इन्हीं की रणनीति से कालिंजर में मारा गया था शेरशाह सूरी. .

000000-1.png

भोपाल । रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास की ऐसी वीराँगना हैं जिनके शौर्य, दूरदर्शिता और रणनीति का प्रभाव अपने कालिंजर से गौंडवाना तक है। लेकिन इतिहास में उन्हें उतना स्थान नहीं मिला जितना योगदान उनका भारतीय संस्कृति की रक्षा में है। उन्हें आमने सामने की वीरता में कोई हरा नहीं पाया। मुगल सेना भी पराजित हुई अंततः मुगल सेनापति आसफ खाँ की कुटिल योजना बनाई, समझौते का संदेश भेजा और घेरकर किये गये हमले में उनका बलिदान हुआ।

ऐसी वीराँगना और दूरदर्शी रणजीतकार रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। उनके पिता राजा कीर्तिवर्धन सिंह इतिहास प्रसिद्ध कालिंजर के राजा थे। यह राजघराना चंदेल राजवंशी था। उनकी माता चित्तौड़ राजघराने की राजकुमारी और सुप्रसिद्ध यौद्धा राणा सांगा की बहन थीं। राणा सांगा का खानवा के मैदान में बाबर के साथ हुये युद्ध में राजा कीर्तिवर्धन की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसीलिए खानवा युद्ध के बाद बाबर ने कालिंजर पर आक्रमण किया था। लेकिन वह जीत नहीं पाया था और पराजित होकर लौटा।

कालिंजर किला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के अंतर्गत है। इतिहास के हरेक युग की घटनाओं में कालिंजर का उल्लेख मिलता है। यह कालिंजर का आकर्षण ही था कि प्रत्येक आक्रांता ने हमला बोला। मेहमूद गजनवी से आरंभ यह क्रम सल्तनतकाल में कभी रुका नहीं। आक्रांताओं द्वारा निर्दोष नागरिकों की हत्याओं, लूट और अत्याचारों की कहानियाँ कण कण में फैली हैं। लेकिन किला सदैव अजेय रहा और किसी शासक ने समर्पण नहीं किया। ऐसी वीरभूमि और साँस्कृतिक गौरव की परंपरा में जन्मी थीं रानी दुर्गावती। उनके पिता राजा कीर्तिवर्धन का नाम पृथ्वीदेव सिंह था वे कीर्तिवर्धन नाम से गद्दी पर बैठे। इसलिए इतिहास की पुस्तकों में दोनों नाम मिलते हैं। राजकन्या का जन्म दुर्गाष्टमी हुआ था। इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। राजा कीर्तिवर्धन ने एक से अधिक विवाह किये थे। परिवार में और भी बेटियाँ थीं। लेकिन दुर्गावती अपनी माता की इकलौती संतान थीं। इसलिये उनका लालन पालन बहुत लाड़ के साथ हुआ । वे बचपन से कुशाग्र बुद्धि, ऊर्जावान और साहसी थीं। कालिंजर ने बहुत आक्रमण झेले थे। इस कारण राजपरिवार की सभी महिलाओं और राजकुमारियों को आत्मरक्षा के लिये शस्त्र संचालन सिखाया जाता था। कालिंजर पर अक्सर होने वाले हमले के कारण अधिकांश नागरिकों में भी युद्ध कला के प्रशिक्षण का चलन हो गया था। इसी संघर्ष मय वातावरण में दुर्गावती बड़ी हुईं।राजकुमारी दुर्गावती को शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा दी गयी। साहसी दुर्गावती सखियों के साथ वनक्षेत्र में भी निर्भय घूमती थीं। उनकी सखी सहेलियों की टोली भी वीरांगनाओं की थी। सबने शस्त्र चलाने का अभ्यास किया था। वे हाथी पर बैठकर तीर कमान के युद्ध में भी पारंगत थीं। उनके तीर का निशाना अचूक था। वीरांगना दुर्गावती कृपाण से चीते का शिकार कर लेतीं थीं। उनकी माता ने उन्हे इतिहास और पूर्वजों की वीरोचित परंपरा की कहानियाँ सुनाकर बड़ा किया था। 1544 में उनका विवाह गढ़ मंडला के शासक राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े पुत्र दलपतशाह हे हुआ। गढ़ मंडला के शासक गौंड माने जाते थे और कालिंजर के चंदेल राजा सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। यदि सूर्यवंशी राजा अपनी पुत्री का गौंडवाना में करते हैं तो इससे संकेत है कि भारत में राजपूताना और गौंडवाना में का कोई भेद न था।

विवाह के एक वर्ष पश्चात रानी ने पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम वीर नारायण रखा। रानी ने जब पुत्र को जन्म दिया तब वे मायके कालिंजर आयीं हुईं थीं। इन्हीं दिनों शेरशाह सूरी का आक्रमण कालिंजर पर हुआ। राजा कीर्तिवर्धन सिंह ने वीरता से युद्ध लड़ा लेकिन लगातार हमलों से कालिंजर पर हमले से शक्ति क्षीण हो गई थी। फिर भी राजा ने समर्पण न किया और वीरता से युद्ध किया। वे घायल हो गये। किले के द्वार बंद करलिये गये। शेरशाह ने किले पर घेरा मजबूत किया और आसपास के गाँवों में अत्याचार आरंभ करके राजा के सामने समर्पण का संदेश भेजा। समर्पण में शर्त में रनिवास और राजकोष के समर्पण की शामिल थी। राजा ने समर्पण से इंकार कर दिया। घेरा लंबा चला। शेरशाह की सेना में बेचैनी तो हुई पर वह खाली हाथ नहीं लौटना चाहता था। रानी दुर्गावती की एक बहन कमलावती भी थीं। उनके सौन्दर्य और वीरता के भी चर्चे थे। रानी दुर्गावती ने अपने पिता की ओर से शेरशाह के पास संदेश भेजा कि यदि राजकुमारी से विधिवत विवाह कर लें तो समर्पण करके आधीनता स्वीकार कर ली जायेगी। अपनी सेना की बेचैनी भाँपकर शेरशाह जल्दी लौटना चाहता था। उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। तब योजना पूर्वक शेरशाह के पास सगुन भेजा गया। किले में विवाहोत्सव की गीत संगीत होने लगे। यह सूचना शेरशाह को मिली तब उसका विश्वास पक्का हो गया। तीसरे दिन शेरशाह को विवाह केलिये किले में आमंत्रित किया गया। शेरशाह किले के मुख्य द्वार की ओर बढ़ा। जैसे ही वह समीप आया किले की दीवार से तोप गरज उठी और शेरशाह मारा गया। भारतीय इतिहास के ऐसे गौरव प्रसंगों पर परदा डालने वाले कुछ इतिहासकार यह तो स्वीकार करते हैं कि शेरशाह की मौत किले से आने वाले तोप के गोले से हुई। लेकिन वे कुतर्क देते हैं कि वह तोप का गोला शेरशाह की तोप का ही था जो किले की दीवार से टकराकर लौट आया था। कोई इन इतिहासकारों से कि क्या तोप के गोले में हवा भरी थी जो दीवार से टकरा लौट आया। कालिंजर के किले से गरजी तोप से केवल शेरशाह ही नहीं मारा गया था अपितु उसका तोपखाना भी नष्ट हो गया था। शेरशाह की सेना में भगदड़ मच गई। नागरिकों ने भी हमला बोला। रानी दुर्गावती की रणनीति से न केवल कालिंजर की रक्षा हुई अपितु क्रूर हमलावर और लुटेरा शेरशाह सूरी मारा गया। यह गाथा लोक जीवन की कहानियों में है।

कुछ समय रूककर रानी दुर्गावती अपनी ससुराल गौंडवाना लौट आईं। इस घटना के बाद उनकी चर्चा पूरे भारत में हुई। लेकिन रानी का दाम्पत्य जीवन अधिक न चल सका। 1550 में राजा दौलत शाह की मृत्यु हो गई। तब पुत्र वीर नारायण की आयु मात्र पाँच वर्ष थी। रानी ने अल्पवयस्क वीर नारायण को गद्दी पर बिठाकर राजकाज चलाना आरंभ किया। उन्होंने अपनी नौ सदस्यीय मंत्री परिषद गठित की। इसमें कोष, सेना, अंतरिम व्यवस्था, शाँति सुरक्षा आदि के प्रमूख बनाये। मंत्री परिषद के प्रमुख को दीवान पद दिया। इसके साथ रानी ने अपने पूरे राज्य में कृषि और वनोपज के व्यापार को बढ़ावा दिया। राज्य की आय बढ़ी तो नये निर्माण कार्य भी हुये। उन्होंने अपनी राजधानी सिंगोरगढ़ से चौरागढ़ स्थानांतरित की । चौरागढ़ सुरम्य सतपुड़ा पर्वतीय श्रृंखला पर किला है। सामरिक दृष्टि से यह किला महत्वपूर्ण था। तब गौंडवाना साम्राज्य मंडला, नागपुर से लेकर नर्मदा पट्टी तक फैला था। गौंडवाना राज्य के अंतर्गत कुल 28 किले आते थे । राज्य निरंतर प्रगति की ओर बढ़ रहा था। रानी दुर्गावती प्रजा वत्सल वीरांगना थीं। जबलपुर का आधारताल, चेरीताल और रानीताल का निर्माण कार्य उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। उनपर माँडू के सुल्तान बाज बहादुर ने तीन बार आक्रमण किया और तीनों बार पराजित हुआ। तीसरी बार तो बड़ी मुश्किल से प्राण बचाकर भागा था। गौंडवाना राज्य की बढ़ती समृद्धि और ख्याति ही उसपर आक्रमण का कारण बनी। यदि मालवा के सुल्तानों से कुछ राहत मिली तो मुगल सेना ने भारी सेना और तोपखाने से आक्रमण बोला। जो मुगलसेना गौंडवाना पर आक्रमण करने आयी उसका सेनापति आसफ खाँ था। उसने पहले इलाहाबाद में अपना कैंप लगाकर आसपास लूट की लोगों आधीन बनाया। रीवा राज्य को भी समर्पण करने विवश किया। समर्पण का संदेश रानी को भी भेजा गया। रानी ने इंकार कर दिया। मुगल सेना ने जोरदार आक्रमण किया लेकिन पराजित हुआ और भागकर वापस इलाहाबाद पहुँचा। अतिरिक्त तोपखाना और सेना भी बुलाकर दोबारा हमला बोला। इस बार भी पराजित हुआ। उसने लगातार चार आक्रमण किये। हर आक्रमण में पराजित हुआ। इन आक्रमणों में रानी को विजय तो मिली लेकिन उनकी शक्ति क्षीण हो गई थी लेकिन रानी ने साहस न खोया और छापामार युद्धनीति अपनाई।

अपनी निरंतर पराजय के बाद आसफ खाँ ने एक कुटिल योजना बनाई। आसफ खाँ ने नरई नाले पर अपना कैंप लगाया । रानी के पास स्थाई समझौते का संदेश भेजकर बातचीत के लिये अपने कैंप पर आमंत्रित किया। रानी सतर्क तो थीं पर उन्होंने समझौता वार्ता के लिये नाले तक जाना स्वीकार कर लिया। यह नाला गौर और नर्मदा नदी के बीच में था। आसफ खाँ ने अपनी रणनीति के अंतर्गत रानी को नर्मदा के इस पार आने दिया। घाट पर उनके स्वागत की व्यवस्था की गई थी। इससे रानी कि विश्वास बढ़ा और वे आगे बढ़ीं। लेकिन कुटिल आसफ खाँ ने अपने तीरंदाज पेड़ों पर तैनात कर दिये थे। रानी जैसे ही आगे बढ़ीं तो तीरों से हमला हो गया। कुछ अंग रक्षक घायल हुये और एक तीर रानी को लगा। वे भी घायल हुईं। बेटा वीर नारायण भी उनके साथ था। इस स्थिति में भी रानी ने समर्पण नहीं करके युद्ध करना बेहतर समझा। मुगल सेना उन्हें जीवित पकड़ना चाहती थी। इसलिये उनपर तीरों से हमला किया जा रहा था। जबकि रानी के अंगरक्षकों पर तोपखाना भी आग उगल रहा था। फिर भी रानी ने हार नहीं मानी तभी एक तीर उनके कान के पास और एक तीर उनकी गर्दन में लगा। वे बेहोश होने लगीं। महावत ने उन्हें कहीं छिपकर निकलने की सलाह दी। पर रानी को शत्रु की रणनीति का अनुमान हो गया था। वहाँ से सुरक्षित निकलना सरल न था। उनके पास पुनः समर्पण का संदेश आया। पर उन्होंने पराधीन जीवन से बेहतर स्वाभिमान से मर जाना बेहतर समझा और कटार निकालकर स्वयं पर वार कर लिया। यह 24 जून 1564 का दिन था जब वीरांगना रानी दुर्गावती ने कटार निकालकर स्वयं का बलिदान दे दिया। उनके बलिदान के बाद मुगल सेना राज्य घुसी लूट और हत्याओं के साथ महिलाओं के साथ जो व्यवहार हुआ। वह सब इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।

Share this post

रमेश शर्मा

रमेश शर्मा

श्री शर्मा का पत्रकारिता अनुभव लगभग 52 वर्षों का है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों में उन्होंने काम किया है। दैनिक जागरण भोपाल, राष्ट्रीय सहारा दिल्ली सहारा न्यूज चैनल एवं वाँच न्यूज मध्यप्रदेश छत्तीसगढ प्रभारी रहे। वर्तमान में समाचार पत्रों में नियमित लेखन कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top