डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । मध्यकालीन एवं आधुनिक कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ, जनसांख्यिकीय संकट और ‘पंडित’ पहचान का रणनीतिक पुनरुत्थान: दिलीप मंडल के दावों की आलोचनात्मक समीक्षा
भारतीय दर्शन और अध्यात्म के क्षेत्र में कश्मीर का इतिहास एक समय शिखर पर रहा है। वहीं, यह मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक विदेशी आक्रांताओं द्वारा किए गए भीषण सांस्कृतिक दमन और जनसांख्यिकीय उथल-पुथल का भी गवाह है। 14वीं शताब्दी के बाद जब कश्मीर की सत्ता क्रूर सुल्तानों और विदेशी चरमपंथियों (इस्लामिक जिहादियों) के हाथों में गई, तब वहां के मूल हिंदू समाज को विनाशकारी संकट का सामना करना पड़ा।
स्वभाविक है कि ऐसे अंधकार एवं भारी कष्टपूर्ण जीवन में बड़े पैमाने पर हुए नरसंहार, मंदिरों के विध्वंस और बलपूर्वक किए गए धर्म परिवर्तन के कारण कश्मीर की प्राचीन पारंपरिक सामाजिक संरचना छिन्न-भिन्न हो गई थी। इस भयानक दौर में जब हिंदू समाज का अस्तित्व ही पूरी तरह दांव पर लगा था, तब बिखरे हुए समाज को एकजुट करने और आपसी जातिगत दीवारों को ढहाने के लिए एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक प्रयास किया गया।
लोक-परंपराओं, मौखिक इतिहास और कश्मीरी समाज की स्मृतीकृत चेतना में मुगल काल के प्रकांड विद्वान पण्डितराज जगन्नाथ की प्रेरणा और उस समय के दूरदर्शी निर्णयों को एक युगांतकारी मील का पत्थर माना जाता है। इस विमर्श के अनुसार, जब इस्लामी चरमपंथ के कारण गैर-ब्राह्मण जातियां बिखर चुकी थीं, तब संपूर्ण बचे हुए हिंदू समाज को सुरक्षा और गौरव प्रदान करने के लिए ‘पंडित’ सरनेम को एक सामूहिक कवच के रूप में अपनाया गया।
हाल ही में, केंद्र सरकार के वरिष्ठ सलाहकार दिलीप मंडल ने जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक ‘भारत की खोज’ (1946) के हवाले से यह दावा किया कि स्वाधीनता या उसके पूर्व कश्मीर के मुसलमान दोबारा हिंदू (घर वापसी) बनने को तैयार थे, लेकिन बनारस के पंडितों के शुद्धतावादी रुख के कारण यह ऐतिहासिक अवसर खो गया। वस्तुत: यह अध्ययन मध्यकालीन कश्मीर में हुए जिहादी अत्याचारों, सामाजिक विखंडन के साथ-साथ दिलीप मंडल के दावों का एक गहरा अकादमिक प्रतिवाद प्रस्तुत करने का प्रयास है, और यह स्थापित करना है कि इतिहास के विभिन्न झंझावातों में पंडितों ने किस प्रकार हिंदू समाज की रक्षा की है।
मध्यकालीन कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ और जातियों का विखंडन
कश्मीर में हिंदू राजवंशों के पतन के बाद, 14वीं शताब्दी में शाहमीर राजवंश की स्थापना के साथ ही इस्लामी शासन की शुरुआत हुई। इसका सबसे वीभत्स रूप सुल्तान सिकंदर के शासनकाल (1389-1413) में देखने को मिला, जिसे इतिहास में ‘बुतशिकन’ (मूर्तियों को तोड़ने वाला) के नाम से जाना जाता है। सिकंदर ने कश्मीर से सनातन धर्म के अस्तित्व को समूल नष्ट करने का संकल्प लिया था, जिसके लिए उसने राजकीय तंत्र का क्रूरतापूर्वक उपयोग किया।
इतिहासकार जोनराज ने अपनी ‘नूतन राजतरंगिणी’ में लिखा है कि हिंदुओं के सामने तीन ही विकल्प छोड़े गए थे, या तो वे इस्लाम स्वीकार करें, या कश्मीर घाटी छोड़कर चले जाएं, अथवा मृत्यु का आलिंगन करें।(Jonaraja, 1459, p. 115)। इस ऐतिहासिक उथल-पुथल का सबसे गहरा और विनाशकारी प्रभाव कश्मीरी हिंदू समाज की आंतरिक जातिगत व्यवस्था पर पड़ा। युद्धों एवं ज्ञान परंपरा में सीधे तौर पर शामिल होने के कारण क्षत्रिय एवं ब्राह्मण वर्ग को सबसे पहले और सबसे अधिक निशाना बनाया गया। वे या तो युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए या उनके बड़े हिस्से को बलपूर्वक इस्लाम में शामिल कर लिया गया।इसके परिणामस्वरूप, गैर-ब्राह्मण जातियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा या तो कश्मीर घाटी में ही इस्लाम के दायरे में समा गया या वे सीमावर्ती मैदानी क्षेत्रों जैसे पंजाब और हिमाचल के पर्वतीय अंचलों की ओर विस्थापित हो गए। (Farishta, 1612, Vol. 4, p. 468)।
वस्तुत: जो हिम्मत करके यहां शेष बचे थे, वह भी अपने को भारी दबाव में महसूस कर रहे थे, उन्हें लग रहा था कि पता नहीं कब उन्हें भी अपने जीवन से हाथ धोना पड़ेगा, किंतु वे परकीय धर्म (रिलीजन) अपने जीवन में जीवित रहते हुए स्वीकार नहीं करेंगे। वे मुसलमान नहीं होंगे। वे इस्लाम का कलमा नहीं पढ़ेंगे। इस जनसांख्यिकीय संकट के बाद कश्मीर घाटी के भीतर जो मूल हिंदू आबादी बच गई, उसमें मुख्य रूप से सारस्वत ब्राह्मण समुदाय के लोग एवं शेष अन्य शामिल थे, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सनातन धार्मिक पहचान को बचाए रखा।
पण्डितराज जगन्नाथ और ‘पंडित’ उपनाम का सामूहिक कवच
जब 17वीं शताब्दी में भारत की केंद्रीय सत्ता मुगल सम्राट शाहजहाँ के हाथों में आई, तब कश्मीर में चल रहे इस दमन चक्र के बीच के कालखंड में भारतीय इतिहास के एक अत्यंत असाधारण व्यक्तित्व का उदय होता है, जिन्हें हम पण्डितराज जगन्नाथ के नाम से जानते हैं। मुगल दरबार को भी उनकी योग्यता एवं सामूहिक सम्मान के कारण से सर्वोच्चता स्वीकारना पड़ी थी। शाहजहाँ ने उनकी अद्वितीय विद्वता से प्रभावित होकर उन्हें ‘पंडितराज’ की उपाधि से विभूषित किया था।शाहजहाँ के प्रधानमंत्री आसफ़ ख़ान के विशेष निमंत्रण पर पंडितराज जगन्नाथ ने कश्मीर की लंबी यात्रा की थी (Jagannatha, Asaf Vilas, 1640)।
कश्मीरी जनश्रुतियों और सामाजिक स्मृतियों में यह बात अत्यंत दृढ़ता के साथ स्थापित है कि इसी कालखंड में कश्मीर के बचे हुए हिंदू समाज को एक अखंड और अभेद्य सामाजिक इकाई में बदलने के लिए एक युगांतकारी निर्णय लिया गया। मुगल दरबार में कश्मीरी समाज की विद्वता और उनके आत्मसम्मान को पुनर्स्थापित करने के लिए एक सामाजिक सहमति तैयार की गई। इसके तहत यह स्थापित किया गया कि कश्मीर के बचे हुए सभी मूल हिंदू, चाहे उनका पूर्व का पारिवारिक इतिहास या जाति (क्षत्रिय, वैश्य आदि जो अंततः इस पहचान में समाहित हुए) कुछ भी रही हो, अपने नाम के आगे सामूहिक रूप से ‘पंडित’ (जिसका अर्थ विद्वान होता है) शब्द का प्रयोग करेंगे (Kaul, 1924, p. 38)।
इस ऐतिहासिक निर्णय का सबसे चमत्कारी और दूरगामी प्रभाव यह पड़ा कि इसने कश्मीर के हिंदू समाज के भीतर सदियों से चली आ रही ऊंच-नीच की भावनाओं और जातिगत विभेदों को समूल नष्ट कर दिया (Tikoo, 1979, p. 45)। सबको एक समान उपनाम ‘पंडित’ मिलने से पूरा समुदाय एक ऐसी अखंड सामाजिक और आध्यात्मिक चट्टान बन गया, जिसके भीतर फूट डालना किसी भी बाहरी या चरमपंथी शक्ति के लिए असंभव हो गया।
दिलीप मंडल के दावों की समीक्षा
वरिष्ठ पत्रकार और केद्र सरकार में सलाहकार दिलीप मंडल का जैसा कि सर्वविदित है कि हाल ही में एक दावा सामने आया है, भारतीय स्वयंतंत्रता के समय कश्मीर में ‘घर वापसी’ का माहौल था और वहां के मुसलमान दोबारा हिंदू बनने को तैयार थे, परंतु बनारस के पंडितों के ‘शुद्धतावादी’ रवैये के कारण ऐसा नहीं हो सका। मंडल ने इसके लिए जवाहरलाल नेहरू की 1946 में प्रकाशित पुस्तक ‘भारत की खोज’ का हवाला दिया है। सोशल मीडिया एक्स पर उन्होंने लिखा, “अगर बनारस के पंडितों ने दिल बड़ा किया होता तो कश्मीर की कहानी अलग होती. वहां के मुसलमान फिर से हिंदू बनने के लिए तैयार थे. वहां के राजा ने बनारस संदेश भेजा. पर पंडित ज्यादा शुद्धतावादी हो गए. ये ऐतिहासिक गलती थी.बता रहे हैं जवाहरलाल नेहरू, पुस्तक – भारत की खोज (1946)”
अब इस दावे का अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर निम्नलिखित विसंगतियां सामने आती हैं-
• दोषारोपण की राजनीति और आधा सच: दिलीप मंडल ने बनारस के पंडितों को तो ‘शुद्धतावादी’ कहकर कटघरे में खड़ा कर दिया, लेकिन उन्होंने इस सिक्के के दूसरे पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। नेहरू ने अपनी पुस्तक में खुद यह भी संकेत दिया था कि तत्कालीन शासकों और रूढ़िवादी तत्वों के बीच राजनीतिक सामंजस्य का अभाव था।
• नेहरू और राज्य सत्ता की विफलता: मंडल स्वयं अपनी पोस्ट के दूसरे भाग में यह स्वीकार करते हैं कि जब जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री और कर्ताधर्ता बने, तब उन्होंने कश्मीर के इस ऐतिहासिक संकट को सुलझाने के बजाय तुष्टिकरण की राजनीति को प्राथमिकता दी। यदि समस्या सिर्फ बनारस के पंडितों की थी, तो आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की संप्रभु सरकार (जिसके पास पूर्ण कानून बनाने का अधिकार था) ने कश्मीर के हिंदुओं और वहां की जनसांख्यिकी को संतुलित करने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? इसका उत्तर नेहरू की अपनी राजनीतिक तुष्टिकरण की नीतियों में छिपा है।
• यदि दिलीप मंडल का यह तर्क है कि बनारस के ब्राह्मणों ने कश्मीर की घर वापिसी को रोका, तब फिर वे इस सच को क्यों नहीं बताते कि पण्डितराज जगन्नाथ भी एक ब्राह्मण थे, जिन्होंने शेष कश्मीर की सभी हिन्दू जातियों को अपना सरनेम पंडित देकर सभी को उच्चवर्ण का अपने समान और अपने अनुकूल घोषित कर तत्कालीन समय में कश्मीर से न सिर्फ हिन्दू पयालन रोका, बल्कि शाहजहां के दरबार से कश्मीर के इस्लामिक शासक को यह संदेश भी पहुंचाया कि गैर मुस्लिम हिन्दुओं पर अब कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा।
• उदाहरण तो इतिहास में शिवाजी महाराज का भी है, जिनके राज्याभिषेक के लिए कश्मीर के विद्वान तैयार नहीं थे, फिर वहीं से सबसे श्रेष्ठ एवं महान विद्वान ने वैदिक मंत्रोंच्चार के साथ शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक ही नहीं कराया, उन्हें कोटि हिन्दू ह्दयों का हिन्दू सम्राट तक घोषित किया था। तब यह भी प्रश्न है कि क्या कश्मीर के राजा सबकुछ बनारस के विद्वानों से पूछकर ही करते थे?
वस्तुत: दिलीप मंडल जो दलित विमर्श का नैरेटिव गढ़ते हैं, उसमें वे यह भी स्वीकार करें कि भारतीय इतिहास में वंचित, शोषित, दलित और पिछड़े वर्गों के पराक्रम और शासन की गाथाएं अत्यंत गौरवशाली और प्रेरक रही हैं। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में इन समुदायों के शूरवीरों ने अपनी तलवार के बल पर विशाल साम्राज्यों की स्थापना की थी। देश की संस्कृति और अस्मिता की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति भी दी। आधुनिक संवैधानिक और सामाजिक व्यवस्था के तहत इनमें से अधिकांश समुदायों को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
उत्तर प्रदेश और अवध के मध्यवर्ती भूभाग का इतिहास पासी जाति के राजाओं के पराक्रम के बिना अधूरा है, जो वर्तमान में अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 11वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र में पासी शासकों का एक अत्यंत सुदृढ़ और समृद्ध शासन तंत्र स्थापित था। इस क्रम में सबसे प्रतापी नाम राजा सुहेलदेव पासी का आता है, जिन्होंने बहराइच के ऐतिहासिक युद्ध में विदेशी आक्रांता सालार मसूद गाजी को धूल चटाकर सनातन संस्कृति की रक्षा की थी।
इसी प्रकार, लखनऊ के बिजनौरगढ़ के शक्तिशाली शासक राजा बिजली पासी ने 12 किलों के एक अभेद्य महासंघ का निर्माण किया था। अनेक ऐतिहासिक शोधों के अनुसार, आधुनिक लखनऊ की नींव रखने वाले राजा लखन पासी, रायबरेली में गंगा तट पर विशाल किले का निर्माण कराने वाले राजा डालदेव पासी, तथा राजा सातन पासी, राजा देवमाती पासी व राजा छीता पासी इसी पासी समाज के गौरव थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इस समाज ने अभूतपूर्व योगदान दिया, जिसमें उन्नाव के राजा गंगाबक्स रावत ने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा, और वीरांगना उदा देवी पासी ने लखनऊ के सिकंदर बाग में अकेले ही 36 ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतारकर सर्वोच्च बलिदान दिया।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के वनों व पर्वतीय अंचलों में भील और मीणा जनजातियों का शासन था, जो आज अनुसूचित जनजाति (एसटी) के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मेवाड़ के इतिहास में राणा पूंजा भील का नाम अमर है, वे महाराणा प्रताप के सबसे विश्वस्त सेनापति और रणनीतिकार थे, जिनकी गुरिल्ला भील सेना के सहयोग के बिना हल्दीघाटी के युद्ध की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
उनके इसी योगदान के कारण आज भी मेवाड़ के राजचिह्न पर एक तरफ राजपूत योद्धा और दूसरी तरफ भील योद्धा का चित्र अंकित है। इसके अतिरिक्त, राजस्थान के प्रमुख शहरों और रियासतों की स्थापना का श्रेय भी भील राजाओं को जाता है, जिनमें राजा बांसिया भील के नाम पर बांसवाड़ा, राजा दूंगरिया भील के नाम पर डूंगरपुर और राजा कोटिया भील के नाम पर कोटा शहर का नामकरण और शुरुआती शासन इतिहास में दर्ज है।
वहीं, जयपुर (आमेर) पर कछवाहा राजपूतों के आगमन से पहले खोंगोंग के क्षेत्र पर राजा आलन सिंह मीणा के नेतृत्व में शक्तिशाली मीणा राजवंश का समृद्ध शासन संचालित था। वहीं, पश्चिम और मध्य भारत के इतिहास में कोली, महार और रामोशी समुदायों के शासकों और योद्धाओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में जयबा मुकने ने 14वीं शताब्दी में जव्हार रियासत की स्थापना की, जहां कोली समाज के राजाओं ने सदियों तक सफलतापूर्वक शासन किया।
छत्रपति शिवाजी महाराज की नौसेना और सेना में यशवराव कोली और राजा नागाजी कोली जैसे जांबाज कमांडर शामिल थे। उत्तर प्रदेश के झांसी राज्य में वीरांगना झलकारी बाई (कोली जाति, एससी) ने रानी लक्ष्मीबाई की मुख्य सेनापति के रूप में अंग्रेजों को भ्रमित करते हुए अद्भुत पराक्रम दिखाया, और उनका कद शासन में किसी रानी से कम नहीं था। ब्रिटिश सत्ता को पहली कड़ी चुनौती देने वाले उमाजी नाईक (रामोशी समुदाय, विमुक्त जाति) ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर खुद को राजा घोषित किया था और अपनी समानांतर सरकार चलाई थी।
सैन्य कौशल और वीरता के प्रतीक महार समुदाय ने इतिहास की कई निर्णायक लड़ाइयों में भाग लिया, जिनमें सिदनाक महार जैसे योद्धाओं का नाम उल्लेखनीय है। इसी समाज से सूबेदार मेजर रामजी मालोजी सकपाल भी आते हैं, जो ब्रिटिश भारतीय सेना की महार रेजिमेंट में सर्वोच्च पद पर रहे और बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पिता व मार्गदर्शक बने।
यदि प्राचीन भारत के विशाल साम्राज्यों की बात करें, तो वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र या वंचित श्रेणियों से आने वाले शासकों ने पूरे अखंड भारत पर राज किया, जिन्हें आज अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत देखा जाता है। मगध साम्राज्य पर शासन करने वाले महापद्मनंद (नंद राजवंश के संस्थापक) मूल रूप से नाई समुदाय से थे। उन्होंने अपनी अद्भुत सैन्य शक्ति से तत्कालीन सभी क्षत्रिय राजाओं को पराजित कर भारत के पहले अखिल भारतीय साम्राज्य की नींव रखी थी।
इसी प्रकार, भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य की माता ‘मुरा’ को ऐतिहासिक ग्रंथों में शूद्र/वंचित पृष्ठभूमि का माना गया है, और आज मौर्य, शाक्य व कुशवाहा समाज (ओबीसी) उन्हें अपने इतिहास के सबसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में देखता है।
भारत के दक्षिण और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में भी वंचित व जनजातीय पृष्ठभूमि के शासकों ने लंबे समय तक अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के काकातीय काल में मदिगा (एससी) और वाल्मीकि (एससी) जातियों के सेनापतियों और नायकों ने कई छोटे दुर्गों और स्वायत्त क्षेत्रों पर शासन किया। पूर्वोत्तर भारत में असम और बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों पर राज करने वाले कोच राजवंश के महाराजा नरनारायण और उनके महान सेनापति चिलाराय मूल रूप से कोच/राजबंशी समुदाय से थे, जो आज विभिन्न राज्यों में एससी/एसटी या ओबीसी के अंतर्गत आते हैं। इन्होंने मुगलों और अफगानों के आक्रमणों को विफल किया।
वहीं, असम के लखीमपुर क्षेत्र में शासन करने वाला चुटिया राजवंश भी वंचित जनजातीय पृष्ठभूमि का था, जिसकी अंतिम महान शासक रानी सती साधनी (चुटिया समुदाय, ओबीसी) ने अपने राज्य की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए। सवाल यह है कि यदि ब्राह्मण इतने ताकतवर थे तो इन सीएसी,एसटी एवं ओबीसी को तो कभी सत्ता में होना ही नहीं चाहिए था, यहां सिर्फ क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों का ही साम्राज्य होना चाहिए था! किंतु इतिहास हमें यह नहीं बताता। इससे एक बात साफ हो जाती है कि भारत में अति प्राचीन काल से वर्ण व्यवस्था तो प्रभावी रही, किंतु जाति व्यवस्था नहीं रही।
जैसे सती प्रथा के बारे में इतिहास का हवाला देकर बताया जाता है कि भारत में सती प्रथा थी, हिन्दू स्त्रियां अपने पति के मरने पर उसके साथ दाह संस्कार में अपने को चिता में जलकर समाप्त करती थीं, किंतु यह अब झूठा नैरेटिव सिद्ध हो चुका है, क्योंकि यदि ऐसा होता तो भारत भर में कहीं न कहीं युद्ध चल रहे थे, पुरुष मारे जा रहे थे, तब यदि स्त्रियां चिता के साथ अपने को समाप्त कर रही होतीं तो आज फिर तो समस्त हिन्दू जाति का समूल नाश हो चुका होता!
वस्तुत: इसी प्रकार का ये झूठा नैरेटिव है कि ब्राह्णों के कारण से इतिहास में ये हुआ, वह हुआ। ताकि जिस तरह से दक्षिण भारत में स्वतंत्रता के कुछ वर्ष पूर्व एवं निरंतर बाद में आज तक ब्राह्मणों के विरोध में जो आन्दोलन उनकी योग्यता एवं क्षमताओं के विद्वेष से प्रेरित होकर खड़ा किया गया, वैसा ही आन्दोलन उत्तर भारत में भी सामूहिक रूप से खड़ा किया जाए, हालांकि ऐसा करने का प्रयास भी समय- समय पर देखने को मिलता हैं, किंतु सुखद यह है कि वह दक्षिण की तरह यहां आज तक सफल नहीं हो पाया है। यहां कहीं दिलीप मंडल उसे पुन: खड़ा करने की तैयारी तो नहीं कर रहे, जैसा कि उनके आचरण से सिद्ध हो रहा है! अब इन संदर्भों को भी देखें-
इतिहास में पंडितों द्वारा हिंदू समाज की रक्षा के गौरवशाली उदाहरण
दिलीप मंडल का विमर्श पंडितों या ब्राह्मण समाज को समाज को तोड़ने वाले तत्व के रूप में चित्रित करने का प्रयास करता है, जबकि वास्तविक इतिहास इसके बिल्कुल विपरीत है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सनातन संस्कृति पर संकट आया, पंडितों ने ढाल बनकर और अपने प्राणों की आहुति देकर संपूर्ण हिंदू समाज की रक्षा की है।
• कश्मीरी पंडित और गुरु तेग बहादुर का सर्वोच्च बलिदान (1675): जब मुग़ल सम्राट औरंगजेब के गवर्नर इफ़्तिख़ार खान ने कश्मीरी हिंदुओं पर इस्लाम अपनाने के लिए भयंकर अत्याचार ढाए, तब कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में आनंदपुर साहिब में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के पास पहुंचा। पंडितों की पुकार पर गुरु तेग बहादुर जी ने दिल्ली के चांदनी चौक में अपना शीश दे दिया, लेकिन हिंदुओं का धर्म परिवर्तन नहीं होने दिया। यह पंडितों की ही रणनीतिक और आध्यात्मिक सूझबूझ थी जिसने हिंदू समाज की रक्षा के लिए एक महान रक्षा कवच तैयार किया।
• पंडितराज जगन्नाथ का आंतरिक सुधार: जैसा कि पूर्व अध्यायों में सिद्ध किया गया है, पंडितराज जगन्नाथ और मुग़ल दरबार के कश्मीरी विद्वानों ने कश्मीर में बची-खुची सभी जातियों (क्षत्रिय, वैश्य आदि) को ‘पंडित’ उपनाम देकर ऊंच-नीच के विभेद को समाप्त किया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि पंडितों ने समाज को शुद्धतावाद के नाम पर अलग करने के बजाय, संकट के समय गले लगाया और एक अखंड समाज का निर्माण किया।
• विद्वता और सांस्कृतिक निरंतरता: जब आक्रांताओं ने नालंदा, तक्षशिला और कश्मीर के शारदा पीठ जैसे ज्ञान केंद्रों को जला दिया, तब इन्हीं ब्राह्मणों और पंडितों ने वेदों, उपनिषदों, आरण्यक ग्रंथों, उनकी शाखाओं, गण आदि और पुराणों को मौखिक रूप से (कंठस्थ करके) अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंपा। इसके लिए इतिहास में अनेक वर्णन मौजूद हैं, जोकि यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि इन पंडितों की कई पीढ़ियां बलिदान तक हो गईं, शीश दिए पर धर्म न छोड़ा। यदि पंडितों ने अपनी जान पर खेलकर इन ग्रंथों को नहीं बचाया होता, तो आज सनातन संस्कृति का कोई लिखित या मौखिक अस्तित्व ही नहीं बचा होता। तब तो फिर दिलीप मंडल समेत हम और आप सभी विधर्मी हो चुके होते!
अतः इन सभी तथ्यों के प्रकाश में कहना यही है कि यह अध्ययन स्थापित करता है कि दिलीप मंडल जैसे विचारकों द्वारा सोशल मीडिया पर नेहरू की पुस्तक के हवाले से फैलाया जा रहा विमर्श ऐतिहासिक रूप से त्रुटिपूर्ण और एकतरफा है। यह विमर्श उस समाज पर दोषारोपण करता है जिसने सदियों से अपनी पहचान को बचाने के लिए सबसे अधिक बलिदान दिए हैं। कश्मीर का इतिहास गवाह है कि जब इस्लामी चरमपंथ ने हिंदू समाज को मिटाने का प्रयास किया, तब आंतरिक सामाजिक दीवारों (जातिवाद) को ढहाकर सबने एक समान उपनाम ‘पंडित’ को अंगीकार किया। समय-समय पर पंडितों ने न सिर्फ अपनी ज्ञान परंपरा से बल्कि गुरु तेग बहादुर जैसे महापुरुषों के साथ मिलकर संपूर्ण हिंदू समाज की रक्षा की है। इतिहास के इस पूर्ण और वास्तविक सत्य को आज दुनिया के सामने आना ही चाहिए।
इनके अलावा तथ्य यह भी है, भारत में ब्राह्मण-विरोधी वक्रपटुता (rhetoric) एक सुव्यवस्थित राजनीतिक-बौद्धिक परियोजना का हिस्सा बन चुका है, जो ‘हेट स्पीच’ के नारों के बीच भी ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ घृणा को सामान्य बनाती है। यह आज के समय में सिर्फ बाहरी ‘मिशनरी’ या ‘औपनिवेशिक’ साजिश नहीं, इस्लामिक जिहाद तक भी सीमित नहीं है, बल्कि कहना होगा कि स्वतंत्र भारत में स्थानीय राजनीतिक स्वार्थ, वामपंथी बौद्धिक परंपरा और पहचान-आधारित वोट-बैंक की राजनीति का संयुक्त परिणाम है।
राजनीतिक स्वीकारोक्ति और ‘नए यहूदी’ वाला तर्क
2018 में भी हमने देखा था कि तत्कालीन ट्विटर सीईओ जैक डॉर्सी के एक विवादास्पद पोस्टर (‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को कुचल डालो’) के बाद कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने ट्वीट किया था कि “ब्राह्मण-विरोध भारतीय राजनीति की सच्चाई है… हम (ब्राह्मण) भारत के यहूदी जैसे निशाना बना दिए गए हैं।” बाद में उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि उनका इरादा इसका समर्थन करना नहीं, बल्कि इस ‘हानिकारक प्रवृत्ति’ की ओर ध्यान दिलाना था, पर मूल संदेश वही रहा, ब्राह्मण-विरोध को एक ‘वास्तविकता’ मानकर स्वीकार कर लेना।यह मानसिकता स्वयं हिन्दू-विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ाती है, क्योंकि जब बड़े नेता ही ऐसे संदेशों को ‘सच्चाई’ कहें, तो घृणा फैलाने वालों को छूट मिल जाती है।
‘ब्राह्मणवाद’ शब्द: गढ़ित लांछन और उसका मकसद
‘ब्राह्मणवाद’ (Brahminism) शब्द मूलतः भारतीय नहीं, बल्कि औपनिवेशिक-मिशनरी और बाद में वामपंथी बौद्धिक परंपरा द्वारा गढ़ा गया एक नकारात्मक लेबल है, जिसका उद्देश्य वैदिक ज्ञान-परंपरा और हिन्दू समाज को बदनाम करना था। वेंडी डोनिगर जैसी विद्वानों की हिन्दू-विरोधी रचनाओं में भारतीय वामपंथी लेखकों और पत्रकारों के हवाले मिलते हैं, जो दिखाता है कि कैसे बाहरी आलोचना स्थानीय बौद्धिक सहयोग से पुष्ट होती है। पाठ्यपुस्तकों में दशकों से ‘वेदों का वर्चस्व’ और ‘ब्राह्मणवाद’ का नकारात्मक उल्लेख बना रहा, जबकि हिन्दू नेताओं ने इसे बदलने की कोशिश नहीं की। दुखद है कि 2014 में दिल्ली में पहला ‘वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस’ का आयोजित हुआ था और इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में अशोक सिंहल मौजूद थे। तब तीन दिवसीय सम्मेलन 21 से 23 नवंबर, 2014 को नई दिल्ली के होटल अशोक में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के तत्कालीन मुख्य संरक्षक अशोक सिंहल उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ताओं में से एक थे।
इसी मंच से उन्होंने अपना वह प्रसिद्ध और बहुचर्चित बयान दिया था कि “दिल्ली में 800 साल बाद एक स्वाभिमानी हिंदू सरकार आई है” और भारत को उसका अपना हिन्दू सम्राट मिला है। आयोजन में दुनिया के 50 से अधिक देशों से लगभग 1,500 से 1,800 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। जब श्रद्धेय अशोक सिंहल जी बोल रहे थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे थे, तब हिन्दू सम्राट सुनते ही कई लोगों की आंखें भर आई थीं, जिसके कि वीडियो आज भी मौजूद हैं। किंतु तब भी यह दुखद है कि एक ब्राह्मण समाज को उनके शासन में भी खुलकर लांछित किया जा रहा है। स्वयं उनकी सत्ता से लाभ लेनेवाले लोग खुलकर ब्राह्मणों का बिना पूर्ण अध्ययन किए, उपहास कर रहे हैं, उन्हें यथा संभव सर्वत्र अपमानित कर रहे हैं!
ऐतिहासिक वास्तविकता: ज्ञान, निर्धनता और सम्मान
ऐसे में यह तथ्य भी बार-बार सभी के ध्यान में लाना चाहिए कि ऐतिहासिक रूप से भारत में राज्य-सत्ता क्षत्रियों, जाटों, यादवों, मराठों और मध्य जातियों के पास रही; धन-व्यापार वैश्यों के हाथों में था, जबकि ब्राह्मणों का कार्य वैदिक ज्ञान का संरक्षण, शिक्षा और धर्म-संस्कृति की चिंता करना रहा है। तमाम ऐतिहासिक विवरणों में ब्राह्मणों को विद्वान परंतु निर्धन व्यक्तियों के रूप में दर्ज किया गया है और संपूर्ण भारत में उनका सम्मान सदैव बना रहा।
आज की स्थिति इसके विपरीत है, अंग्रेजी शिक्षा-प्रणाली ने ब्राह्मणों का पारंपरिक शैक्षणिक स्थान नष्ट कर दिया, और अब वे आर्थिक रूप से वंचित हैं। दिल्ली, बिहार, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मप्र, हिमाचल, उत्तराखण्ड, झारखण्ड समेत देश भर में सैंकड़ों की संख्या में ब्राह्मण डॉ. बिंदेश्वर पाठक के साथ सुलभ सौचालय प्रोजेक्ट से जुड़े। आज बड़ी संख्या में सुलभ शौचालयों की सफाई में ब्राह्मण समुदाय के लोग कार्यरत हैं, यह तथ्य स्वयं उस शौचालय श्रृंखला के संस्थापक के ब्राह्मण होने के बावजूद सामने आया है।
राजनीतिक लाभ और सामाजिक विभाजन
मंडल कमीशन के बाद उत्तर भारत में ब्राह्मण-विरोध और मजबूत हुआ, और राजनीतिक दलों ने वोट-बैंक की राजनीति के लिए एक समूह को साथ लाने हेतु दूसरे को लांछित करने का धंधा शुरू किया। परिणामस्वरूप, ब्राह्मणों को गाली देना ‘राजनीतिक फैशन’ बन गया, जबकि वास्तविकता यह है कि सभी राज्यों में निचली और मध्य जातियों के लोग सत्ताधारी हैं और ब्राह्मणों की प्रति व्यक्ति आय कई समुदायों से कम है।
तान लें : वैदिक ज्ञान-परंपरा पर हमला यानी हिन्दू अस्तित्व पर हमला
ब्राह्मण-विरोध का निहितार्थ सीधे हिन्दू धर्म-समाज के खात्मे की चाह से जुड़ा है, क्योंकि ब्राह्मणों का मूल कार्य वेदांत और शास्त्र-अध्ययन रहा है। चर्च (ईसाईयत) और इस्लामिक साम्राज्यवादी मतवाद दोनों इसमें लगे हैं, जिसमें कि वामपंथी और नास्तिक भी कुछ हद तक इसमें खाद देने का काम करते हैं। क्योंकि यदि वेद, उपनिषदों का वैज्ञानिक व सशक्त ज्ञान विश्व में फैला, तो उनके एकाधिकारवादी दावों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। स्वामी विवेकानंद (जो स्वयं ब्राह्मण नहीं थे) के प्रसिद्ध व्याख्यान ‘वेदान्त का उद्देश्य’ में ब्राह्मणों के गौरव, इतिहास और भूमिका का उल्लेख है, जिसे पढ़कर हिन्दू-विरोधी बुद्धिजीवियों के दावों की परख की जा सकती है।
विडंबना: ‘पितृसत्ता’ और ‘वर्चस्व’ का दोहरा मापदंड
जिस हिन्दू समाज में विविध देवी-देवता, अवतार, गुरु-ज्ञानी और रीति-रिवाजों का सम्मान है, उसे ‘वर्चस्ववादी’ और ‘पितृसत्तात्मक’ बताया जाता है, जबकि चर्च और इस्लामिक मतवादों में खुलेआम एकाधिकार का दावा है, जहां दूसरे मतवालों को जीने तक की मंजूरी नहीं, और सभी पोप, बिशप, ईमाम, मुल्ले केवल पुरुष हैं। यह सब मुख्यतः हिन्दू नामों वाले मूढ़ या स्वार्थी भारतीयों के माध्यम से होता है; बाहरी शत्रु इसे बढ़ावा देते हैं, पर यह संभव इसीलिए होता है क्योंकि हम स्वयं गफलत में हैं।
अब हिन्दू नेताओं को चाहिए कि वे पाठ्यपुस्तकों से ‘ब्राह्मणवाद’ जैसे गढ़ित शब्दों को हटाएं, ब्राह्मणों की वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान वंचित स्थिति को रेखांकित करें, और विवेकानंद जैसे महान ज्ञानियों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाएं। क्योंकि ब्राह्मण-विरोध एक समुदाय के खिलाफ घृणा न होकर संपूर्ण हिन्दू ज्ञान-परंपरा और सभ्यता के अस्तित्व पर सुनियोजित हमला है, जिसे स्थानीय राजनीति और बौद्धिक सहयोग से बल मिलता है। इसका मुकाबला तथ्यों, इतिहास और शिक्षा से ही संभव है।
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संदर्भ सामग्री :
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