हिमालय की गोद में लेखक गाँव

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विजय मनोहर तिवारी

देहरादून : डॉ. रमेश पोखरियाल “निशंक’ के लिए लेखक गाँव एक ऐसा कैनवास है, जिस पर वे कुछ रँग भर चुके हैं, कुछ रेखाएँ खींची जा चुकी हैं और बहुत कुछ उभरना शेष है। यह हिमालय की गोद में भारत का पहला लेखक गाँव है…

‘निशंक’ नवंबर 2025 में किसी निजी आयोजन में भोपाल आए थे। उनका कॉल आया। वे विश्वविद्यालय परिसर में आने के इच्छुक थे। मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था। सामान्यत: ऐसी किसी गणमान्य विभूति से किसी प्रसंगवश हम बुलाते हैं और उनकी सुविधा से समय लेते हैं।

वह अवकाश का दिन था इसलिए कोई औपचारिक कार्यक्रम संभव नहीं था। मैं संकोच में पड़ गया। वे समझ गए और बोले कि किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है। भोपाल में हूँ तो देश के सबसे बड़े मीडिया विश्वविद्यालय में बस आना चाहता हूँ और फिर यह एक कवि के नाम पर है तो मुझे तो आना ही चाहिए।

वे आए। हॉस्टल के कुछ विद्यार्थियों के साथ एक घंटा बैठे। कोई उत्तरप्रदेश से था, कोई तेलंगाना से, कोई झारखंड, कोई बिहार से। पूरा भारत ही सामने था और सब उन्हें जानते थे। उन्होंने सबका पूरा परिचय लिया। कॅरिअर में आगे बढ़ने के पहले विश्वविद्यालय में अध्ययन के इस समय का महत्व उन्हें बताया। अपने अनुभव सुनाए। दादा माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिमा के दर्शन किए और लौट गए। जाते-जाते उन्होंने उत्तराखंड में किसी लेखक गाँव के बारे में बताया और मुझे आमंत्रित किया। उनके जाने के बाद उनके कार्यालय से चार-पाँच बार मुझे याद दिलाया गया कि जब भी उत्तराखंड आना हो, लेखक गाँव का रास्ता जरूर पकड़ें।

“निशंक’ यदि केवल राजनीति में ही सक्रिय होते तो शायद यह परिचय प्राप्त होने की कोई संभावना नहीं थी। किंतु राजनीति से पहले कविता और साहित्य में उनकी सक्रियता ह्दय से रही। वे 33 साल की उम्र में विधायक 1991 में बने थे मगर पहला कविता संग्रह समर्पण 1983 में ही छप गया था। सौ के आसपास उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं। उत्तराखंड में 2009 में वे सबसे कम आयु के मुख्यमंत्री बने। उनकी किताबें कई भाषाओं में अनुवादित हुई हैं। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में चलती हैं।

लेखक गाँव में नजर आने वाली यह सृजनशीलता ही उनके इस परिचय के मूल में है, जो देहरादून के पास 20 एकड़ की एक हरी-भरी पहाड़ी ढलान पर विस्तृत हो रहा है। यह “निशंक’ की कल्पना का लेखक गाँव है। एक ऐसा स्थान जहाँ देश भर के लेखक प्रकृति के बीच आएँ, रुकें, कुछ रचें, चर्चा, विमर्श करें और एक यादगार अनुभव लेकर लौटें।

अभी दैनिक जागरण संवादी के एक सत्र में मेरा देहरादून जाना हुआ। मुझे पता नहीं था कि लेखक गाँव उत्तराखंड में कहाँ है। मगर “निशंक’ को मेरे आने की सूचना हुई। उन्हीं का कॉल आया। लेखक गाँव एयरपोर्ट के बिल्कुल ही पास में है, यह जानकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। अगले दिन दोपहर बाद की उड़ान के पहले इस गाँव में जाना हो गया। दोहरी प्रसन्नता यह थी कि प्रसिद्ध ललित निबंध लेखक अपने खंडवा के डॉ. श्रीराम परिहार की संगत मिल गई। वे भी संवादी में आए थे। हम दोनों ने कुछ घंटे लेखक गाँव में बिताए।

“निशंक’ की छोटी बेटी विदुषी ने एक-एक कोने में जाकर अपने सृजनशील पिता की इस रचना के दर्शन कराए। वे खुद कैम्ब्रिज से पढ़कर आई हैं और नैनीताल उच्च न्यायालय में वकालत से बचे समय में स्पर्श हिमालय फाउंडेशन की निदेशक के रूप में यहाँ सक्रिय हैं, जहाँ “निशंक’ ने अपनी कल्पना को जमीन पर विस्तार दिया है। स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय भी उनके विस्तृत कार्यक्षेत्र का एक आयाम है।

लेखक गाँव का हर कोना ह्दय से आपका स्पर्श करता है। नालंदा शोध एवं अनुसंधान केंद्र के पुस्तकालय में 40 हजार पुस्तकों का संग्रह और ऊपरी तल पर 350 की क्षमता का आधुनिक सभागृह, लेखकों के सुविधाजनक आवास के लिए लेखक कुटीर,  शोधार्थियों के लिए अतिथिगृह, संजीवनी वाटिका और हिमालयन संजीवनी रसोई में जैविक खाद्य सामग्री से तैयार व्यंजन की सुविधा। परिसर के सारे निर्माण स्थानीय शैली और सामग्री से हुए हैं। भविष्य की योजनाओं में एक हिमालयी संग्रहालय का निर्माण है, जिसमें हिमालय की गोद में बसे राज्यों की लोक परंपराओं से जुड़ी वस्तुओं को एक ही छत के नीचे प्रदर्शित किया जाना है।

यह एक कवि की कल्पना का चमत्कार है। लेखक गाँव में स्थापित भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी की प्रतिमा एक कवि के प्रति एक कवि के आदर भाव की गहरी अभिव्यक्ति है। “निशंक’ इस गाँव की परिकल्पना का श्रेय भी अटलजी को ही देते हैं। वे कहते हैं कि राजनीति में सर्वोच्च पद पर पहुँचकर भी अटलजी के मन में साहित्य और संस्कृति के प्रति गहरी संवेदना और लेखकों के प्रति आजीवन सम्मान रहा। साहित्य, सिनेमा, संगीत, नृत्य, गायन और मीडिया से जुड़ी अनेक प्रसिद्ध विभूतियाँ लेखक गाँव में आ चुकी हैं।

‘निशंक’ के लिए लेखक गाँव एक ऐसा कैनवास है, जिस पर वे कुछ रँग भर चुके हैं, कुछ रेखाएँ खींची जा चुकी हैं और बहुत कुछ उभरना शेष है। वे चाहते हैं कि देश भर से लेखकों, साहित्यकारों, कवियों, गीतकारों और कथाकारों की चहलपहल यहाँ होती रहे। वे अपने वार्षिक आयोजनों के लिए यह स्थान चुनें। चर्चा-विमर्श के सत्र चलते रहे। विद्यार्थी और शोधार्थी आएँ।

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