कहा जा रहे हैं हम?

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देवांशु झा

दिल्ली। पिछले कुछ दिनों से मैं ओटीटी प्लैटफॉर्म पर सक्रिय हूॅं। पढ़ाई-लिखाई बंद है। केवल फिल्में और सीरीज देख रहा हूॅं। देखने की यह क्रिया किसी मनोरंजन की चाह से चालित नहीं है बल्कि इस चाह से चालित है कि सिनेमा जगत का यह आम प्लैटफॉर्म हमें क्या परोस रहा है। मेरा बड़ा स्पष्ट मत है कि समाज साहित्य से बहुत कम ग्रहण करता है, सिनेमा से बहुत अधिक लेता है। साहित्य का प्रभाव आंशिक है और सिनेमा का प्रभाव बहुल है, बहुआयामी भी है। सिनेमा एक चलता-फिरता, बोलता, हॅंसता, नाचता गाता, दुख-सुख के साक्षात कराता माध्यम है।‌ कहा जा सकता है कि आम आदमी वहाॅं अपने जीवन के प्रतिबिम्ब देख लेता है। इसलिए वहाॅं से बहुत कुछ सीखता है। जीवन में उतारता है।

बीते दिनों सिया और केतन अग्रवाल वाली घटना हुई। स्त्री यौनिकता और अपराध में आए बेहिसाब उछाल ने मुझे बार-बार आश्वस्त किया है कि वे इस पटल से बहुत कुछ पा रही हैं। मैंने ऐसी-ऐसी शृंखलाएं देखीं कि उन्हें देखकर हिल उठा हूॅं। एक स्त्री अपने ही परिवार के अनेकानेक पुरुषों से यौन सम्बन्ध बना रही। पति को मारने की योजना बना रही। संभोग के आसनों पर खुलेआम चर्चा हो रही। जिन गालियों को हमने बीते समय के सिनेमा में कभी नहीं सुना, वे धाराप्रवाह दी जा रहीं। हिंसा के भयावह दृश्य आम हैं। गला काटना, चाकू गोदना,चेहरे पर पत्थर से वार कर उसे विकृत कर देना तो अति साधारण हैं। भल्लभल्ल बहता हुआ खून, धॅंसा हुआ छुरा, सेक्स के भांति-भांति के दृश्य, इनके बिना फिल्में नहीं बनतीं। कहने को वे समाज का सच दिखला रहे हैं।

मैं मानता हूॅं कि भारतीय समाज पर वज्रपात हुआ है। इस प्लैटफॉर्म पर फिल्मों और शृंखलाओं की बाढ़ है। यह एक तरह का सम्मोहक संसार है जो आम जन-विशेषकर युवा को अपनी ओर खींचता है। ब्रेनवाश करता है। किसी गांजा, सुल्फा और शराब की तरह है। लत लग गई तो छूट नहीं सकती। भारत की सामाजिक व्यवस्था पहले से बिखरने की ओर है। शिक्षा व्यवस्था की दुर्गति है। परिवार टूट रहे हैं। सम्बन्धों की गरिमा नष्ट हो रही है। हमारे मौलिक अधिकार स्वच्छंदता से चालित हैं। यह मनुष्य का स्वातंत्र्य बोध नहीं है बल्कि स्वच्छंद होने के लिए कुछ भी कर गुजरने का उन्माद है। विवेकशून्यता बढ़ती जा रही है और सहनशीलता घटती चली जा रही। धर्म और धीरज विलुप्त होता जा रहा है। एक तरह से देखा जाय तो हम विराट दिग्भ्रम में हैं।‌ ऐसे में यह प्लैटफॉर्म हमें भोगवाद का रास्ता दिखला रहा है। विकृत उल्लास, क्षणिकता, पा लेने का पागलपन, कामना के लिए कुछ भी कर गुजरने की वहशत।
यह भारतीय जीवनधारा को कुछ इस तरह से गंदला कर रहा है कि हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते। स्त्री जीवन का त्याग अब अपराध है। वह केवल शोषण है! उस शोषण के विरुद्ध वे उठ खड़ी हुई हैं। उन्हें वह सब चाहिए जो पहले कुछ पुरुष प्राप्त करते रहे थे। वे होड़ ले रहीं। पछाड़ रहीं। अपराध के नए-नए तरीके खोज रहीं। इस सिने जगत से सीख रहीं। जीवन में उतार रहीं और एक आविष्कार के साथ सिने जगत को सौंप रहीं। अब दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यह लेन-देन आपसी सहमति से हो रहा है। यह भारतीय समाज का सबसे बड़ा संकट है। मेरी दृष्टि में इससे बड़ा संकट दूसरा नहीं है। यह तो रीढ़ पर वार है।

मुझे ध्यान आता है-आज से तीन-चार दशक पहले तक सिनेमा का संसार दूरस्थ हुआ करता था। वह अलभ्य था। हमारे लिए हीरो-हीरोइन अप्राप्य लोग थे। समानांतर सिनेमा संभवतः अधिक रियल था परन्तु उसके दर्शक कम थे। वह अपने समस्त एजेंडावाद के साथ भी इतना आक्रामक नहीं था। इतना स्थूल, वीभत्स और नंगा तो कभी नहीं था। अब सिनेमा सहज है। सूचना क्रांति ने सबको स्टार बना डाला है। हर रील बनाने वाला छोटे लेवल का स्टार है। उसके फालोवर्स हैं।‌ सिनेमा का जादू खत्म हो गया। सिनेमा जीवन का हिस्सा हो गया। उदाहरण के लिए आज के वैवाहिक कार्यक्रम देख लीजिए। वहाॅं प्री-वेडिंग शूट में कैसी बेहया नौटंकियां होती हैं। सब कुछ सिनेमैटिक है। सब कुछ सिनेमैटिक है तो जीवन में भी सिनेमा होना चाहिए। जीवन जब सिनेमा हो जाता है तब सनसनी को पहले चुनता है। मनोहर कहानियाॅं के पाठक अधिक होते हैं। आम आदमी की चेतना ऊर्ध्वमुखी नहीं होती। बहुत साधारण सी बात है कि इस सस्ती लोकप्रियता ने उन्हें निर्बंध किया। सारे तटबंध टूटने लगे। दबी छुपी इच्छाएं कुछ इस तरह से लहराने लगीं कि बहुत कुछ लीलने लगीं। एक मूर्ख और कुपढ़ समाज इस वासना के पाश में जकड़ता चला गया। उसने इच्छापूर्ति को अंतिम सत्य माना। सिनेमा ने उसे रास्ता दिखलाया वह उस रास्ते पर दनदनाकर बढ़ने लगा। Inspiration of life !

मैं देख रहा हूॅं कि भारतीय समाज में व्याप रही इस व्याधि पर हमारा बौद्धिक जगत चुप है। इक्के-दुक्के लोग सोशल मीडिया पर लिखते हैं। परन्तु वृहत्तर जगत में सन्नाटा है। मैं इस सन्नाटे पर विस्मित हूॅं। अपराध का सामान्य हो जाना, स्त्रियों का निर्लज्ज होकर उस कीचड़ में उतर जाना, कुत्ते-बिल्लियों की तरह जोड़ी बदलना, विवाह विच्छेद करना, पार्टनर की हत्या करना ये सब बहुत साधारण बातें हैं। यह केवल स्त्रियों तक सीमित नहीं है बल्कि पुरुष तो इसमें पहले से रमे हुए हैं। अपराध के जगत में पहले अधिकांश पुरुष हुआ करते थे अब स्त्रियाॅं बराबर का टक्कर दे रहीं हैं। बल्कि पछाड़ रही हैं। इसलिए यह विचलित करने वाला सत्य है। हमारे बौद्धिकों के लिए यह सब स्त्री स्वातंत्र्य का स्वर्णिम काल है।

कला और साहित्य का संसार सर्वसामान्य के लिए नहीं होता है। सभी उस संसार में प्रवेश नहीं कर सकते। परन्तु जब उसका वैशिष्ट्य बुझ जाता है तब कचरा फैलता है। एक वाचाल कचरा! वही वाचालता है। हर आदमी स्टार है। वह फिल्म देखता है तो अपनी फिल्म बनाता भी है। वह फिल्मों की नकल करता है। हर आदमी लेखक भी है। इसी पटल पर दर्जन भर से अधिक लोगों को पिछले पांच-सात वर्षों में गर्जना करते हुए सुना: मैं हूॅं लेखक! उसने चेले चपाटों के उत्साहवर्धन से खुद को अगला प्रेमचंद, रेणु तक घोषित कर डाला। फिर उस घोषणा के खतरे भी बड़े हो गए।‌उसकी देखा-देखी में कई प्रेमचंद प्रकट हो गए। सिनेमा के संसार में यह दुगनी तिगनी गति और गहनता से हुआ।‌ हम सभी सिनेमाकार, अभिनेता, अभिनेत्री हो गए फिर तो हमें वही करना था जो असली सिनेमा वाले परदे पर कर रहे थे। ध्यान रहे! इस घालमेल से स्त्रियां पीछे नहीं लौट रहीं। आगे बढ़ रही हैं। उसके सामने आगे बढ़ती आधुनिक स्त्रियों का चमकीला संसार है।‌ वे परदे पर स्वयं को उघाड़ती, सेक्स करती, सेक्स मांगती, पार्टनर बदलती, हत्या करती महिलाओं को देख रही हैं।

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