मृदुल त्यागी
मेरठ । धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया. अच्छा ही हुआ. 2024 में जब मोदी नई सरकार बना रहे थे, उससे पहले भी लिखा था- #परजीवियों से छुटकारा पाइये. ये भी लिखा था- प्रधान जैसे मंत्री #नीट_को_नासूर बना देंगे. किसी प्रकार से सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को ये गुमान हो गया कि आवश्यकतानुसार मंत्रिमंडल में बदलाव कमजोरी का संकेत देता है. ऐसा नहीं है. लेकिन प्रधान की जिस तरह से विदाई हुई, वह भी कमजोरी का संकेत नहीं है. जिन्हें ये लगता है कि मोदी को झुका दिया, डरा दिया. वे गलत हैं. क्या ये सत्तापक्ष की विफलता है ? नहीं.
ये विफलता विपक्ष की है. अब जबकि प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है, तो #राहुल_गांधी_से ये सवाल और ज्यादा पुख्ता तरीके से बनता है कि पिछले 12 साल में बतौर विपक्ष वह कोई ऐसा आंदोलन क्यों खड़ा नहीं कर पाए ?
चंद महीने में एक इंस्टाग्राम पार्टी बनी और निर्णायक आंदोलन हो गया. राहुल गांधी ऐसा कोई आंदोलन क्यों पैदा नहीं कर पाए. जवाब वही है, वेणुगोपालों और जयराम रमेशों से घिरे राहुल गांधी जनाकांक्षाओं या विरोध के मुद्दों को न तो समझ पाते हैं, न पकड़ पाते हैं. हां, जिस तरीके से उन्होंने आंदोलन को चोरी करने की कोशिश की और सबके बाद जिस तरीके से क्रेडिट चोरी करने की कोशिश की, घिनौना है.
ये सवाल अन्य से भी है. क्या रोज एक सांड़ का फोटो ट्वीट कर देने से उनकी विपक्ष की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है. या रोज एक निम्न स्तर का व्यंग्य पोस्ट कर देने से वह जेन-जी की आकांक्षाओं से खुद को जोड़ पाते हैं ? जवाब है नहीं.
आप भले ही सीजेपी को #AAP_की_बी_टीम कहें, लेकिन सबसे बड़ा #तमाचा तो ये अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी के मुंह पर है. जो दिल्ली को अपनी जागीर मानते थे, जो जंतर-मंतर और धरने के चैंपियन बनते थे, वे #शीशमहल में गुम हो गए. अगर सीजेपी उनकी बी टीम है, तो बात दूसरे गाल पर तमाचे वाली है. इसलिए कि आपने अपनी ए टीम यानी आआप को चुका हुआ मान लिया. आपने मान लिया है कि आपके चेहरों पर अब लोगों और देश के युवाओं को भरोसा नहीं है. आपके नए डमी चेहरे चाहिए.
ट्रांसफारमेशन जो हुआ है, वह मोदी का हुआ है. मोदी का जो व्यवहार है, वह देश के हर पेरेंट, गार्जियन के लिए सबक है. #सबक ये कि आप आज के युवा की किसी बात को ये कहकर नहीं टाल सकते कि बेटा अभी तुम कुछ नहीं जानते. उन्होंने बात सुनी, मानी. लोग कह रहे हैं कि तीस दिन तक इंतजार क्यों किया. इसलिए किया कि क्या वास्तव में यह देश के यूथ की आकांक्षा है. क्या देश के यूथ में कोई गुस्सा वाजिब तौर है. जो व्यक्ति तीन बार मुख्यमंत्री रहा, 12 साल से प्रधानमंत्री है, तमाम साजिशों के बावजूद सत्ता में है, उसे मैं राजनीति का ट्यूयोरियल देने लायक खुद को नहीं समझता. हां, ये देखकर खुशी हुई कि मोदी ने समय रहते पहचान लिया कि ये #इंस्टाग्राम_का_आंदोलन है. इस आंदोलन में युवा का गुस्सा जहां होगा, वहां होगा, लेकिन बड़ी बात ये थी कि रील-मीम का आंदोलन था. इस आंदोलन में बड़ी संख्या में वे लोग शामिल थे, जो सब्सक्राइबर, फालोअर और लाइक के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. ट्रेन के आगे कूदने तक को तैयार हैं. फिर वे दिल्ली की सड़कों पर क्या कुछ नहीं कर गुजरते.
अब जनमत मोबाइल स्क्रीन से बनता है. ट्वीटर पर रोज बौद्धिक कुश्ती करते कथित बुद्धिजीवियों को लगता होगा कि दुनिया बस वही है. लेकिन नहीं. आभासी दुनिया अब रील्स है. मोदी को #संवाद ही तो आता है. इसलिए वह इंस्टाग्राम पर उतर आए. लाइव. उसी लैंग्वेज में कम्युनिकेट किया. मोदी की रील ने इंस्टाग्राम फीड पर दो दिन तक कब्जा किए रखा. ये कम बड़ी बात नहीं है. वन मिलियन फालोअर चंद घंटों में आ गए. मोदी ने गार्जियन वाला फर्ज निभाया. बात सुनी. मानी. आप इसे मजबूरी कह लें या कुछ और. लेकिन मोदी हारकर भी जीत गया और इस देश का कथित विपक्ष एक बार बुरी तरह हारा और चंद महीने पुरानी पार्टी के सामने जमींदोज हो गया.
संलग्न- वह पोस्ट जिसमें प्रधान के नीट को नासूर बना देने की आशंका जताई थी
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