दिल्ली । दिल्ली के जंतर-मंतर पर 23 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प अब दो महीने बाद फिर सुर्खियों में है। विवाद वीडियो बनाने को लेकर शुरू हुआ था। निशु आजाद के पिता संजय कुमार के सिर पर चोट आई। पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में दर्ज एफआईआर में स्वतंत्र भारद्वाज और सूरज कुमार नामजद हैं। पुलिस के अनुसार चोट कड़े से हुई और मेडिकल रिपोर्ट में इसे साधारण बताया गया।
मामला तब गरमाया जब स्वतंत्र भारद्वाज का पॉडकास्ट वायरल हुआ। उसमें उन्होंने निशु के पिता का सिर फोड़ने, धारा 307 लगने और फिर भी जेल न जाने का दावा किया। बाद में उन्होंने कहा कि भीड़ ने उन्हें घेर लिया था और वार आत्मरक्षा में हुआ। यह बयान चौतरफा विरोध का कारण बना। सीजेपी नेताओं और समर्थकों ने संसद मार्ग थाने के बाहर प्रदर्शन किया। पुलिस ने 72 घंटे में गिरफ्तारी का आश्वासन दिया और 4 सितंबर को स्वतंत्र भारद्वाज को बुलंदशहर से हिरासत में ले लिया। मामले में एससी-एसटी अधिनियम जोड़ने की मांग भी उठी।
विरोध जायज है। सार्वजनिक मंच पर हिंसा का दावा करके घूमना कानून की अवहेलना है। सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। मगर दूसरी तरफ के भी दावे कम नहीं हैं। निशु के पिता और समर्थकों के बयानों में भी हिंसा और अन्याय का एकपक्षीय चित्र उभरता है। हिंसक होने के दावे दोनों तरफ से किए जा रहे हैं। पुलिस जांच में पूरा वीडियो फुटेज, गवाहों के बयान और मेडिकल दस्तावेज सामने आने चाहिए। तभी पता चल सकेगा कि झड़प कैसे बढ़ी और वार जानबूझकर था या भीड़भाड़ में हुआ।
असली दिक्कत यह है कि मामला अब सच्चाई और इंसाफ से ज्यादा राजनीतिक हो चला है। विपक्षी नेता, संगठन और सोशल मीडिया इसे अपनी लड़ाई बना रहे हैं। एक तरफ संरक्षण के आरोप लग रहे हैं, दूसरी तरफ जातीय और वैचारिक कोण जोड़े जा रहे हैं। राजनीति में अक्सर न्याय नहीं मिलता, समीकरण बनते हैं। ऐसे माहौल में तथ्यों की जगह नैरेटिव हावी हो जाता है।
कानून दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। बड़बोलापन चाहे किसी का हो, संज्ञान लिया जाना चाहिए। अंतिम फैसला अदालत का होगा, राजनीतिक मंच का नहीं। जब तक जांच निष्पक्ष नहीं रहेगी, यह विवाद सच्चाई की बजाय सियासत का औजार बना रहेगा।



