गर्मी की छुट्टियाँ: बच्चों से बोला जाने वाला वह दो महीने का सबसे प्यारा झूठ

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मेरठ (उप्र): आह, गर्मी की छुट्टियाँ!
यह वाक्य कभी आज़ादी की महक लेकर आता था।
तीस-चालीस साल पहले भारत में पले-बढ़े बच्चों के लिए गर्मी की छुट्टियाँ कैलेंडर की तारीख़ नहीं, साल का सबसे बड़ा उत्सव होती थीं। स्कूल की आख़िरी घंटी बजते ही लगता था, मानो जेल का फाटक खुल गया हो।
वो भी क्या दिन थे!
स्कूल की यूनिफॉर्म अलमारी के किसी कोने में फेंक दी जाती थी। जूते धूल खाने लगते थे। अलार्म घड़ियाँ बंद हो जाती थीं। रिपोर्ट कार्ड स्टील की अलमारी में रख दिया जाता था और फिर पूरे दो महीने कोई उसका नाम तक नहीं लेता था।
गर्मियाँ लंबी थीं। सुस्त थीं। सुनहरी थीं। पूरे दो महीने की खुली साँस जैसी।
सुनीता भाभी यादों में खो जाती हैं, “घरों में रखे आमों की मीठी खुशबू फैली रहती थी। गीले कपड़े में लिपटे मिट्टी के घड़ों का पानी अमृत लगता था। खिड़की पर रखा रेगिस्तानी कूलर अपनी खरखराती आवाज़ में लोरी सुनाता था। गलियों में पुकार गूँजती थी, ‘कुल्फी ले लो!’ ‘बर्फ वाली चुस्की!'”
बच्चे तपती छतों पर नंगे पाँव दौड़ते थे। सुबह शुरू हुआ क्रिकेट का मैच स्ट्रीट लाइट जलने पर ख़त्म होता था। हर खाली मैदान वानखेड़े बन जाता था। हर टूटी खिड़की पर लंबी बहस होती थी कि बल्लेबाज़ आउट था या नहीं।
न कोई फिटनेस ट्रैकर था। न कोई प्ले-डेट। न हर पल की निगरानी।
बस धूल से सने चेहरे, छिले हुए घुटने और “मेरी बैट, मेरे नियम” वाली दोस्ती।
दोपहरें दादा-दादी और नाना-नानी के नाम होती थीं।
नीम की छाँव तले या आँगन में बिछी चारपाई पर दादी राजा-रानी, भूत-प्रेत और पुराने ज़माने की कहानियाँ सुनाती थीं। दादा पतंग बनाना सिखाते थे, ताश खेलते थे और जीवन के वे सबक दे जाते थे, जिनकी अहमियत बरसों बाद समझ आती थी।
कोई कैरम खेलता, कोई गुल्ली-डंडा। लड़कियाँ गुटके, लंगड़ी-टांग, गुड्डे-गुड़िया की शादी और चोर-सिपाही खेलतीं।
चंपक, नंदन, चाचा चौधरी, लोटपोट और टिंकल जैसी कॉमिक्स ख़ज़ाने की तरह दोस्तों के बीच घूमती थीं। पढ़ाकू बच्चे एक दिन में पूरा उपन्यास चाट जाते थे। बाकी बच्चे स्टांप, सिक्के, ड्राइंग और छोटी-छोटी हॉबीज़ में खोए रहते थे।
फिर शुरू होता था सालाना पलायन।
पूरा परिवार स्टील के टिफ़िन, सुराही, अचार के डिब्बे और ढेर सारे बैग लेकर ट्रेन में सवार होता था। नाना-नानी या दादा-दादी के घर जाना छुट्टियों का सबसे बड़ा कार्यक्रम होता था।
अलग-अलग शहरों से आए चचेरे-ममेरे भाई-बहन घर भर देते थे। फ़र्श पर गद्दे बिछते थे। एक पंखे के नीचे छह बच्चे सोते थे।
और किसी को कोई शिकायत नहीं होती थी।
वे सिर्फ़ छुट्टियाँ नहीं थीं।
वे यादों की फैक्ट्री थीं।
अब आज की गर्मियों को देखिए।
कैलेंडर पर भले ही आज भी “समर वेकेशन” लिखा होता है, लेकिन हक़ीक़त में यह भारतीय माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बन चुका है।
जैसे ही आख़िरी परीक्षा ख़त्म होती है, परिवारों के व्हाट्सऐप ग्रुप सक्रिय हो जाते हैं।
“समर कैंप में एडमिशन करा दिया?”
“कोडिंग क्लास कहाँ लगवा रहे हो?”
“एआई फ़ॉर किड्स वाला कोर्स कैसा है?”
लगता है, अब बचपन भी सालाना प्रदर्शन समीक्षा के साथ आता है।
जो कभी छुट्टी हुआ करती थी, वह अब स्कूल का आउटसोर्स किया हुआ संस्करण बन चुकी है।
आज के बच्चों का समर टाइम-टेबल किसी कॉरपोरेट कर्मचारी की डायरी जैसा दिखता है।
सुबह सात बजे उठो।
आठ बजे वैदिक मैथ्स।
दस बजे रोबोटिक्स।
दोपहर में फ़्रेंच क्लास।
शाम को स्विमिंग।
रात में ओलंपियाड की तैयारी।
इन सबके बीच बच्चे से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी छिपी प्रतिभा भी खोज ले, नेतृत्व कौशल भी विकसित कर ले और भविष्य की नौकरी के लिए भी तैयार हो जाए।
और फिर आते हैं छुट्टियों के होमवर्क।
ये असाइनमेंट नहीं, बचपन पर दागी गई मिसाइलें हैं।
“मेरा गाँव” पर स्क्रैपबुक बनाओ।
वर्षा जल-संचयन का मॉडल तैयार करो।
दादा-दादी का साक्षात्कार लो।
“मैंने अपनी गर्मी की छुट्टियाँ कैसे बिताईं” पर 500 शब्दों का निबंध लिखो और स्कूल खुलने के पहले दिन जमा करो।
छुट्टियाँ ख़त्म होने से पहले ही उनका आनंद ख़त्म हो जाता है।
माता-पिता भी कम उस्ताद नहीं हैं।
“बेटा, थोड़ा पढ़ लो।”
मतलब, चार घंटे की कोचिंग।
“बस दो घंटे।”
मतलब, जब तक शर्मा जी का बेटा पढ़ रहा है।
“चलो, पहाड़ों पर घूमने चलते हैं।”
मतलब, तुम पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कैंप में जाओगे और हम सेल्फ़ियाँ लेंगे।
भारतीय दोपहर की पवित्र नींद भी अब कब्ज़े में है।
कूलर की ठंडी हवा, हाथ में कॉमिक्स और आँख लग जाने वाला वह सुकून अब इतिहास बन चुका है।
उसकी जगह अब एबाकस, एप्टीट्यूड टेस्ट और ब्रिटिश एक्सेंट वाली स्पोकन इंग्लिश क्लास ने ले ली है, मानो आईआईटी का इंटरव्यू ख़ुद ब्रिटिश राज लेने वाला हो।
सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता जी कहती हैं, “कोचिंग उद्योग के लिए गर्मी का मौसम दिवाली जैसा होता है। ऐसे बच्चों के लिए क्रैश कोर्स चल रहे हैं, जो अभी तक किसी चीज़ से टकराए भी नहीं हैं। तेरह साल के बच्चों के लिए जेईई और नीट फ़ाउंडेशन बैच हैं, जो अभी तक मैगी और पास्ता में चुनाव नहीं कर पाते। ब्रॉशर में मुस्कुराते बच्चे टेस्ट ट्यूब और सर्टिफिकेट लेकर खड़े होते हैं। असलियत में वे नींद से भरे चेहरे और फ़ॉर्मूलों से भरे दिमाग़ लेकर घूमते हैं।”
आजकल हर गतिविधि को एक गंभीर नाम देना ज़रूरी हो गया है।
डांस मनोरंजन नहीं, अनुशासन है।
स्विमिंग गर्मी से राहत नहीं, जीवन कौशल है।
यहाँ तक कि दादा-दादी के घर जाना भी लक्ष्य-आधारित हो गया है।
“अगली क्लास की एनसीईआरटी ख़त्म कर लेना, बेटा। समय कम है।”
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब स्कूल दोबारा खुलते हैं, तब बच्चे तरोताज़ा नहीं होते।
वे थके हुए, तराशे हुए और प्रदर्शन के लिए तैयार किए हुए होते हैं।
रिटायर्ड स्कूल टीचर मीरा जी कहती हैं, “गर्मी की छुट्टियाँ जिज्ञासा को चेकलिस्ट में और कल्पना को टाइम-मैनेजमेंट की प्रस्तुति में बदल चुकी हैं। आज के बच्चों के पास अवसर ज़्यादा हैं, लेकिन खाली समय कम है। वे कोडिंग जानते हैं, लेकिन बारिश के बाद जुगनू पकड़ने का रोमांच नहीं। वे नेतृत्व कार्यशालाओं में जाते हैं, लेकिन मोहल्ले की टोली का नेतृत्व करने का आनंद नहीं जानते। वे रोबोट बना सकते हैं, लेकिन छत पर तारों के नीचे सोने की यादें शायद कभी नहीं बना पाएँगे।”
तो आइए, एक और शानदार गर्मी की छुट्टी का स्वागत करें।
जहाँ बच्चे पहले से ज़्यादा व्यस्त होंगे, पहले से ज़्यादा कुशल होंगे, शायद पहले से ज़्यादा सफल भी।
बस एक डर है।
कहीं इस दौड़ में वे बचपन जीना ही न भूल जाएँ।
क्योंकि बचपन की सबसे बड़ी पाठशाला खाली समय होता है।
और गर्मी की छुट्टियाँ, कभी उसी पाठशाला का सबसे सुंदर अध्याय हुआ करती थीं

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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