जंतर-मंतर के मुखौटों के पीछे का सच !

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : चाहे NEET हो याकि कोई भी एग्जाम हो, जो भी स्टूडेंट्स के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं उन्हें कठोरतम दंड मिलना ही चाहिए। कोई भी दोषी बख़्शे नहीं जाने चाहिए। किसी भी एग्जाम में जालसाज़ी, पेपरलीक जैसे घटनाक्रमों की पुनरावृत्ति कहीं भी नहीं होनी चाहिए। ये सुनिश्चित करने की संपूर्ण जवाबदेही सरकार की है। कोई व्यक्ति हो, संगठन हों। सबको अपनी-अपनी मांगों को लेकर विरोध करना चाहिए। आप इस्तीफा मांगिए। याकि जो भी संविधान सम्मत विरोध के शांतिपूर्ण तरीके हों, उन सबको करिए। ये हमारे लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है। यही भारत है‌। संवाद के रास्ते हमेशा ही खुले होने चाहिए। सरकार का ये उत्तरदायित्व भी है।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि— देश में अराजकता के संगठित कृत्य को आंदोलन कहकर स्वीकार कर लिया जाएगा। भारत के युवाओं को Cockroach कहकर अपमानित करने वाली इंटरनेशनल साज़िशों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। भारत में ‘कॉकरोच शब्द और दिल्ली जंतर-मंतर कनेक्शन’ अब नए संदर्भ में अपरिचित नहीं रह गया है। सबसे पहले कुछ जमूरों ने अमेरिकी में बैठकर – भारत के युवाओं को- भारत के सुप्रीम कोर्ट की ख़िलाफ़त में Cockroach कहा। फिर भाजपा और मोदी विरोध की पटकथा लिखी गई।
जबकि सुप्रीम कोर्ट के CJI जस्टिस सूर्यकांत ने मई 2026 में ये टिप्पणी फर्जी डिग्री के ज़रिए वकालत करने वाले वकीलों पर की थी। इसका उन्होंने स्पष्टीकरण भी दिया था। लेकिन डीप स्टेट ने आम आदमी पार्टी के जमूरों को आगे कर – भारत की न्यायपालिका के ख़िलाफ़ उकसाया। यहीं से Cockroach शब्द को भारत के युवाओं के माथे पर चस्पा करने की योजना को मूर्तरूप दिया गया।

आम आदमी पार्टी का जमूरा – दीपके भारत आया, इधर-उधर प्रदर्शन के लिए गया लेकिन धूप तक बर्दाश्त न कर पाया। तत्पश्चात FCRA के विरोध में सोनम वांगचुक को अमेरिकी मूल की उनकी पत्नी —रेबेका नॉर्मन के ज़रिए प्रोटेस्ट का चेहरा बनाकर ‘जंतर-मंतर’ के मैदान में भूख हड़ताल के लिए उतार दिया गया। जहां इमोशनली-सेंटीमेंट भुनाने के तमाम प्रयोजन रचे जाने लगे। नेपाल और बांग्लादेश जैसे सत्ता की रिजीम चेंज करने का खाका खींचा जाने लगा।

फिर मोदी विरोध के जितने भी इकोसिस्टम वाले चेहरे थे,वो सब बिल से बिलबिलाकर सामने आने लगे। उन्होंने पूरी ताक़त झोंक दी कि कैसे भी करके दिल्ली में शाहीन बाग जैसे दंगे फैलाए जाएं। कन्वर्जन कराने वाले गिरोह के वो लोग जो FCRA की मार से चोटिल थे। उन्होंने जी भर के पैसे बहाए। तमाम PR एजेंसीज हायर की गईं। सेलीब्रिटीज कहे जाने वाले क़ौमी लोग— हिंदुत्व को Smash करने के लिए उतर आए। विदेशी और देशी पैसों से सोशल मीडिया कैंपेन को लॉन्च कर दिया गया। भावुक युवाओं ने भी देखा-सुनी ऐसी तमाम स्टोरीज सोशल मीडिया में शेयर कीं। जबकि इस तथाकथित आंदोलन में शिक्षाविद्, डॉक्टर्स और स्टूडेंट्स कहीं नज़र नहीं आए। अगर स्टूडेंट्स नज़र आए भी तो उन्हें मंच पर कहीं स्थान नहीं मिला। सिर्फ़ कुछ हाईजैकर्स , कॉमेडियन, नेता और भारत विरोधी -हिन्दुत्व विरोधी बातें कहने वाले चेहरे नज़र आए। कंटेंट क्रिएटर्स ही दिखते रहे।

प्रोफेशनल PR STYLE में प्रोटेस्टर्स का जमावड़ा हुआ। AISF, SFI समेत तमाम गद्दार वामपंथियों का इकोसिस्टम एक्टिवेट हुआ। JNU-AMU की तर्ज पर अर्बन नक्सल गिरोह की जिहादी डफली सुनाई देने लगी। LGBTQ का प्रचार-प्रसार किया जाने लगा। हिन्दू घ्रणा का परचम बुलंद किया जाने लगा। लेकिन इन जमूरों में से कोई भूख हड़ताल का साहस न कर पाया जिससे तंग आकर ख़ुद सोनम वांगचुक तक को ये कहना पड़ा कि— “आप लोग यहां आकर ठूंस-ठूंस कर खा रहे हैं, मुझे यह देखकर बहुत दुख होता है।”

इतना ही नहीं ये जंतर-मंतर वाले कॉकरोच – दिन के बाद रात को एसी रूम में जाकर सोते थे।‌पार्टियां करने में जुट जाते थे। फिर अपने रुटीन में जुट जाते थे। अंततोगत्वा 18 जुलाई 2026 को सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। किन्तु ये कॉकरोच, कांग्रेस पार्टी के सहयोग से- सोनम वांगचुक को सरकारी अस्पताल से प्रायवेट अस्पताल में भर्ती कराने की ज़िद पर अड़े। दिल्ली हाईकोर्ट गए। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि- सफदरजंग अस्पताल से कहीं और शिफ्ट करने की ज़रूरत नहीं है। वहां उनकी समुचित देखभाल हो रही है।

20 जुलाई 2026 को बिना परमिशन के संसद मार्च करने का ‘शाहीन बाग-CAA दंगे’ वाली स्टाइल में अभियान चलाया गया। कांग्रेस, AAP समाजवादी पार्टी, भीम-मीम के गठजोड़, लेफ्ट पार्टियां, कन्वर्जन कराने वाले NGO’s, अर्बन नक्सली, ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज, सो-रोस-डीप स्टेट के वालंटियर्स – सब देश के यूथ के कंधों पर बंदूक रखकर उतर आए। सबने भीड़ जुटाने का पर्याप्त प्रबंध किया।

भाजपा और मोदी विरोध के सभी गिरोह एकजुट हुए। भरपूर पैसा बहाया गया। संसद घेरने के लिए भीड़ को उतार दिया गया। जिन क्षेत्रों में ड्रोन प्रतिबंधित थे, वहां शक्ति प्रदर्शन-प्रचार के लिए
ड्रोन कैमरे चलाए गए। कश्मीर की तर्ज़ पर
भीड़ के ज़रिए पुलिस पर संगठित योजना के तहत पथराव कराया गया। पुलिस वालों और महिला पत्रकारों की लिंचिंग की कोशिशें की गईं।
भारत के संविधान ने जिस ‘संसद’ का गठन किया। जो संसद हमारे देश की सांविधानिक आधारशिला है। उसे उखाड़ फेंकने की बातें दुहराई गईं। भारत को ‘नेपाल’ बनाने का कॉकरोचों ने दंभ भरा। ये तब हो रहा था जब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने इनके प्रतिनिधि मंडल को बातचीत के लिए बुलाया और चर्चा की।

आप सोचिए कि- इस संगठित भीड़ ने जो उपद्रव किए क्या ये लोकतांत्रिक कृत्य हैं? क्या ये किसी मांग को मनवाने की बातें हैं? किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन में पत्थरबाजी कहां से होने लगी, अचानक से इतने पत्थर क्या बिना पूर्व तैयारी के आ गए? क्या ये संगठित अराजकता-भारत की लोकतांत्रिक स्थिरता, प्रगति को रोकने के षड्यंत्र नहीं हैं? ये षड्यंत्र उस युवा के सेंटीमेंट्स के ज़रिए लॉन्च किए जा रहे हैं। जो भारत की प्रगति का आधार है। मैं भी युवा हूं और तथाकथित Gen-Z की परिभाषा में भी आता हूं। मेरे आदर्श स्वामी विवेकानंद हैं। स्वातंत्र्य क्रांति के क्रांतिवीर हैं। भगवान राम और कृष्ण हैं। सरकार से हम सबकी अपेक्षाएं हैं। अपनी मांगों और विरोध के हमारे पास सांविधानिक तौर तरीके हैं। अपनी पीड़ा और आक्रोश की अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि कोई भी मुझे भारत की स्थिरता के ख़िलाफ़ बरगला लेगा। क्या कोई भी टूल बनाकर हमें किसी आग में झोंक देगा और हम उसमें कूद पड़ेंगे? ये हम युवाओं को सोचना और समझना चाहिए।

जंतर-मंतर में सोनम वांगचुक को बलि का बकरा बनाकर जिस शातिराना ढंग से ‘भारत घ्रणा-हिन्दू घ्रणा’ का प्रहसन किया गया।उसे इस देश का युवा अच्छी तरह से जानता है। युवा साथियों को इसे और बारीकी से समझना चाहिए। ताकि हम किसी टूलकिट का शिकार न बनें। जंतर-मंतर में जिस तरह से भगवान राम को अपमानित किया गया। भारत की संस्कृति के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया। ब्राह्मणों, हिन्दुत्व को ख़त्म करने का ऐलान किया जाता रहा।RSS के ख़िलाफ़ नारेबाजी की जाती रही। भारतीयता की बात करने वाली ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020’ को ख़त्म करने की जिहादी पोस्टर बनाए गए।नारेबाज़ी की गई।
काफ़िरों के कत्लेआम के लिए फ़ैज़ की ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसा जिहादी ऐलान किया गया। यानी भारत के ‘इस्लामीकरण’ का फतवा जारी किया गया।

क्या ये सब किसी भी हिसाब से जायज़ कहा जाएगा? क्या ये किसी न्याय की लड़ाई थी? पूरे प्रहसन के दौरान जिस तरीक़े से हर दिन भारत द्वेष का विष वमन किया जाता रहा। संविधान और तिरंगे की ओट में छिपकर— भारत के संविधान को चुनौती दी जाती रही। भारत की न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा। संसद को उखाड़ फेंकने के नारे गढ़े गए। भारत को —हिंसा, दंगों की आग में झोंकने के लिए — ‘नेपाल’ बनाने के जो संदेश दिए गए। वो गंभीर हैं। हमारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को खुली चुनौती भी हैं। ये कोरी भावुकता तो कतई नहीं हो सकती। ये निश्चित ही भारत की शक्ति, सामर्थ्य के ख़िलाफ़ एक सुनियोजित साज़िश है। इसमें सत्ता की भूखी राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता भी अव्वल हैं। जो बांग्लादेश और नेपाल हिंसा के बाद वहां हुए तख्तापलट के समय से ही – भारत के युवाओं को हिंसा, उपद्रव के लिए उकसा रहे हैं। कभी वो Gen-Z के नाम पर उकसाते हैं। कभी किसी मुद्दे के नाम पर, लेकिन उनका उद्देश्य है — सत्ता पाना। मोदी को सत्ता से हटाना। इसके लिए ये पार्टियां और नेता – भारत विरोध तक की सीमा पार कर रहे हैं। ऐसे में कॉकरोच के इस लॉन्चिंग पैड के हर छोटे बड़े घटनाक्रम को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है। सुरक्षा व्यवस्था, इंटेलीजेंस से लेकर भारत बोध को लेकर चर्चा आवश्यक है। सरकार और प्रशासन के स्तर पर युवाओं की बातों को सुनने और उन्हें एड्रेस किए जाने की ज़रूरत है। साथ ही ऐसे घटनाक्रमों, आयोजनों—के ज़रिए भारत विरोधी जो नैरेटिव गढ़े गए। उन्हें कतई नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है। ये देश हमारा है, हम इस देश के युवा हैं। हम कॉकरोच तो कतई नहीं हो सकते। जहां कमियां होंगी, उन्हें सुधारेंगे भी
और हर साज़िश का समूल नाश करेंगे।हम अपने देश के प्रगति को शीर्ष पर ले जाएंगे

(लेखक साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार हैं)

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