दिल्ली। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के अमरावती केंद्र में हिंदी पत्रकारिता का स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम इस शैक्षणिक सत्र में बंद कर दिया गया है। कारण सीधा है—एक भी छात्र का दाखिला नहीं हुआ। चार वर्ष पहले, 2022 में शुरू हुए इस पाठ्यक्रम की स्वीकृत क्षमता 30 सीटें थी। संस्थान के अनुसार किसी पाठ्यक्रम को चलाने के लिए न्यूनतम 10 छात्रों का होना जरूरी है। इस शर्त के पूरा न होने पर कोर्स रोक दिया गया। जो थोड़े छात्र दाखिला ले चुके थे, उन्हें जम्मू परिसर स्थानांतरित कर दिया गया।
अमरावती केंद्र 2011 में संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय परिसर में पश्चिमी क्षेत्रीय केंद्र के रूप में खुला था। पहले अंग्रेजी पत्रकारिता, फिर 2017 में मराठी और 2022 में हिंदी पाठ्यक्रम शुरू हुए। उद्देश्य विदर्भ के युवाओं को पेशेवर पत्रकारिता प्रशिक्षण देना था। लेकिन 2026-27 के आंकड़े इसके उलट तस्वीर दिखाते हैं। अंग्रेजी पत्रकारिता में 30 सीटों पर शुरू में 9 छात्र आए। दो बाहरी छात्रों को जोड़ने के बाद संख्या 11 हुई। मराठी पत्रकारिता में 30 सीटों पर 10 छात्र दाखिल हुए। हिंदी बंद होने के बाद शेष दो पाठ्यक्रमों में कुल करीब 21 छात्र रह गए, जबकि तीनों पाठ्यक्रमों की कुल स्वीकृत क्षमता 90 थी। खाली सीटें भरने के लिए 13 अगस्त को स्पॉट प्रवेश भी आयोजित किया गया।
देशभर में पत्रकारिता की पढ़ाई को लेकर छात्रों की घटती रुचि की बड़ी वजह सीमित प्लेसमेंट और करियर के अनिश्चित अवसर हैं। मराठी पत्रकारिता के छात्रों के अनुसार, दाखिला रोजगार की उम्मीद में होता है, लेकिन बाद में पर्याप्त प्लेसमेंट सहायता नहीं मिलती। नौकरी के लिए व्यक्तिगत संपर्क और नेटवर्किंग पर निर्भरता बढ़ जाती है। संस्थान की ओर से प्रचार के प्रयास बताए गए हैं। अंग्रेजी और हिंदी प्रवेश सीयूईटी-पीजी पर आधारित हैं, जबकि मराठी में स्थानीय प्रवेश परीक्षा होती है। फिर भी सीटें नहीं भरीं।
इसी समय परिसर विस्तार का काम भी चल रहा है। बडनेरा में 15 एकड़ भूमि पर नया परिसर बन रहा है। अमरावती परिसर के लिए करीब 90 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है, जबकि संस्थान स्तर पर बुनियादी ढांचे के विस्तार का कुल आंकड़ा लगभग 200 करोड़ रुपये का है। विरोधाभास यही है कि भवन बन रहा है, लेकिन कक्षाएं खाली हो रहीं हैं। क्षेत्रीय परिसरों का मूल मकसद स्थानीय भाषा और स्थानीय छात्रों को अवसर देना था। व्यावहारिक स्थिति में कई केंद्रों पर क्षेत्र के छात्र कम या इक्के-दुक्के ही दिखते हैं।
यह घटना केवल एक केंद्र की नहीं है। उर्दू पत्रकारिता जैसे अन्य पाठ्यक्रम भी कम आवेदन के कारण दबाव में रहे हैं। डिजिटल मीडिया, कम वेतन, अनिश्चित नौकरियां और नेटवर्किंग पर निर्भर बाजार ने पारंपरिक पत्रकारिता शिक्षा की मांग घटाई है। हाल में नेपाल के पत्रकारिता छात्रों की शिकायतें नेपाली मीडिया के माध्यम से सामने आईं, जो इसी दिशा में संकेत कर रहीं थीं।
तथ्य यह है कि अमरावती में हिंदी पत्रकारिता इस सत्र में बंद हो चुकी है और शेष पाठ्यक्रम क्षमता से काफी नीचे चल रहे हैं। भवन और सीटें बढ़ाने से पाठ्यक्रम नहीं चलते। चलाने के लिए छात्र, शिक्षक व्यवस्था, प्लेसमेंट और स्थानीय जुड़ाव चाहिए। इनके बिना क्षेत्रीय केंद्र विस्तार का दावा अधूरा रह जाता है।



