प्रखर शर्मा
दिल्ली। ‘दि ओडिसी’ की कथा मुख्य पात्र ओडिशियस के राजभवन से शुरू होती है, जहाँ कई विलासी आगंतुकों ने अपना डेरा डाल रखा है। वे सभी इस लालच में वहाँ जमे हैं कि किसी तरह यह साम्राज्य उन्हें मिल जाए। ओडिशियस समुद्र के रास्ते ‘ट्रॉय’ के युद्ध में गया था और लगभग 20 वर्षों से वापस नहीं लौटा है। भवन में ओडिशियस की उदात्त चरित्र वाली पत्नी (पेनेलोपे) मौजूद है, और वे अय्याश आगंतुक इस आस में टिके हैं कि रानी उनमें से किसी एक से विवाह कर ले। यहाँ विडंबना यह है कि रानी न चाहते हुए भी इन अय्याशों की खातिरदारी करने के लिए विवश है, क्योंकि ज्यूस (देवताओं के राजा) का नियम है कि द्वार पर आए अतिथि का आदर-सत्कार होना ही चाहिए—आगंतुक के वेश में देवता भी हो सकते हैं।
आगे हम देखते हैं कि ओडिशियस की पत्नी और उसके बेटे (टेलीमैकस) के बीच संवाद होता है, जहाँ वह बेटे को समझाती है कि अभी उसमें राज्य सँभालने की परिपक्वता नहीं आई है। माता की इस बात से व्यथित होकर बेटा स्पार्टा जाने का मन बनाता है, क्योंकि स्पार्टा में कई ऐसे योद्धा हैं जो ट्रॉय को नेस्तनाबूद करने के बाद लौटे हैं। वहाँ उसे राजा और उनके परिजन मिलते हैं, जो ट्रॉय की तबाही की गाथा सुनाते हैं। वे उस काष्ठ-अश्व का ज़िक्र करते हैं, जिसके भीतर छिपकर उन्होंने ट्रॉय की प्राचीर में प्रवेश किया था और वहाँ की जनता का बेदर्दी से संहार किया था। प्रकारांतर से यह स्पष्ट होता है कि यह विनाशकारी युद्ध विश्व की सबसे सुंदर स्त्री ‘हेलेना’ के लिए लड़ा गया था। एक स्त्री के लिए इतना बड़ा संहार! जहाँ न बच्चे बख्शे गए, न स्त्रियाँ। इस निरर्थक हिंसा पर एक शायर की पंक्तियाँ याद आती हैं—
मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा
तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा
आगे चलकर इस विभीषिका और निरर्थक रक्तपात का गहरा पश्चाताप स्वयं ओडिशियस को भी होता है।
युद्ध विजय के बाद सभी योद्धा समुद्र के रास्ते अपने-अपने घरों की ओर रवाना होते हैं, और यहीं से कथा के मूल दार्शनिक संदेश की शुरुआत होती है। उस दौर में सीमित संसाधनों के कारण समुद्री मार्ग अत्यंत भयानक और चुनौतीपूर्ण होते थे। ओडिशियस और उसके सैनिक जब इथाका (अपने राज्य) की ओर बढ़ते हैं, तो मार्ग में उन्हें जीवन के कड़वे सत्यों से रूबरू होना पड़ता है। यात्रा में आने वाले अतिमानव और दैत्य दरअसल जीवन की विकट कठिनाइयों और मानसिक व्याधियों के प्रतीक हैं। सफ़र के दौरान ओडिशियस को मृत आत्माओं से संवाद का अवसर मिलता है, जहाँ युद्ध में मारे गए योद्धा उसे जीवन का गूढ़ ज्ञान देते हैं। वे उसे सचेत करते हैं कि जब तुम अपने राज्य पहुँचो, तो छद्म वेष बनाकर जाना; पहले अपनी पत्नी की निष्ठा को परखना, फिर अपना भेद खोलना।
इस पूरे महाकाव्यात्मक आख्यान में ओडिशियस के चरित्र और उसकी यात्रा को आकार देने में ‘नियति’ की सर्वोपरि भूमिका है। ओडिशियस का अपना परिवार छोड़कर ट्रॉय युद्ध में जाना महज़ उसकी व्यक्तिगत आकांक्षा नहीं थी, बल्कि नियति द्वारा तय किया गया एक ऐसा पथ था जिसे टाला नहीं जा सकता था। युद्ध के बाद ओडिशियस जब दस वर्षों तक भटकता है और कैलिप्सो (द्वीप की महिला) के निष्काम प्रेम व अमरता के आकर्षण में बंधता है, तब भी अंततः वह स्वयं को नियति के हाथों ही सौंप देता है और अपने देश की ओर बढ़ चलता है। ओडिशियस को यह गहरा बोध है कि मनुष्य कितना भी पराक्रमी क्यों न हो, वह नियति-चक्र से परे नहीं हो सकता। नियति ही उसे एक क्रूर योद्धा से एक संवेदनशील और चेतनावान मनुष्य में रूपांतरित करती है। जैसा कि कथा में संवाद भी आता है—“जो हमारी नियति में है वह हमें ज़रूर मिलता है और जो हमारी नियति में नहीं है वह हमें मिल भी जाए, फिर भी हमसे छूट जाता है।”
इस कठिन यात्रा में ओडिशियस के कई साथी एक-एक कर मारे जाते हैं और अंततः एक प्रचंड तूफ़ान में सभी की मृत्यु हो जाती है। केवल ओडिशियस अधमरी हालत में एक अनजान तट (द्वीप) पर लगता है। वहाँ की एक महिला (कैलिप्सो) उसकी सेवा-शुश्रूषा कर उसे नवजीवन देती है और उससे अगाध प्रेम करने लगती है। किंतु, याददाश्त लौटने पर ओडिशियस उसे छोड़कर पुनः अपने राज्य लौट आता है। इसके बाद उस महिला का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। यह बात खटकती भी है कि जिसने तुम्हें नवजीवन दिया, दस वर्षों तक अपने प्रेम की छाँव में रखा, उसके प्रति ऐसी उपेक्षा दुखी करती है। हालाँकि, यह द्वीप की महिला का निष्काम प्रेम ही था जिसने बिना किसी शर्त के ओडिशियस को संरक्षण दिया, जो प्रेम की असीम उदात्तता को दर्शाता है।
यात्रा के अंत तक ओडिशियस को अपने सभी कर्मों के नैतिक-अनैतिक पक्षों का बोध हो जाता है। वह समझता है कि इस विशाल युद्ध को जीतने के बाद भी उसे क्या मिला—समुद्र का भटकाव? निर्दोषों की हत्या का पाप? या अपने सैनिकों को सम्मान न दे पाने वाले एक क्रूर सेनापति का कलंक?
अंततः ओडिशियस अपने राज्य पहुँचकर छद्म वेष में उन सभी अय्याश अनाचारियों का अंत करता है। वह अपने पुत्र को राज्य सौंपता है और अपने दिवंगत साथियों को अंतिम सम्मान देने के उद्देश्य से पुनः सुदूर यात्रा पर निकल जाता है।
समुद्र की भयावह परिस्थितियाँ वास्तव में जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों का रूपक हैं। इन परिस्थितियों से पार पाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति अनिवार्य है। ओडिशियस अपने साथियों से इसी मामले में विशिष्ट है—जहाँ उसके साथी विपत्ति में अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण खो देते हैं, वहीं ओडिशियस स्वयं को साधे रखता है। देवी एथेना उसकी मार्गदर्शिका के रूप में दिखती हैं, जो प्रकारांतर से उसकी अपनी प्रखर इच्छाशक्ति और विवेक का ही प्रतीक हैं।
इस आख्यान में पात्रों के चरित्र में अद्भुत उदात्तता और संवादों में गहरा कसाव है:
ओडिशियस सत्य, धर्म और अपने कर्तव्य के प्रति कटिबद्ध दिखता है।उसकी पत्नी (पेनेलोपे) का चरित्र असीम करुणा और धैर्य का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने पति से दूर रहकर, दुधमुँहे बच्चे को सँभालते हुए बीस वर्षों तक साम्राज्य और अपनी निष्ठा की रक्षा करती है।द्वीप की महिला का प्रेम समर्पण और उदात्तता की पराकाष्ठा है।
क्रिस्टोफर नोलन ने होमर के इस कालजयी महाकाव्य ‘द ओडिसी’ को जिस सिनेमाई संतुलन, भव्यता और गहराई के साथ निर्देशित किया है, वैसा काम पर्दे पर कम ही देखने को मिलता है। उन्होंने नियति और मानवीय संवेदनाओं के इस ताने-बाने को बहुत ही सुंदर ढंग से जीवंत किया है।



