विपक्ष की सत्ता-लोलुपता: शिक्षा का नाम, कुर्सी का खेल

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दिल्ली। भारतीय विपक्ष आज शिक्षा के नाम पर एक ऐसा नाटक रच रहा है, जिसमें असली पात्र नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ हावी हैं। सोनम वांगचुक का अनशन शुरू में छात्रों की चिंताओं—नीट पेपर लीक, महंगी कोचिंग, छात्र आत्महत्याओं के नाम पर चला। लेकिन जल्द ही यह कथित आंदोलन वामपंथी छात्र संगठनों, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्षी दलों के हाथों में कैद हो गया। अब यह शिक्षा से दूर, मोदी सरकार को कमजोर करने और 2029 की कुर्सी की तैयारी का मंच बन चुका है। कांग्रेस में पवन खेरा जैसे मुंगेरीलाल भी है जो 2026 में ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने का सपना देख रहे हैं।

सोनम वांगचुक अपनी शर्तें 19 जुलाई की देर शाम रख दी हैं, लेकिन उनके कार्यकर्ता और समर्थक अब उनकी बात नहीं सुन रहे। जंतर-मंतर पर संसद घेरने वाली भीड़ में अखिलेश यादव, संजय सिंह, पवन खेड़ा, मनोज झा जैसे नेता चमक रहे हैं। सवाल उठता है—इन नेताओं का शिक्षा से क्या कोई वास्तविक सरोकार है? अखिलेश यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था कितनी बदहाल रही, यह किसी से छिपा नहीं। चंद्रशेखर रावण या संजय सिंह के कितने समर्थक इस समय नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं? इनके समर्थकों का पढ़ाई से उतना ही संबंध है, जितना सचिन तेंदुलकर का कॉकरोच पार्टी से। विपक्षियों को शिक्षा से कुछ लेना देना नहीं है, वे बस मोदी सरकार पर हमला करने का मौका तलाश रहे हैं।

ये ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने’ का इंतजार कर रहे हैं और इनके कार्यकर्ता झांसे में आकर शिक्षा को माध्यम बनाकर इनकी सत्ता वापसी के लिए जमीन तलाश रहे हैं।

वास्तव में, विपक्ष की यह रणनीति पुरानी है। जब भी कोई जन-आंदोलन उभरता है, वे उसे हाइजैक कर लेते हैं। शाहीन बाग के आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन तक, हर बार शिक्षा, किसानी या रोजगार जैसे मुद्दों को राजनीतिक हथियार बनाया गया। सोनम का आंदोलन भी अब उसी राह पर है। राहुल गांधी की दूरी और कांग्रेस समेत दूसरे पार्टियों के नेताओं की सक्रियता साफ बताती है कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन इसे अपना ‘अन्ना मोमेंट’ बनाने की कोशिश में है। लेकिन हकीकत यह है कि परीक्षा सुधार, कोचिंग माफिया पर अंकुश और छात्र कल्याण के ठोस कदमों की बजाय वे केवल धरना, घेराव और बयानबाजी पर उतरे हैं।

शिक्षा एक गंभीर मुद्दा है। पेपर लीक से युवाओं का भविष्य प्रभावित होता है। संजय सिंह और चन्द्रशेखर जैसे नेता जिन्हें पढ़ने लिखने से कभी कोई सरोकार नहीं रहा। इस बात को क्या समझेंगे। इसलिए यह समझना जरूरी है कि जब विपक्ष इसे सत्ता के खिलाफ मोहरा बनाता है, तो असली समाधान दूर हो जाता है। वामपंथी संगठन जो कभी कैंपस में हिंसा और बंद का सहारा लेते थे, जिनकी राजनीति अब देश भर के विश्वविद्यालयों में अप्रासंगिक हो चुकी है। आज ‘छात्र हित’ का चोला ओढ़कर राजनीति कर रहे हैं। उनके मंच सजाने वालों का मकसद स्पष्ट है-सरकार गिराओ, अपनी राजनीति को प्रासंगिक बनाओ।

देश को अब ऐसे विपक्ष की जरूरत नहीं है, जो हर मुद्दे को कुर्सी की लड़ाई बना दे। शिक्षा सुधार की मांग जायज है, लेकिन उसे राजनीतिक हथियार बनाना युवाओं के साथ धोखा है। विपक्ष को समझना चाहिए कि जनता अब ऐसे स्वार्थी खेल पहचान चुकी है। सच्चा आंदोलन शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और रोजगार पर केंद्रित हो, न कि सत्ता के लालच पर।

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