वासघात जैसा लगता है। दिल्ली में काना-फूसी है कि फंडिंग एक विपक्षी राजनीतिक दल के करीबी शराब कारोबारी से आई है। चाहे सच हो या अफवाह, गुप्तता ही इन अफवाहों को हवा दे रही है।

गांधीवादियों के लिए यह पीड़ा गहरी है। वे देख रहे हैं कि वह संस्थान, जो उनके आंदोलनों का आश्रय था, अब व्यावसायिक हो रहा है। जहां पहले विचारों की बहस होती थी, वहां अब कॉर्पोरेट इवेंट्स की संभावना नजर आ रही है। जहां शांतिवादी और सामाजिक कार्यकर्ता घर जैसा माहौल पाते थे, वहां अब महंगे किराए की दीवार खड़ी हो रही है।

इस संकट का समाधान क्या है? प्रबंधन को तुरंत पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए-फंडिंग स्रोत, शर्तें, नवीनीकरण की योजना और भावी उपयोग नीति। गांधीवादी विचारकों के साथ खुला संवाद होना चाहिए। किराए की व्यवस्था ऐसी हो कि सामान्य कार्यकर्ता वंचित न हों-शायद सब्सिडी या अलग श्रेणी। संस्थान का मूल चरित्र-गांधीवादी अध्ययन, शांति कार्य, सामाजिक न्याय-बनाए रखना चाहिए।

गांधी शांति प्रतिष्ठान को बचाना भवन बचाना नहीं, उसकी आत्मा बचाना है। अगर यह बाजार के हाथों चला गया तो गांधी की विरासत पर एक और गहरी चोट होगी। जो लोग गांधी में विश्वास रखते हैं, उन्हें यह पीड़ा समझ आएगी-यह टूटती दीवारों की नहीं, टूटते आदर्शों की पीड़ा है। समय अभी है, संवाद से रास्ता निकाला जा सकता है। अन्यथा, इतिहास गवाह रहेगा कि एक बार फिर गांधी को उनके ही घर से बेदखल कर दिया गया।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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