दिल्ली । भारत की सभ्यता का मूल स्वभाव समावेशी रहा है। यहां विविधताओं को मिटाने का नहीं, उन्हें एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना में समाहित करने का प्रयास किया गया। यही कारण है कि हजारों वर्षों से विभिन्न आस्थाएं, भाषाएं, जातीय समूह और सांस्कृतिक परंपराएं इस भूमि पर साथ-साथ विकसित होती रही हैं। भारतीय मुसलमान भी इसी ऐतिहासिक प्रवाह का अभिन्न अंग हैं। वे केवल एक धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय विकास यात्रा के महत्वपूर्ण सहभागी हैं। इसलिए भारतीय मुसलमानों का प्रश्न केवल किसी समुदाय विशेष का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक एकता, राष्ट्रीय आत्मविश्वास और भविष्य की दिशा से जुड़ा हुआ विषय है।
स्वतंत्रता और विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों के सामने एक जटिल परिस्थिति उत्पन्न हुई। एक ओर उन्हें नए भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निर्धारित करनी थी, दूसरी ओर विभाजन की त्रासदी से उपजे संदेहों और राजनीतिक व्याख्याओं का सामना भी करना था। दुर्भाग्यवश आने वाले दशकों में मुस्लिम समाज को विकास, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से देखने के बजाय अक्सर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा गया। चुनावी राजनीति ने समुदाय को अधिकारों के नाम पर संबोधित तो किया, किंतु शिक्षा, आर्थिक सशक्तीकरण, बौद्धिक नेतृत्व और सामाजिक सुधार जैसे मूलभूत प्रश्न अपेक्षित प्राथमिकता प्राप्त नहीं कर सके। परिणामस्वरूप समुदाय का एक बड़ा वर्ग विकास की मुख्यधारा से अपेक्षित गति से नहीं जुड़ पाया।
आज भी भारतीय मुसलमानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि समाज उनके बारे में क्या सोचता है, बल्कि यह है कि वे स्वयं अपने भविष्य की कैसी कल्पना करते हैं। क्या उनकी ऊर्जा अतीत की पीड़ाओंऔर शिकायतों में व्यतीत होगी या भविष्य की संभावनाओं को गढ़ने में? क्या वे अपनी पहचान को केवल राजनीतिक विमर्श का विषय बनाए रखेंगे या उसे ज्ञान, कौशल, उद्यमिता और राष्ट्र निर्माण की शक्ति में परिवर्तित करेंगे? किसी भी समाज की प्रगति अंततः उसके आत्मविश्वास, आत्मचिंतन और आत्मसुधार की क्षमता पर निर्भर करती है।
इसी संदर्भ में पिछले दो दशकों के दौरान संवाद की एक ऐसी धारा विकसित हुई जिसने परस्पर दूरी को कम करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में इंद्रेशकुमार का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने मुसलमानों को किसी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी या राजनीतिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि भारत की साझी राष्ट्रीय चेतना के अंग के रूप में देखने और उनसे सीधे संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। उनका मानना रहा कि अविश्वास का समाधान आरोपों में नहीं, संवाद में है; दूरी का समाधान बहिष्कार में नहीं, सहभागिता में है; और राष्ट्रीय एकता का आधार एक-दूसरे को समझने की इच्छा में निहित है।
इसी सोच के साथ उन्होंने देशभर में मुस्लिम बुद्धिजीवियों, उलेमाओं, शिक्
इंद्रेश कुमार द्वारा प्रस्तुत सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओंमें से एक “हुब्बुल वतनी” अर्थात मातृभूमि के प्रति प्रेम की अवधारणा है। इस्लामी परंपरा में भी अपने वतन, अपनी भूमि और अपने समाज के प्रति प्रेम को एक महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य माना गया है। उन्होंने इसी विचार को भारतीय संदर्भ में पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। उनका तर्क था कि भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रीय निष्ठा और उनकी धार्मिक पहचान परस्पर विरोधी नहीं हैं। भारत के प्रति प्रेम, उसकी एकता और अखंडता के प्रति समर्पण तथा उसके विकास में सक्रिय भागीदारी किसी भी भारतीय मुसलमान की पहचान का स्वाभाविक हिस्सा हो सकती है। “हुब्बुल वतनी” को उन्होंने केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय मुसलमानों और व्यापक भारतीय समाज के बीच विश्वास का सेतु बनाने वाली अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया।
वास्तव में यह अवधारणा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संवाद को वैचारिक बहसों से निकालकर साझा उत्तरदायित्व की भूमि पर खड़ा करती है। जब कोई व्यक्ति स्वयं को सबसे पहले अपने देश, अपने समाज और अपने भविष्य से जोड़कर देखता है, तब उसके लिए मतभेद संघर्ष का कारण नहीं बनते, बल्कि संवाद का अवसर बनते हैं। यही वह बिंदु है जहां इंद्रेशकुमार के प्रयास मुसलमानों के साथ उनके संवाद को एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श में परिवर्तित करते दिखाई देते हैं।
यदि भूतकाल और वर्तमान की तुलना की जाए तो स्पष्ट होता है कि कभी जो संबंध मुख्यतः आशंकाओं और दूरी से परिभाषित होते थे, उनमें अब संवाद और संपर्क के नए आयाम विकसित हुए हैं। पहले दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष संवाद के अवसर सीमित थे और धारणाएं अक्सर राजनीतिक या वैचारिक मध्यस्थों के माध्यम से निर्मित होती थीं। आज परिस्थितियां पूरी तरह आदर्श नहीं हैं, लेकिन पहले की तुलना में कहीं अधिक खुली हैं। अनेक मुस्लिम बुद्धिजीवी, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक सक्रियता से अपनी बात रख रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा, अधिकार और सामाजिक भागीदारी जैसे विषयों पर भी व्यापक चर्चा संभव हुई है।
भविष्य की दृष्टि से यह प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत की प्रगति केवल आर्थिक विकास से सुनिश्चित नहीं होगी; उसके लिए सामाजिक विश्वास, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय एकात्मता भी उतनी ही आवश्यक है। भारतीय मुसलमानों के पास युवा शक्ति, बौद्धिक क्षमता, सांस्कृतिक समृद्धि और सामाजिक ऊर्जा का विशाल भंडार है। यदि यह शक्ति शिक्षा, नवाचार, उद्यमिता, सामा
आज आवश्यकता किसी समुदाय को राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देने की नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उसकी क्षमता और योगदान को पहचानने की है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि संवाद की प्रक्रिया निरंतर चलती रहे, क्योंकि संवाद ही वह माध्यम है जो पूर्वाग्रहों को समझ में, दूरी को विश्वास में और संदेह को साझेदारी में बदलता है। इंद्रेश कुमार के प्रयासों का महत्व इसी तथ्य में निहित है कि उन्होंने मुसलमानों के साथ संबंधों को राजनीतिक विवादों के दायरे से निकालकर राष्ट्रीय सहभागिता और सामाजिक समरसता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को साझा राष्ट्रीय चेतना में रूपांतरित करने की क्षमता में निहित है। “हुब्बुल वतनी” की भावना, संवाद की संस्कृति और साझी जिम्मेदारी का बोध ये तीनों मिलकर उस भारत का निर्माण कर सकते हैं जहां मुसलमान केवल एक समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति और भविष्य के सहनिर्माता के रूप में अपनी पूर्ण भूमिका निभाएं। यही वह दिशा है जिसमें अतीत की दूरियां भविष्य की संभावनाओं में बदल सकती हैं और यही वह मार्ग है जो भारत की एकता को अधिक गहरा, अधिक स्थायी और अधिक सशक्त बना सकता है।
(लेखक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय और साहित्यकार है)



