मनोज श्रीवास्तव
भोपाल । यदि किसी मंदिर, ट्रस्ट या धार्मिक संस्था में आर्थिक अनियमितताओं की आशंका हो तो उसकी जाँच होना न केवल उचित बल्कि अनिवार्य है। सार्वजनिक धन, सार्वजनिक विश्वास और सार्वजनिक उत्तरदायित्व—तीनों लोकतांत्रिक समाज के मूलाधार हैं। समस्या जाँच में नहीं है; समस्या उस क्षण आरम्भ होती है जब जाँच न्यायिक प्रक्रिया से निकलकर मीडिया-निर्मित नैतिक रंगमंच में प्रवेश कर जाती है।
वहाँ तथ्य धीरे-धीरे गौण होने लगते हैं और प्रतीक प्रधान हो जाते हैं।
विडम्बना यह है कि जिन लोगों को मंदिर के वित्तीय प्रबन्धन से वास्तविक सरोकार होना चाहिए, वे सबसे कम सुने जाते हैं; और जिनका सरोकार दशकों से मंदिर के तर्क या अस्तित्व के नकार से ही रहा, वे पारदर्शिता के सबसे बड़े पुरोहित बनकर मंच पर अवतरित हो जाते हैं।
यह भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक विचित्र नाटकीयता है।
मैं इसे “symbolic overloading” कह सकता हूँ —जब किसी संस्था पर इतने अर्थ आरोपित कर दिए जाएँ कि वास्तविक प्रश्नों का भार उन अर्थों के नीचे दब जाए। मंदिर में यदि कोई आर्थिक प्रश्न उठता है तो उसका उत्तर लेखा-परीक्षा, दस्तावेज़, रसीद और कानूनी प्रक्रिया में खोजा जाना चाहिए। परन्तु भारत का टेलीविजन कैमरा बैलेंस शीट नहीं पढ़ता; वह चेहरे पढ़ता है। उसे अकाउंटिंग नहीं, आक्रोश चाहिए। उसे तथ्य नहीं, फ्रेम चाहिए।
और फ्रेम बन चुका है।
एक ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि मंदिर पर प्रश्न उठाना स्वयं आस्था पर प्रश्न उठाना है। दूसरी ओर वे लोग हैं जो किसी भी प्रशासनिक त्रुटि को सम्पूर्ण आन्दोलन की नैतिक पराजय सिद्ध करने पर उतारू हैं।
दोनों पक्षों में एक समानता है।
दोनों को सत्य से अधिक आख्यान प्रिय है।
फ्रांसीसी चिन्तक रोलाँ बार्थ ने मिथकों के बारे में लिखा था कि आधुनिक समाज भी मिथक बनाता है, केवल देवताओं के नहीं बल्कि विचारों और प्रतीकों के। वह मंदिर आधुनिक भारत का एक ऐसा ही मिथकीय-राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। इसलिए उसके सम्बन्ध में उठने वाला हर प्रश्न अपनी वास्तविक सीमा से बाहर निकल जाता है।
यदि किसी स्थानीय विद्यालय के ट्रस्ट में अनियमितता का आरोप लगे तो वह विद्यालय-स्तरीय समाचार रहेगा। परन्तु उस मंदिर में ऐसा आरोप लगे तो वह राष्ट्रीय सांस्कृतिक युद्ध का मोर्चा बन जाता है।
यहीं से विवेक का ह्रास आरम्भ होता है।
इस पूरे प्रसंग का सबसे रोचक पक्ष वह नैतिक रूपान्तरण है जो सार्वजनिक क्षेत्र में दिखाई देता है। जिन व्यक्तियों या समूहों ने कभी उस आन्दोलन को सांप्रदायिक, प्रतिगामी या अनावश्यक कहा था, वे आज श्रद्धालुओं की भावनाओं के सबसे बड़े संरक्षक के रूप में सामने आते दिखाई देते हैं। यह दृश्य कुछ वैसा ही है जैसे किसी शास्त्रीय संगीत समारोह के आजीवन विरोधी अचानक राग दरबारी की शुद्धता पर आँसू बहाने लगें।
भारतीय मीडिया का एक संकट यह भी है कि वह समाचार को न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प समझने लगा है।
SIT गठित हुई है तो उसका कार्य तथ्य जुटाना है। न्यायालय का कार्य उनका मूल्यांकन करना है। परन्तु हमारे यहाँ शाम आठ बजे का एंकर कई बार स्वयं पुलिस अधिकारी, अभियोजक, न्यायाधीश और दण्डाधिकारी—सभी की भूमिकाएँ एक साथ निभाने लगता है।
जिस देश में न्यायालयों को निर्णय देने में वर्षों लगते हैं, वहाँ टेलीविजन स्टूडियो बीस मिनट में नैतिक फाँसी सुना देते हैं।
और फिर अगले सप्ताह किसी नए विषय की ओर बढ़ जाते हैं।
पीछे रह जाता है केवल अविश्वास।
यदि वास्तव में दान के दुरुपयोग की आशंका है तो उसके लिए कठोरतम जाँच होनी चाहिए। यदि आरोप असत्य हैं तो उतनी ही कठोरता से उनका खण्डन होना चाहिए। परन्तु दोनों स्थितियों में केन्द्रबिन्दु संस्था की प्रशासनिक जवाबदेही होनी चाहिए, न कि करोड़ों लोगों की आस्था का सामूहिक अभियोजन।
आस्था कोई बैंक खाता नहीं कि किसी ट्रस्ट की त्रुटि से स्वतः शून्य हो जाए।
यदि किसी विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार हो जाए तो ज्ञान की अवधारणा अमान्य नहीं हो जाती। यदि किसी अस्पताल में वित्तीय घोटाला हो जाए तो चिकित्सा-विज्ञान समाप्त नहीं हो जाता। उसी प्रकार यदि किसी धार्मिक संस्था में प्रशासनिक दोष सिद्ध भी हो जाएँ, तो उससे उस धर्म के आध्यात्मिक या सांस्कृतिक मूल्य स्वतः निरस्त नहीं हो जाते।
परन्तु आधुनिक मीडिया का स्वभाव सूक्ष्मता से घबराना है।
उसे या तो देवदूत चाहिए या दानव।
मनुष्य उसे स्वीकार नहीं।
अन्ततः यह विवाद राममंदिर से अधिक भारत के सार्वजनिक विवेक की परीक्षा है।
क्या हम जाँच और निन्दा में अन्तर कर सकते हैं?
क्या हम आस्था और प्रशासन को अलग-अलग स्तरों पर समझ सकते हैं?
क्या हम किसी संस्था से प्रश्न पूछते समय सम्पूर्ण समुदाय को कठघरे में खड़ा करने की प्रवृत्ति से बच सकते हैं?
और क्या हम मीडिया द्वारा निर्मित नैतिक उन्माद के स्थान पर विधिक प्रक्रिया की प्रतीक्षा करने का धैर्य रखते हैं?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो यह विवाद भारतीय लोकतन्त्र को परिपक्व बनाएगा।
यदि उत्तर “नहीं” है, तो फिर वही होगा जो आजकल प्रायः होता है—कुछ लोग उस के नाम पर राजनीति करेंगे, कुछ लोग उस के विरोध के नाम पर राजनीति करेंगे, कुछ लोग पारदर्शिता के नाम पर अवसरवाद करेंगे, और कुछ लोग आस्था के नाम पर हर प्रश्न को दबाने की कोशिश करेंगे।
शोर सबका होगा।
सत्य किसी कोने में बैठा अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रहेगा।
और भारतीय समाज, जो कभी श्रुति और स्मृति की सूक्ष्म परम्पराओं का उत्तराधिकारी था, प्राइम-टाइम की चीखों में यह भूलता जाएगा कि न्याय का पहला नियम निर्णय नहीं, बल्कि परीक्षण है; और आस्था का पहला नियम अन्धता नहीं, बल्कि धैर्य।
इस प्रसंग का वास्तविक प्रश्न शायद यही है—क्या हम मंदिर के बारे में उसके आदर्शों के अनुरूप चर्चा कर सकते हैं, या हम भी उसी कोलाहल का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ हर व्यक्ति अपने-अपने लघु कुरुक्षेत्र में खड़ा है और सत्य की नहीं, केवल अपनी विजय की कामना करता है?
कोई भी आस्था संस्थागतउत्तरदायित्व से ऊपर नहीं हो सकती। परन्तु प्रश्न यह है कि जब भारत में सैकड़ों धार्मिक संस्थानों, ट्रस्टों और मंदिरों के संदर्भ में विवाद उत्पन्न होते हैं, तब यही घटना राष्ट्रीय विमर्श का एकांत केंद्र क्यों बन जाती है?
जो लोग वर्षों तक यह कहते रहे कि मंदिर आधुनिक भारत की प्राथमिकता नहीं है, वही लोग अचानक उसके प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय के सबसे सतर्क निरीक्षक बन जाते हैं। जिनके लिए कभी मंदिर का निर्माण ही अनावश्यक था, वे अब मंदिर प्रबंधन की शुचिता के सबसे मुखर प्रवक्ता बनकर सामने आते हैं। निस्संदेह नागरिक समाज में यह उनका अधिकार है; परन्तु समाजशास्त्र का कार्य अधिकार की वैधता पर नहीं, व्यवहार की संरचना पर विचार करना है।
और व्यवहार एक रोचक संकेत देता है।
कोई भी धार्मिक संस्था जाँच से ऊपर नहीं हो सकती; परन्तु किसी संस्था की संभावित त्रुटि को करोड़ों लोगों की आस्था के विरुद्ध अभियोगपत्र में बदल देना भी उतना ही अनुचित है।
कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है मानो कुछ लोगों को विवाद से अधिक उस विवाद के प्रतीकात्मक उपयोग में रुचि हो।
मीडिया-ट्रायल इस प्रवृत्ति को और गहरा करता है।
न्यायालय प्रमाण खोजता है।
जाँच एजेंसी दस्तावेज़ खोजती है।
मीडिया कथा खोजता है।
और कथा जितनी नाटकीय होगी, उतनी सफल मानी जाएगी।
इसलिए कई बार आरोप स्वयं समाचार से अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है। आरोप सिद्ध हुआ या नहीं, यह बाद का प्रश्न हो जाता है। सार्वजनिक स्मृति में केवल यह दर्ज रह जाता है कि “कुछ हुआ था।”
आधुनिक संचार व्यवस्था का यही सबसे बड़ा संकट है।
प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने के लिए दोषसिद्धि आवश्यक नहीं रह गई; केवल संदेह पर्याप्त है।
यहीं पर समाज को विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है।
यदि वास्तव में कोई वित्तीय अनियमितता हुई है, तो उसकी कठोर जाँच होनी चाहिए। यदि आरोप असत्य हैं, तो उन्हें भी उतनी ही स्पष्टता से निरस्त किया जाना चाहिए। परन्तु दोनों ही स्थितियों में न्यायिक प्रक्रिया को मीडिया-न्याय का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।
भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है।
अंततः प्रश्न मंदिर का नहीं है।
प्रश्न यह है कि क्या भारत अपने सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीकों के बारे में संतुलित भाषा में बात कर सकता है?
क्या हम जाँच और विद्वेष के बीच अंतर कर सकते हैं?
क्या हम उत्तरदायित्व और उपहास के बीच भेद कर सकते हैं?
क्या हम यह समझ सकते हैं कि किसी धार्मिक संस्था की प्रशासनिक आलोचना और उस धर्म की सांस्कृतिक अस्मिता पर आक्रमण एक ही बात नहीं हैं?
यदि हम ऐसा कर सके, तो यह विवाद लोकतांत्रिक परिपक्वता का अवसर बनेगा।
यदि नहीं, तो फिर वही होगा जो अक्सर होता है—कुछ लोग हर प्रश्न को षड्यंत्र कहेंगे, कुछ लोग हर आरोप को अंतिम सत्य मान लेंगे, मीडिया शोर मचाएगा, राजनीतिक दल लाभ-हानि की गणना करेंगे, और वास्तविक तथ्य कहीं पीछे छूट जाएगा।
वह केवल भारतीय सार्वजनिक जीवन की उस पुरानी बीमारी का एक और लक्षण होगा जिसमें प्रतीक तथ्य पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, और कोलाहल सत्य से अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है।



